आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दरवाज़ा लगाना भूल गए

                
                                                         
                            सामान तो सारा बांध लिया,
                                                                 
                            
पर यादें ले जाना भूल गए।
जल्दी में थे तुम जाने की,
दरवाज़ा लगाना भूल गए।
अलमारी के एक कोने में,
कुछ सूखे फूल अभी बाकी हैं।
जिस राह से तुम हो कर गुज़रे,
उस राह की धूल अभी बाकी है।
सब समेट लिया तुमने लेकिन,
कदमों के निशां मिटाना भूल गए...
जल्दी में थे तुम जाने की,
दरवाज़ा लगाना भूल गए।
वो खिड़की जो अक्सर खुलती थी,
आज भी हवा से बजती है।
तुम्हारे बिना इस कमरे में,
अब सिर्फ उदासी सजती है।
तस्वीरें तो सारी हटा दीं,
पर अपना साया ले जाना भूल गए...
जल्दी में थे तुम जाने की,
दरवाज़ा लगाना भूल गए।
- बजरंग बीकानेरी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर