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सप्तपदी जब तुम वामांगिनी बनी

                
                                                         
                            सप्तपदी जब तुम वामांगिनी बनी
                                                                 
                            

मंगल-ध्वनि से द्वार सजा था,
वेद-मंत्र दोहराते थे।
अग्नि-साक्षी, हाथ में हाथ,
दो कुल पास में आते थे।

माँग तुम्हारी जब सजी थी,
मन में दीपक जलते थे।
सप्तपदी के सात कदम में,
दो से एक हम बनते थे॥

पहला पग था अन्न-वचन का,
मिलकर घर चलाना था।
सूखी रोटी हो या मेवा,
आधा-आधा खाना था।

तुमने पूछा—“साथ दोगे?”
मैंने हाथ बढ़ाया था।
“अन्न हमारा साझा होगा,”
कहकर शीश झुकाया था॥

दूजा पग था शक्ति-वचन का,
एक-दूजे को थामना था।
धूप पड़े या रात घिरे तो,
हाथ नहीं फिर छोड़ना था।

तुमने पूछा—“टूटूँ तो क्या?”
मैंने वचन सुनाया था।
“तेरी पीड़ा मेरी होगी,”
कहकर ढाढ़स बँधाया था॥

तीजा पग समृद्धि-वचन का,
श्रम से घर भरना था।
लोभ कभी संबंध न तोड़े,
इतना ध्यान भी रखना था।

तुमने पूछा—“मन के सपने,
क्या आकार भी पाएँगे?”
मैंने कहा—“तेरे संकल्प,
मिलकर सच हो जाएँगे॥”

चौथा पग था प्रेम-वचन का,
हर सम्मान बचाना था।
रूठे मन को पास बिठाकर,
हँसते हुए मनाना था।

तुमने पूछा—“रूठूँ तो क्या?”
मैंने वचन सुनाया था।
“तेरी चुप्पी भी समझूँगा,”
कहकर तुम्हें मनाया था॥

पाँचवाँ पग कुल की गरिमा,
दोनों घर का मान रहे।
माता-पिता दोनों घर के,
एक समान सम्मान रहे।

तुमने पूछा—“माँ-बाबा भी,
क्या अपने कहलाएँगे?”
मैंने कहा—“दोनों कुल के,
सारे मान निभाएँगे॥”

छठा पग ऋतु-संग वचन था,
हर मौसम अपनाना था।
रोग, अभाव, उदासी आए,
मिलकर पार लगाना था।

तुमने पूछा—“थक जाऊँ तो,
क्या तुम पास में आओगे?”
मैंने कहा—“तेरे दुख में,
मुझको आगे पाओगे॥”

सातवाँ पग मैत्री-वचन था,
सखा-सखी बन जाना था।
उम्र ढले या रूप बदल जाए,
मन का प्रेम बचाना था।

तुमने पूछा—“साथ रहोगे?”
मैंने हाथ दबाया था।
“अंतिम साँस तलक संग हूँ मैं,”
यह विश्वास दिलाया था॥

सात कदम जब पूरे हुए तो,
सप्तपदी कहलायी थी।
अग्नि-साक्षी, वेद-मंत्र ने,
मंगल राह दिखाई थी।

तुमने कहा—“वचन निभाओ,
वाम तुम्हारा मेरा स्थान।”
मैंने कहा—“सहधर्मिणी तुम,
जीवन भर मेरा सम्मान॥”

उस पल केवल पत्नी नहीं तुम,
सहधर्मिणी कहलायी थी।
मैंने भी गृहस्थ-धर्म की,
हर मर्यादा अपनायी थी।

दो कुल के संस्कार मिलाकर,
हमने नींव बनाई थी।
सात फेरों की उस अग्नि में,
नई गृहस्थी पाई थी॥

आज कभी वह लाल चुनरिया,
हाथों में आ जाती है।
मेहँदी की धुँधली रेखा भी,
वह संध्या दिखलाती है।

तेरी चूड़ी की वह रुनझुन,
मन में फिर बज जाती है।
कल की सकुचायी वह दुलहन,
आँखों में मुसकाती है॥

जीवन के हर कठिन मोड़ पर,
मंडप याद दिलाता है।
जब तुम मेरा हाथ थामती,
हर वादा लौट आता है।

सात कदम उस रात चले थे,
अब भी राह दिखाते हैं।
फेरे केवल सात हुए थे,
वचन उम्र भर निभाते हैं॥
— संतोष कुमार शर्मा
 
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एक घंटा पहले

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