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                                                                           धुआँ है ज़िंदगी,
जो मिटने का नाम नहीं लेती,
हर पल बदलती रहती है,
मगर कभी ठहरती नहीं।

कभी मन कुछ पाने को बेचैन,
कभी मिला हुआ भी कम लगता है,
कभी सपनों की ऊँची उड़ान,
तो कभी हकीकत का गम लगता है।...और पढ़ें
4 hours ago
                                                                           जब कभी भी
उदासी सताती है मुझे
हो जाता हूं
तब
उद्विग्न, बहुत खिन्न !

मन मेरा
तब देख लेता है आइना में
आसूंओं से
नहाया चेहरा अपना

दिल के सामने
खड़ी
मुस्कुराती...और पढ़ें
4 hours ago
                                                                           मैं तो जी रहा हूँ तेरी यादों के सहारे अब तक,
वरना यूँ ही खुली आँखों से मैं देखा नहीं करता।
हर साँस में तेरा नाम बसा है आज भी,
तेरे बिना यूँ जिंदगी से समझौता नहीं करता।

मेरे जीवन में अँधेरों के सिवा कुछ भी न था...और पढ़ें
17 hours ago
                                                                           बेसबब नहीं है,ये उदासी फ़ज़ाओं की।
बदली हुई है , आज रंगत हवाओं की।।

अब ना वो शोर है,ना ही कशिश है वो।
कौन जाने है ये कैफियत सदाओं की।।
-यूनुस खान...और पढ़ें
17 hours ago
                                                                           लफ्ज नहीं जो कह सकूं , अल्फ़ाज़ है जो तुम पढ़ सको
धड़कने भी खामोश है खामोशी जो तुम पढ़ सको
लिख सकूं न मैं जो हिस्सा है तू वो मेरा
है सुकून तू बेचैनियों का मेरे

है बची एक खामोशी पास मेरे जो न तुम पढ़ सके
आओगे...और पढ़ें
18 hours ago
                                                                           मुस्कान है हृदय का स्पंदन
मुस्कान है आत्मा का गुंजन
मुस्कान में है संवाद
वह आंखों से झलक जाता
मन को आलोकित कर
सबको प्रफुल्लित कर जाता
जब श्रमिक दिन भर की थकान लिए
अपने घर को लौटता है
बच्चों के अ...और पढ़ें
1 day ago
                                                                           आज मैं थोड़ा उदास हूँ,
उदासी मुझे मेरे गाँव की है,
मेरे पहाड़, मेरे घर और मेरे लोगों की है।
हाँ, आज मैं थोड़ा उदास हूँ।

घर से दूर, सब छोड़कर शहर आया हूँ,
एक किराए के कमरे में अक्सर उदास रहता हूँ।
कुछ...और पढ़ें
2 days ago
                                                                           इक मुलाक़ात मिर्ज़ा ग़ालिब से।

पुरानी दिल्ली की तंग बल्लीमारान की गलियों से गुज़रा तो एक शख़्स-सा कोई नज़र आया। आज भी शायद उसी अंदाज़ में, वो वहीं तो बैठा था।
काली मख़मल से बनी किश्ती-नुमा वो टोपी—हाँ, उसे कुलाह कहते हैं—सिर पर...और पढ़ें
3 days ago
                                                                           बचपन की यादे
क्या मस्ती थी?
क्या दोस्ती थी?
खेत खलियानों में
क्या मटरगस्ती थी?
न उदासी थी,
न तनाव था,
बस खेलना ही एक काम था।
न मंजिल, न सपना
न टीबी, न मोबाइल
कितना अच्छा था बचपना?...और पढ़ें
4 days ago
                                                                           आँखे उदास है और लफ़्ज़ पूरी तरह से ख़ामोश है
ना जाने क्यों सब काम ख़त्म करने की जल्दी है ।।
सब कुछ छोड़ कर आगे निकलने का मन करता है
जैसे नदी पर्वत छोड़ आगे सागर से जा मिलती है ।।

ना शौक ना ख्वाहिश ना महंगी फ़ेहरिस्...और पढ़ें
4 days ago
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