आएगा वो दिन, जब तुम भी एक दिन पिता बनोगे,
बचपन की गलियों में फिर लौट-लौटकर चलोगे।
याद आएगा वो आँगन, वो ममता की ठंडी छाया,
तब शायद तुम सोचोगे—माँ-बाप ने क्या-क्या पाया?
खुद बिन खाए सो जाते थे, तुमको भोजन करवाते थे,
अपने हिस्से की रोटी भी, हँसकर तुम्हें खिलाते थे।
कपड़े अपने पुराने पहन, तुमको नए दिलाते थे,
अपनी छोटी-छोटी इच्छाएँ, तुम पर ही लुटाते थे।
कहीं भी जाते, कुछ भी लाते, पहले तुम्हें बुलाते थे,
अपने लिए जो कम पड़ जाता, फिर भी तुम्हें खिलाते थे।
तुम्हारी छोटी-सी खुशी पर, चेहरे खिल-खिल जाते थे,
तुम रोते तो माँ के आँसू, आँखों में भर आते थे।
दिन भर कितनी कठिन मेहनत करके घर वो आते थे,
थके हुए शरीर को फिर भी, तुमको गले लगाते थे।
दिन भर की सारी बातें, बैठ तुम्हें सुनाते थे,
तुमको हँसते, खेलते, पढ़ते, देखकर मुस्काते थे।
तुम्हारी हर एक ठोकर पर, उनका दिल घबराता था,
तुम्हारे गिरने से पहले ही, हाथ बढ़ाने आता था।
तुम्हारे उजले भविष्य खातिर, रातों को जागे कितनी,
अपनी नींदें देकर तुमको, सपनों की दुनिया दी थी।
जब तुम बीमार पड़े कभी, वे रातों को सोए नहीं,
तुम्हारी खातिर मंदिर-मस्जिद, कोई जगह छोड़ी नहीं।
दवा न मिली तो दुआओं से, तुम्हें बचाने निकले थे,
तुम्हारी साँसें चलती रहें, बस इसी आस में जिए थे।
आज वही माँ-बाप अगर, उम्र के पड़ाव पर हैं,
कल तक जो थे मजबूत, आज कमजोर हाथ-पाँव हैं।
आँखों की रोशनी धुंधली है, कदम भी डगमगाते हैं,
कभी तुम्हारी उँगली थामी थी, अब सहारे को तरसते हैं।
क्या तुम उनकी उँगली थामोगे, जैसे उन्होंने थामी थी?
क्या तुम उनकी भूख समझोगे, जैसे उन्होंने जानी थी?
क्या तुम उनकी आँखों में फिर, बचपन की खुशी भरोगे?
जिस प्यार में तुम पले-बढ़े, क्या वही प्यार लौटाओगे?
जब वे बैठे होंगे घर में, चुपचाप तुम्हारी राह निहारते,
दरवाजे की आहट सुनकर, शायद तुम्हें पुकारते।
कभी दवा की जरूरत होगी, कभी किसी से बात की,
कभी अकेलापन काटेगा, कभी जरूरत होगी हाथ की।
तब तुम व्यस्तता का बहाना करके, दूर तो नहीं हो जाओगे?
उनके काँपते हाथों को क्या, अपने हाथों से थामोगे?
जब उन्हें खाने की इच्छा हो, क्या तुम भोजन करवाओगे?
जैसे वे तुम्हें खिलाते थे, क्या तुम भी वैसा खिलाओगे?
जिस माँ ने तुम्हें आँचल देकर, दुनिया से बचाया था,
जिस पिता ने अपना पसीना देकर, जीवन तुम्हारा बनाया था,
क्या उनकी सेवा को तुम अपना, सौभाग्य कभी मानोगे?
या उनकी बूढ़ी आँखों से, बचकर तुम निकल जाओगे?
