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बड़े काम के हैं खिलौने, शारीरिक-मानसिक थकावट भी करते हैं दूर
रेणु जैन
Updated Sat, 25 Aug 2018 02:05 PM IST
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खिलौने सिर्फ खेलने के ही काम नहीं आते, बच्चों के शारीरिक मानसिक तथा भावात्मक संबंधों के विकास में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। आमतौर पर माना जाता है कि ज्ञान सिर्फ किताबों और गुरुजनों से मिलता है। यह सही है, लेकिन जीवन के शुरुआती दौर में किताबें तथा गुरु बच्चे के विकास में जितने काम आते हैं, कमोबेश खिलौने भी वैसी ही भूमिका अदा करते हैं। अक्सर माता-पिता अपने बच्चों के खिलौनों में कोई खास दिलचस्पी नहीं लेते, लेकिन सही बात तो यह है कि खिलौने बच्चों के शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक संबंधों के विकास में अपनी खासी जिम्मेदारी निभाते हैं।
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बाल मनोचिकित्सकों का मत है कि इलेक्ट्रॉनिक खिलौने बच्चों की कल्पनाशक्ति एवं रचनात्मकता को रोक देते हैं, लेकिन फिर भी अब चारों ओर इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों ने अपनी जगह बना ली है। छोटे-छोटे खिलौने, जो कभी बच्चे मिट्टी से खुद बनाते थे। लेकिन अब वीडियो गेम का नशा बच्चों को काफी खुशी देता है। कई माता-पिता उसे बुरा नहीं मानते, जब तक कि परीक्षा का परिणाम बुरा नहीं आता। परंतु जागरूक माता-पिता इन खिलौनों के माध्यम से बच्चों के मस्तिष्क पर पड़ने वाले प्रभावों के प्रति सचेत रहते हैं। अच्छे खिलौने वे हैं, जो खुशी देने के साथ बच्चे का विकास भी करें। इसी दृष्टिकोण को निभाते हुए खिलौनों का चयन करें। मनोवैज्ञानिकों ने पाया कि खेल और खिलौने बच्चे के बेहतर विकास में अच्छी भूमिका निभा सकते हैं।
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-हर खिलौना कोई न कोई संदेश देता है। इससे बच्चे की भावनात्मक पकड़ मजबूत होती है।
-बच्चों में मिल-जुलकर खेलने की प्रवृत्ति का विकास होता है।
-शांत बैठने के अलावा खुद को सुरक्षित महसूस करने में सहायता मिलती है।
-समूह में खेलने की आदत हो जाने से स्कूल में बच्चे आसानी से अपनी पैठ बना लेते हैं। इसलिए उम्र के हिसाब से अपने बच्चों के लिए सही खिलौनों का चयन करके उनके बचपन को बनाए रखने में सहयोग करें।
-बच्चों में मिल-जुलकर खेलने की प्रवृत्ति का विकास होता है।
-शांत बैठने के अलावा खुद को सुरक्षित महसूस करने में सहायता मिलती है।
-समूह में खेलने की आदत हो जाने से स्कूल में बच्चे आसानी से अपनी पैठ बना लेते हैं। इसलिए उम्र के हिसाब से अपने बच्चों के लिए सही खिलौनों का चयन करके उनके बचपन को बनाए रखने में सहयोग करें।
जब नजरें टिकाने से आए बैठने की बारी
बच्चा जब अपनी आंखें खोलता है, तभी से अपनी सभी इंद्रियों का प्रयोग करना सीख जाता है। 2-3 महीने का बच्चा अपने हाथों की हरकतों से हल्के-हल्के खिलौने पकड़ सकता है। इस वक्त उसे रंग-बिरंगे खिलौने ज्यादा आकर्षित करते हैं। अतः झुनझुना या प्लास्टिक के छल्ले जैसे खिलौने दिए जाने चाहिए। बैठने वाली अवस्था में प्लास्टिक के ईंटों जैसे आकार के खिलौने देने चाहिए। रंग-बिरंगे आकारों वाले पजल्स भी अच्छे रहते हैं, जो रंग, ए बी सी डी, फ्रुट्स आदि की जानकारी भी देते हैं। इससे बच्चों की बौद्धिक क्षमता बढ़ती है।
बच्चा जब अपनी आंखें खोलता है, तभी से अपनी सभी इंद्रियों का प्रयोग करना सीख जाता है। 2-3 महीने का बच्चा अपने हाथों की हरकतों से हल्के-हल्के खिलौने पकड़ सकता है। इस वक्त उसे रंग-बिरंगे खिलौने ज्यादा आकर्षित करते हैं। अतः झुनझुना या प्लास्टिक के छल्ले जैसे खिलौने दिए जाने चाहिए। बैठने वाली अवस्था में प्लास्टिक के ईंटों जैसे आकार के खिलौने देने चाहिए। रंग-बिरंगे आकारों वाले पजल्स भी अच्छे रहते हैं, जो रंग, ए बी सी डी, फ्रुट्स आदि की जानकारी भी देते हैं। इससे बच्चों की बौद्धिक क्षमता बढ़ती है।
जब चलने से आए दौड़ने की बारी
