क्या देश भूल गया है कारगिल युद्ध के इस गुमनाम नायक को?
उस दिन ताशी के नए-नवेले याक का खो जाना संयोग मात्र नहीं था। अगर ताशी का याक उस दिन नहीं खोया होता तो आज कारगिल विजय युद्ध की गाथा कुछ और ही होती। ताशी की सूचना ने ही भारतीय सैनिकों को समय रहते सचेत किया। उन्हीं की सूचना पर सैनिकों को पता चला कि दुश्मन कारगिल में घुसपैठ कर चुके हैं और यहीं से शुरू हुई कारगिल के ऐतिहासिक युद्ध की कहानी। मगर विडंबना है कि युद्ध, योद्धा और विजय तो सभी को याद है, लेकिन ताशी को सब भूल गए।
कौन है ताशी और क्या है कहानी?
ताशी का पूरा नाम ताशी नामग्याल है। कारगिल से करीब 60 किलोमीटर की दूरी पर सिंधु नदी के तट पर बसे गारकोन गांव के रहने वाले ताशी नामग्याल 1999 के दिनों में गडरिए का काम करते थे। वो बकरियां और याक पालते थे। सीमा पर भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे तनाव से ताशी का किसी तरह का प्रत्यक्ष संबंध नहीं था। रोज की तरह उस दिन जब वो अपने जानवरों को चरा कर वापस आए, तो पता चला कि उनका एक याक काफी देर से घर नहीं लौटा है।
अपने याक को खोजते हुए ताशी घर के सामने वाली चारू पहाड़ी के पास गए। याक वहां नहीं था। उसे खोजते-खोजते ताशी काफी आगे निकल गए और पहाड़ी के नीचे बहने वाले नाले के रास्ते से होते हुए वो बाल्टिक सेक्टर की पहाड़ी पर पहुंच गए। काफी कोशिशों के बाद ताशी को उनका याक तो दिख गया, लेकिन उसके साथ ही उन्होंने दूर से पहाड़ के उस पार चल रही जिन गतिविधियों को देखा।
क्या था वहां नजारा और क्या देखा ताशी ने?
उनके पांव तले जमीन खिसक गई। पहले तो उन्हें लगा कि पहाड़ी के दूसरी ओर कुछ शिकारी हैं, लेकिन दिमाग को यह समझते देर नहीं लगी कि देश में दुश्मनों की घुसपैठ हो चुकी है! ताशी फौरन उल्टे पांव लौटे और शरीर की पूरी ताकत लगा कर सैनिक छावनी की ओर भागे।
अब ताशी को न तो अपना खोया हुआ याक सूझ रहा था और न ही थकान हो रही थी। वो दौड़ते भागते किसी तरह जवानों के पास पहुंचे और उन्हें यह सूचना दी कि पाकिस्तानी सैनिक घुसपैठ कर यहां तक पहुंच चुके हैं और बाल्टिक सेक्टर की पहाड़ी में छुपे हुए हैं। ताशी की इस सूचना ने समय रहते जवानों को आगाह कर दिया।
ताशी भारत में पाकिस्तानी सैनिकों के घुसपैठ के सबसे पहले चश्मदीद हैं। उन्होंने ही भारतीय सैनिकों को दुश्मनों के घुसपैठ का जानकारी दी थी। उनकी छोटी सी जानकारी ने पूरी लडा़ई का पासा पलट दिया। यह सूचना मिलने के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल में युद्ध छिड़ गया। युद्ध में हमारे करीब 600 सैनिक शहीद हो गए। जो विजयी हो कर लौटे, उनकी हर मौके पर प्रशंसा होती है, आगे भी होती रहेगी... मगर ताशी को कुछ वीरता व सजगता के सम्मान चिन्हों और सरकारी सर्टिफिकेटों में समेट कर भूला दिया गया।
इस महागाथा की पूरी कहानी तो सभी को याद है, मगर एक हीरो को हम भूल गए। ताशी आज भी सरकार से किसी तरह की सार्थक मदद की उम्मीद लगाए बैठे हैं। ताशी बेशक लड़े नहीं, मगर किसी योद्धा के कम नहीं हैं। ताशी न होते तो शायद इस वीर गाथा का विजय तिलक हमारी ललाट पर नहीं सजता।
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