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''मैं आदर्शों में यकीन करने वाला लेखक नहीं हूं''

Fri, 01 Dec 2017 11:06 AM IST
विजय तेंदुलकर
विजय तेंदुलकर Updated Fri, 01 Dec 2017 11:06 AM IST
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vijay tendulkar shares his independence movement story
विजय तेंदुलकर
एक छात्र के तौर पर मैंने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया था। इस कारण मुझे स्कूल से गैरहाजिर रहना पड़ा था, लेकिन शिक्षकों ने इसके लिए मुझे अपमानित किया। मैं कम बोलता था और मेरे दोस्त भी कम थे। इस कारण छोटी उम्र में ही लेखन के जरिये मैंने खुद को अभिव्यक्त करना शुरू किया।
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फिर मैं रंगालय के लिए नाटक लिखने लगा, जिससे विजया मेहता, डॉ. श्रीराम लागू तथा अरविंद व सुलभा देशपांडे जैसी शख्सियतें जुड़ी हुई थीं। 1960 में रंगालय के बंद होने तक मैं इससे जुड़ा रहा। वे बारह-तेरह साल मेरी रचनात्मकता के सुनहरे दिन थे।
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रंगालय ने मेरी रचनात्मकता पर कभी बंदिश नहीं लगाई। घासीराम कोतवाल और सखाराम बाइंडर जैसे मेरे नाटकों पर बेवजह के विवाद खड़े किए गए। घासीराम कोतवाल मैंने महाराष्ट्र में शिवसेना के उभार और बाल ठाकरे जैसे एक कलाकार के रातोंरात जननेता बन जाने की हकीकत पर लिखा था, लेकिन उसमें मानवीय स्वभावों के बारे में भी बहुत कुछ है।
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मुझे नाटक लेखन में ही सर्वाधिक आनंद आया। हालांकि मैंने श्याम बेनेगल और गोविंद निहलानी जैसे फिल्म निर्देशकों के लिए भी पटकथा लिखी है, लेकिन मुझे जल्दी ही समझ में आ गया था कि फिल्म जैसा माध्यम मेरे लिए नहीं है।


हमारी पीढ़ी आदर्शों में विश्वास करती रही। उसे लगा कि हमारे सपनों का भारत बस बनने ही वाला है। लेकिन मैं आदर्शों में यकीन करने वाला लेखक नहीं हूं। मैं अपने खुरदरे यथार्थ के साथ ही ठीक हूं। लोग कहते हैं कि मेरे लेखन में पत्रकारिता की छाप है। पर मैं इसमें कोई बुराई नहीं देखता।

(विजय तेंदुलकर चर्चित मराठी नाटककार हैं)
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