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मानना पड़ेगा, बिना योग गुजारा नहीं
स्वामी अवधेशानंद गिरी
Updated Sun, 15 Jul 2018 07:15 AM IST
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वह एक ही है दूसरा कोई नहीं। सभी मानते हैं कि बिना किसी संतुलित व्यवस्था के यह दुनिया व्यवस्थित नहीं चल सकती। यह नियामक सत्ता ही ब्रह्म है। जगत में जो कुछ भी दिखाई, सुनाई, सुंघाई या स्पर्श आदि में आता है, वह सब मात्र ब्रह्म ही है। जिस प्रकार मिट्टी से बने पात्रों का अलग-अलग नाम और रूप होने पर भी मूल रूप मिट्टी ही होती है, इसी प्रकार जो भी जड़ या चेतन हैं, वह मूल रूप से ब्रह्म ही हैं।
पूरे ब्रह्मांड में द्रव्य या ऊर्जा है। ये दोनों भी बदलते रहते हैं। ब्रह्मांड में ऊर्जा के सिवा कुछ भी नहीं है। ‘ब्रह्मांड’ शब्द का प्रयोग इसलिए है कि यह ब्रह्म से परिपूर्ण एवं अंडाकार है। अध्यात्म विज्ञानी इस सृष्टि की उत्पत्ति नाद से मानते हैं, जबकि खगोल विज्ञानी विस्फोटक से मानते हैं, अर्थात सभी ग्रहों या पृथ्वी पर जो कुछ भी जड़-चेतन तत्व हैं, वे सूर्य या ब्रह्मांड के मूल तत्व से ही बने हैं। लेकिन नाम-रूप में भिन्नता होने पर भी मूल तत्व एक ही है और वह ब्रह्म है। कहा गया है कि एकोब्रह्म द्वितीयोनास्ति।
मरने के बाद शरीर जड़ तत्व प्रकृति में विलीन हो जाता है। ब्रह्म को निर्लिप्त, निराकार, निर्विशेष तथा निर्विकार कहा है। अध्यात्म शास्त्रियों ने इस ऊर्जा के जो तीन गुण बताए हैं- इसमें सत्, चित् और आनंद। इसी को परमात्मा के रूप में जानते हैं।
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पूरे ब्रह्मांड में द्रव्य या ऊर्जा है। ये दोनों भी बदलते रहते हैं। ब्रह्मांड में ऊर्जा के सिवा कुछ भी नहीं है। ‘ब्रह्मांड’ शब्द का प्रयोग इसलिए है कि यह ब्रह्म से परिपूर्ण एवं अंडाकार है। अध्यात्म विज्ञानी इस सृष्टि की उत्पत्ति नाद से मानते हैं, जबकि खगोल विज्ञानी विस्फोटक से मानते हैं, अर्थात सभी ग्रहों या पृथ्वी पर जो कुछ भी जड़-चेतन तत्व हैं, वे सूर्य या ब्रह्मांड के मूल तत्व से ही बने हैं। लेकिन नाम-रूप में भिन्नता होने पर भी मूल तत्व एक ही है और वह ब्रह्म है। कहा गया है कि एकोब्रह्म द्वितीयोनास्ति।
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मरने के बाद शरीर जड़ तत्व प्रकृति में विलीन हो जाता है। ब्रह्म को निर्लिप्त, निराकार, निर्विशेष तथा निर्विकार कहा है। अध्यात्म शास्त्रियों ने इस ऊर्जा के जो तीन गुण बताए हैं- इसमें सत्, चित् और आनंद। इसी को परमात्मा के रूप में जानते हैं।
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