विशेषज्ञ से जानें: कोरोना की दूसरी लहर में क्यों हो रही है सांस लेने में ज्यादा दिक्कत?
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डॉ मनीष सिंघल
कैंसर रोग विशेषज्ञ
देश में कोरोना वायरस के तेजी से बढ़ते मामलों के कारण अफरातफरी मची हुई है। ऑक्सीजन और आईसीयू बेडों की कमी के कारण लोगों को खासा परेशान होना पड़ रहा है। ऐसे में लोगों के मन में एक सवाल यह उठ रहा है कि आखिर संक्रमण के दूसरे लहर में लोगों के ऑक्सीजन की इतनी जरूरत क्यों महसूस हो रही है? कोरोना के नए स्ट्रेन के कारण सांस लेने में दिक्कत महसूस होने का क्या कारण हो सकता है?
अमर उजाला फाउंडेशन की पहल पर रोजाना शाम पांच बजे देश के जाने-माने चिकित्सकों से बातचीत के दौरान हमने इस बारे में जानने की कोशिश की। आइए जानते हैं कि विशेषज्ञ इसके पीछे किन कारणों को जिम्मेदार मानते हैं?
क्यों हो रही है सांस लेने में दिक्कत
कैंसर रोग विशेषज्ञ, डॉ मनीष सिंघल बताते हैं कि इस बार सांस लेने में हो रही दिक्कत कोरोना को नए स्ट्रेन और डबल म्यूटेशन के कारण हो रही है। लोगों को इस बार ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत है क्योंकि ऐसे भी देखने को मिल रहा है कि वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड भी पिछले स्ट्रेन के मुकाबले कम है।
जहां पहले वायरस के संपर्क में आने के 6-8 दिनों के बाद लक्षण दिखते थे वहीं अब नए स्ट्रेन में तीन से चार दिनों में ही लोगों को परेशानी होने लग रही है। इस स्थिति में बहुत जरूरी है कि हम और सतर्क होकर संक्रमण से मुकाबले को तैयार रहें।
सांस की दिक्कत को कैसे पहचानें
यदि आप एक मिनट में 25-30 बार सांस ले रहे हैं और ऑक्सीमीटर सेचुरेशन लगातार 95 से कम दिखा रहा है तो इसे सांस की दिक्कत के रूप में देखा जा सकता है। सामान्य तौर पर जिसे सांस की दिक्कत होती है उसको बुखार और उससे जुड़ी अन्य दिक्कतें होना सामान्य हो जाता है।
किन लक्षणों पर रखें विशेष ध्यान
डॉ मनीष सिंघल के मुताबिक इस समय इन लक्षणों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है।
- पांच दिनों से लगातार बुखार महसूस होना।
- पैरासीटामॉल लेने के बाद भी 100-101 से बुखार कम न होना।
- एक मिनट में 25-30 बार सांस लेना।
कैसे बढ़ाई ऑक्सीजन का स्तर
डॉ मनीष सिंघल के मुताबिक ऐसे समय में घबराएं नही। उल्टे लेटकर रहने से भी शरीर में ऑक्सीजन के स्तर में सुधार हो सकता है। शरीर में ऑक्सीजन के स्तर में अगर फिर भी सुधार नहीं होता है तो आप घर पर ही ऑक्सीजन सिलेंडर की व्यवस्था करें। गंभीर स्थिति में अस्पताल जाना जरूरी हो जाता है।
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नोट: यह लेख कैंसर रोग विशेषज्ञ, डॉ मनीष सिंघल से एक बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।