धुआँ है ज़िंदगी,
जो मिटने का नाम नहीं लेती,
हर पल बदलती रहती है,
मगर कभी ठहरती नहीं।
कभी मन कुछ पाने को बेचैन,
कभी मिला हुआ भी कम लगता है,
कभी सपनों की ऊँची उड़ान,
तो कभी हकीकत का गम लगता है।...और पढ़ें
जब कभी भी
उदासी सताती है मुझे
हो जाता हूं
तब
उद्विग्न, बहुत खिन्न !
मन मेरा
तब देख लेता है आइना में
आसूंओं से
नहाया चेहरा अपना
दिल के सामने
खड़ी
मुस्कुराती...और पढ़ें
मैं तो जी रहा हूँ तेरी यादों के सहारे अब तक,
वरना यूँ ही खुली आँखों से मैं देखा नहीं करता।
हर साँस में तेरा नाम बसा है आज भी,
तेरे बिना यूँ जिंदगी से समझौता नहीं करता।
मेरे जीवन में अँधेरों के सिवा कुछ भी न था...और पढ़ें
बेसबब नहीं है,ये उदासी फ़ज़ाओं की।
बदली हुई है , आज रंगत हवाओं की।।
अब ना वो शोर है,ना ही कशिश है वो।
कौन जाने है ये कैफियत सदाओं की।।
-यूनुस खान...और पढ़ें
लफ्ज नहीं जो कह सकूं , अल्फ़ाज़ है जो तुम पढ़ सको
धड़कने भी खामोश है खामोशी जो तुम पढ़ सको
लिख सकूं न मैं जो हिस्सा है तू वो मेरा
है सुकून तू बेचैनियों का मेरे
है बची एक खामोशी पास मेरे जो न तुम पढ़ सके
आओगे...और पढ़ें
मुस्कान है हृदय का स्पंदन
मुस्कान है आत्मा का गुंजन
मुस्कान में है संवाद
वह आंखों से झलक जाता
मन को आलोकित कर
सबको प्रफुल्लित कर जाता
जब श्रमिक दिन भर की थकान लिए
अपने घर को लौटता है
बच्चों के अ...और पढ़ें
आज मैं थोड़ा उदास हूँ,
उदासी मुझे मेरे गाँव की है,
मेरे पहाड़, मेरे घर और मेरे लोगों की है।
हाँ, आज मैं थोड़ा उदास हूँ।
घर से दूर, सब छोड़कर शहर आया हूँ,
एक किराए के कमरे में अक्सर उदास रहता हूँ।
कुछ...और पढ़ें
इक मुलाक़ात मिर्ज़ा ग़ालिब से।
पुरानी दिल्ली की तंग बल्लीमारान की गलियों से गुज़रा तो एक शख़्स-सा कोई नज़र आया। आज भी शायद उसी अंदाज़ में, वो वहीं तो बैठा था।
काली मख़मल से बनी किश्ती-नुमा वो टोपी—हाँ, उसे कुलाह कहते हैं—सिर पर...और पढ़ें
बचपन की यादे
क्या मस्ती थी?
क्या दोस्ती थी?
खेत खलियानों में
क्या मटरगस्ती थी?
न उदासी थी,
न तनाव था,
बस खेलना ही एक काम था।
न मंजिल, न सपना
न टीबी, न मोबाइल
कितना अच्छा था बचपना?...और पढ़ें
आँखे उदास है और लफ़्ज़ पूरी तरह से ख़ामोश है
ना जाने क्यों सब काम ख़त्म करने की जल्दी है ।।
सब कुछ छोड़ कर आगे निकलने का मन करता है
जैसे नदी पर्वत छोड़ आगे सागर से जा मिलती है ।।
ना शौक ना ख्वाहिश ना महंगी फ़ेहरिस्...और पढ़ें