तुम्हारे साथ चलते-चलते
मैंने जाना है—
प्रेम केवल
हाथ थाम लेने का नाम नहीं,
यह तो उस मौन को समझना है
जहाँ शब्द पहुँच नहीं पाते।
जीवन की राह में
हर दिन फूल नहीं खिलते,
कुछ रास्ते पथरीले भी होते हैं,
कुछ मोड़ अनजाने,
कुछ शामें ऐसी
जब मन अपने ही भीतर
सिमट जाना चाहता है।
ऐसे ही किसी कठिन मोड़ पर
जब मैंने स्वयं को अकेला पाया,
तुमने कोई बड़ी बात नहीं कही—
बस चुपचाप मेरे पास बैठे रहे,
और तुम्हारी उस ख़ामोशी ने
मुझे फिर से जीना सिखा दिया।
अब प्रेम मेरे लिए
उत्सव की चकाचौंध नहीं,
वह तो सुबह की वह पहली किरण है
जो बिना दस्तक दिए
मन के बंद द्वार खोल देती है।
तुम्हारे साथ
मैंने सपनों से अधिक
सच्चाइयों को चाहा है,
क्योंकि झूठी चमक से सुंदर
वह विश्वास है
जो साधारण दिनों में भी
रिश्ते को असाधारण बनाए रखता है।
कभी मेरी आँखों में
थकान उतर आए,
तो उसे पढ़ लेना,
कभी मेरी हँसी में
उदासी घुल जाए,
तो उसे सुन लेना।
मैं भी तुम्हारे हिस्से की
हर अनकही पीड़ा
अपने मन में रख लूँगी,
तुम्हारी चुप्पियों के पीछे छिपे
उस व्यक्ति को
हर बार पहचान लूँगी
जिसे दुनिया शायद समझ न पाए।
उम्र धीरे-धीरे
हमारे चेहरे बदल देगी,
बालों में चाँदी उतर आएगी,
कदमों की रफ़्तार थम जाएगी—
मगर मेरी चाहत है,
तब भी तुम्हारे पास बैठकर
बीते हुए वर्षों को
मुस्कुराकर देखा करूँ।
न कोई शिकायत शेष हो,
न कोई अधूरा हिसाब,
बस यह संतोष रहे
कि हमने एक-दूसरे को
बदलने की कोशिश नहीं की,
बल्कि जैसे थे
वैसे ही स्वीकार किया।
और जब जीवन की पुस्तक का
अंतिम पृष्ठ आए,
तो उस पर
कोई बड़ी कहानी नहीं—
बस दो शब्द लिखे हों—
“साथ निभाया।”
यही मेरे लिए
प्रेम की सबसे सुंदर परिभाषा है—
तुम मेरे जीवन की
सबसे चमकीली पंक्ति नहीं,
बल्कि वह स्याही हो
जिससे मेरी पूरी कहानी
अर्थ पा गई।
- अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'
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