याद रखना—माँ-बाप कोई बोझ नहीं,
वे जीवन की पहली छाँव हैं।
उनके चरणों में जो सुकून है,
वो दुनिया के सुख में कहाँ है।
आज उनके पास समय है,
कल शायद ये समय न हो,
आज जो कह दो “माँ-बाबूजी”,
कल शायद ये अवसर न हो।
जिस दिन वे इस दुनिया से, चुपचाप चले जाएँगे,
तब तस्वीरों में ढूँढ़ोगे, पर लौटकर नहीं आएँगे।
उनकी आवाज़ सुनने को जब, मन बहुत तड़प जाएगा,
तब पछतावे का एक आँसू, कुछ भी नहीं कर पाएगा।
इसलिए जब तक साथ हैं वे, जी भरकर सम्मान करो,
उनकी छोटी-छोटी इच्छाओं का भी तुम ध्यान करो।
दवा, भोजन, कपड़े, सेवा—सबको अपना धर्म समझो,
उनके चेहरे की मुस्कान को, जीवन का सत्कर्म समझो।
आज तुम्हारे बच्चे हैं, कल तुम भी बूढ़े होगे,
जो बोओगे अपने जीवन में, वही फल तुम भी भोगोगे।
आज अगर तुम सेवा करोगे, कल सेवा पाओगे,
माँ-बाप को दोगे जो सम्मान, बच्चों से वही पाओगे।
बड़ा मकान बना लेना, दौलत खूब कमाना,
दुनिया भर में नाम कमाना, ऊँचा पद भी पाना।
लेकिन उस ऊँचाई का क्या, जहाँ माँ-बाप अकेले हों,
कैसा होगा वो सुख, अगर उनके नयन ही गीले हों?
महल तुम्हारा कितना भी ऊँचा क्यों न हो जाए,
माँ की ममता के आगे छोटा ही रह जाएगा।
दुनिया की सारी दौलत भी कम पड़ जाएगी उस दिन,
जब माँ की गोद और पिता का साया फिर न मिल पाएगा।
इसलिए आज ही लौट चलो, उस प्रेम की परछाईं में,
जिसमें पलकर बड़े हुए तुम, माँ-बाप की बाँहों में।
उनके चेहरे पर मुस्कान दो, उनके मन को सहलाओ,
जिस प्यार से उन्होंने पाला, उसका ऋण कुछ तो चुकाओ।
माँ की आँखों का आँसू मत बनने देना,
पिता के दिल का दर्द मत बनने देना।
जिस घर में तुम्हारे लिए दुआएँ उठती थीं,
उस घर में कभी उदासी मत बनने देना।
जब तक उनके हाथ तुम्हारे सिर पर हैं,
तब तक तुम सचमुच धनवान हो।
जब तक उनकी दुआ तुम्हारे साथ है,
तब तक तुम सबसे भाग्यवान हो।
आएगा वो दिन, तुम भी पिता बनोगे,
तुम्हारे बच्चे तुमसे सवाल करेंगे।
तब तुम अपने जीवन को पीछे मुड़कर देखोगे—
और तुम्हारे कर्म ही तुम्हारा उत्तर देंगे।
इसलिए आज ऐसा जीवन जी जाओ,
जिस पर कल तुम्हें अभिमान हो।
माँ-बाप की सेवा करते हुए,
तुम्हारे बच्चों को भी संस्कार मिले—
कि माता-पिता की सेवा कोई एहसान नहीं,
यह उस प्रेम का प्रतिदान है,
जो उन्होंने अपना पूरा जीवन देकर
तुम्हें दिया है।
**माँ-बाप को प्यार दे दो,
जीवन में इससे बड़ा धन क्या होगा।
उनके चेहरे पर मुस्कान रख दो,
इससे बड़ा कोई पुण्य क्या होगा।
आज उनके पास बैठ जाओ—
कल शायद कुर्सी खाली मिले।
आज उनका हाथ पकड़ लो—
कल शायद हाथ ही न मिले।
जो प्यार मिला था बचपन में,
उसे लौटाने का समय यही है।
माँ-बाप के संग जी लो कुछ पल,
यही जीवन की सच्ची कमाई है।
-सूबा लाल "अंजाना"
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