इस उम्र में साइकिल के अलावा ऐसे खिलौने दीजिए, जिनमें झुकना, चढ़ना, धक्का देना और खींचना जैसे काम भी करने पड़ें। इससे बच्चा अच्छी खासी उठापटक करने लगेगा, जिससे तथा उसकी मांसपेशियां मजबूत हो सकेंगी। फुटबॉल, रिंग वगैरह से खेलना भी अच्छा होता है। यही उम्र होती है जब बच्चों को प्री-प्राइमरी स्कूल में जाने की तैयारी करवानी होती है। वह स्कूल में अपने टिफिन से लेकर खेल, सभी में सहयोग सीखता है और साझा करता है।
इस उम्र में साइकिल के अलावा ऐसे खिलौने दीजिए, जिनमें झुकना, चढ़ना, धक्का देना और खींचना जैसे काम भी करने पड़ें। इससे बच्चा अच्छी खासी उठापटक करने लगेगा, जिससे तथा उसकी मांसपेशियां मजबूत हो सकेंगी। फुटबॉल, रिंग वगैरह से खेलना भी अच्छा होता है। यही उम्र होती है जब बच्चों को प्री-प्राइमरी स्कूल में जाने की तैयारी करवानी होती है। वह स्कूल में अपने टिफिन से लेकर खेल, सभी में सहयोग सीखता है और साझा करता है।
जब आए खास रुचियों के बनने की बारी
तकरीबन सात वर्ष की उम्र के बाद बच्चे खेलते-खेलते किसी खास खेल को अपना शौक भी बना लेते हैं। इससे उनके शौक भी पता चल जाते हैं। तकरीबन चार से पांच वर्ष की उम्र से ही बच्चा छोटी-छोटी कहानियां सुनने का शौकीन हो जाता है तथा लिखने की कोशिश भी करता है। ऐसे बच्चे को लिखने के लिए रंग-बिरंगी पेंसिल, प्लास्टिक की कैंची, कागज आदि दिए जाने चाहिए, ताकि वह लिखने के साथ ही ड्राइंग बनाने का अभ्यास भी कर सके। इससे उनकी अंगुलियां लिखने पर संतुलित होना सीख लेती हैं। यही उम्र होती है जब आपका बच्चा आपसे विध्वंसक खिलौनों की जिद भी करने लगता है। इसे हरगिज पूरा न करें। थोड़ा बहुत धूम-धड़ाका उसके मानस को खास प्रभावित नहीं करता, लेकिन लगातार टीवी पर हिंसक फिल्में देखने व हिंसक खिलौनों से खेलने से उसके मस्तिष्क पर बुरा प्रभावपड़ने लगता है तथा वह वास्तविक जीवन में भी वैसा ही करना चाहता है।
तकरीबन सात वर्ष की उम्र के बाद बच्चे खेलते-खेलते किसी खास खेल को अपना शौक भी बना लेते हैं। इससे उनके शौक भी पता चल जाते हैं। तकरीबन चार से पांच वर्ष की उम्र से ही बच्चा छोटी-छोटी कहानियां सुनने का शौकीन हो जाता है तथा लिखने की कोशिश भी करता है। ऐसे बच्चे को लिखने के लिए रंग-बिरंगी पेंसिल, प्लास्टिक की कैंची, कागज आदि दिए जाने चाहिए, ताकि वह लिखने के साथ ही ड्राइंग बनाने का अभ्यास भी कर सके। इससे उनकी अंगुलियां लिखने पर संतुलित होना सीख लेती हैं। यही उम्र होती है जब आपका बच्चा आपसे विध्वंसक खिलौनों की जिद भी करने लगता है। इसे हरगिज पूरा न करें। थोड़ा बहुत धूम-धड़ाका उसके मानस को खास प्रभावित नहीं करता, लेकिन लगातार टीवी पर हिंसक फिल्में देखने व हिंसक खिलौनों से खेलने से उसके मस्तिष्क पर बुरा प्रभावपड़ने लगता है तथा वह वास्तविक जीवन में भी वैसा ही करना चाहता है।
जब आए बचपन के अंतिम पड़ाव की बारी
इस उम्र में बच्चों को कैरम, टेबल टेनिस, फुटबॉल, क्रिकेट, शतरंज आदि खेलों के प्रति प्रेरित करना चाहिए। ईमानदारी, खेल को चुनौती के रूप में लेना, थोड़ा रिस्क भी लेना आदि बातें बच्चों को आगे बढ़ाती हैं। वे महसूस करते हैं कि लगातार मेहनत उन्हें नई ऊंचाई देगी। इस उम्र के बच्चे इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों, वीडियो गेम, टीवी के कार्यक्रमों के प्रति ज्यादा दिलचस्पी दिखाने लगते हैं। उन्हें खेलने दीजिए, लेकिन समय के प्रबंधन का पाठ खास तौर से लागू कीजिए। इन खेलों को लत में न बदलने दें।
इस उम्र में बच्चों को कैरम, टेबल टेनिस, फुटबॉल, क्रिकेट, शतरंज आदि खेलों के प्रति प्रेरित करना चाहिए। ईमानदारी, खेल को चुनौती के रूप में लेना, थोड़ा रिस्क भी लेना आदि बातें बच्चों को आगे बढ़ाती हैं। वे महसूस करते हैं कि लगातार मेहनत उन्हें नई ऊंचाई देगी। इस उम्र के बच्चे इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों, वीडियो गेम, टीवी के कार्यक्रमों के प्रति ज्यादा दिलचस्पी दिखाने लगते हैं। उन्हें खेलने दीजिए, लेकिन समय के प्रबंधन का पाठ खास तौर से लागू कीजिए। इन खेलों को लत में न बदलने दें।