महिला अपराधों के लिए बने कानूनों के दुरुपयोग से पीड़ित होते हैं पुरुष, उनके लिए भी आयोग की जरूरत
यौन शोषण, छेड़छाड़, जबरन शारीरिक संबंध बनाना यानी बलात्कार और ऐसे ही अन्य घिनौने अपराध अक्सर महिलाओं के साथ होते हैं, लेकिन क्या पुरुष भी ऐसे अपराधों से पीड़ित हैं? या फिर क्या महिलाओं द्वारा लगाए गए ऐसे आरोप हमेशा सही होते हैं? क्या इनका गलत उपयोग भी होता है?
पिछले करीब 10 साल से पुरुष अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाली सोशल एक्टिविस्ट बरखा त्रेहान बताती रही हैं कि किस तरह रेप और यौन शोषण जैसे मामलों में लैंगिक समानता यानी जेंडर इक्वैलिटी को नजरअंदाज किया जाता है और पुरुषों पर आरोप लगते ही उन्हें दोषी मान लिया जाता है। हाल में आई उनकी एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म इसी विषय को पुरजोर तरीके से उठाती है।
बरखा त्रेहान कहती हैं कि इस डॉक्यूमेंट्री का मकसद महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराध को कमतर आंकना नहीं है, बल्कि महिलाओं के लिए बनाए गए कानून और प्रावधानों के हो रहे दुरुपयोग पर प्रकाश डालना है।
इस डॉक्यूमेंट्री में यौन शोषण, बलात्कार, घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न के झूठे आरोपों से पीड़ित पुरुषों की केस स्टडीज के माध्यम से दिखाया गया है कि कैसे एक झूठा आरोप एक पुरुष के पूरे परिवार को बर्बाद कर देता है। यहां तक कि कई मामलों में पीड़ित को अपनी जान भी गंवानी पड़ जाती है।
एक उदाहरण देखें कि सर्वजीत सिंह पर तिलकनगर मार्केट में एक लड़की ने झूठा आरोप लगाया और देख लेने की धमकी दी। सर्वजीत बताते हैं कि किस तरह लड़की ने उनका करियर बर्बाद कर दिया। एक लंबे संघर्ष के बाद उन्हें न्याय मिला और वे आरोपमुक्त हुए। वहीं, एक अन्य मामले में जितेंद्र सोनी ने पत्नी और ससुरालवालों की प्रताड़ना से तंग आकर खुदकुशी कर ली।
सुप्रीम कोर्ट के वकील विवेक नारायण शर्मा कहते हैं कि कई मामलों में जब भी कोई महिला किसी पुरुष के विरुद्ध मुकदमा दायर करती है तो प्राथमिकी दर्ज होते ही पुरुष के खिलाफ शोर-शराबा होने लगता है। परिवार को नुकसान पहुंचता है, मानहानि होती है, नौकरी भी चली जाती है। ऐसी भी परिस्थितियां बनती है कि पुरुष आत्महत्या कर लेते हैं।
क्राइम ब्रांच में एसीपी रह चुके भानुप्रताप बार्गे भी मानते हैं कि आईपीसी की धारा 498ए में संशोधन होना चाहिए। आंकड़ों के आधार पर वे बताते हैं कि देश में करीब इसके एक लाख मामले दर्ज हैं। इससे परिवार बर्बाद हो रहे हैं, इसलिए इसमें संशोधन की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी दहेज कानून के दुरुपयोग पर चिंता जताई है। कोर्ट ने माना है कि इससे लोगों को परेशान किया जा रहा है। सिर्फ शिकायत के आधार पर गिरफ्तारी न हो। इस संबंध में राज्य सरकारें पुलिस को निर्देश जारी करे। पुलिस गिरफ्तारी की जरूरत देखे और मजिस्ट्रेट गैरकानूनी गिरफ्तारियां रोके। हिरासत बढ़ाने से पहले सबूत देखे।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के आधार पर पत्रकार जागृति शुक्ला बताती हैं कि शादीशुदा महिलाओं से ज्यादा शादीशुदा पुरुषों के खुदकुशी करने के मामले काफी ज्यादा हैं। वह कहती हैं कि नारी सशक्तीकरण का मतलब पुरुषों से नफरत करना नहीं हो सकता।
फिल्मकार मनीष गुप्ता कहते हैं कि पुरुषों के प्रति द्वेष और पूर्वाग्रहों से ग्रसित नारीवाद उतने ही खतरनाक हैं, जितना कि नारियों के प्रति। भारतीय संविधान समान कानून की बात करता है, इसलिए सभी पुरुषों और महिलाओं को मिलकर लैंगिक समानता के लिए प्रयास करने चाहिए।
क्या हम कोई ऐसा कानून नहीं ला सकते जिससे यौन अपराधों के आरोपी पुरुषों की पहचान छिपी रहे, जबतक वह दोषी करार नहीं दिया जाता? क्या समाज में उनकी सुरक्षा के लिए कोई प्रयास नहीं होना चाहिए? डॉक्यूमेंट्री हमें और भी कई सवालों के साथ छोड़ जाती है।