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काव्य संग्रह 'कामनाहीन पत्ता' से पूनम अरोड़ा की 3 चुनिंदा कविताएं
Mon, 18 Apr 2022 03:41 PM IST
काव्य डेस्क
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Published by: काव्य डेस्क
Updated Mon, 18 Apr 2022 03:41 PM IST
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साहित्य
- फोटो : amar ujala
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पूनम अरोड़ा की कविताएं आत्मबोध और आत्मानुसंधान की कविताएं हैं। कविताओं की संप्रेषणीयता इतनी तीव्र है कि सीधे काव्य प्रेमियों के अंतर्मन तक उतर जाती है। स्वयं के बोध का इतनी निर्मम और अभय अभिव्यक्ति ही उनको आधुनिक कविता की पंक्ति में अलग खड़ा करती है। 'कामनाहीन पत्ता' पूनम का पहला कविता संग्रह है जो वाणी प्रकाशन से प्रकाशित है। 26 नंबर 1979 को जन्मी पूनम की दो कहानियां, 'आदि संगीत' और 'एक नूर से सब जग उपजे' को हरियाणा साहित्य अकादमी का युवा लेखन पुरस्कार मिल चुका है। 2016 में एक अन्य कहानी 'नवंबर की नीली रातें' भी पुरस्कृत है। इसके अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में इनकी कविताएं और कहानियां प्रकाशित हो चुकी हैं। प्रस्तुत है पूनम अरोड़ा के काव्य संग्रह 'कामनाहीन पत्ता' से 3 चुनिंदा कविताएं-
जैसे अनिवार्य है
साँस का हवा में घुलना
वैसे ही अनिवार्य है
प्रेम का बिना जड़ के केवल शाखाओं पर उगना
जड़ें बाँधती हैं
और प्रेम कब बंधा है
प्रेम का आगमन भी उतना ही निरीह है जितना निर्वासन
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जैसे अनिवार्य है
साँस का हवा में घुलना
वैसे ही अनिवार्य है
प्रेम का बिना जड़ के केवल शाखाओं पर उगना
जड़ें बाँधती हैं
और प्रेम कब बंधा है
प्रेम का आगमन भी उतना ही निरीह है जितना निर्वासन
एक नदी थी
जो नृत्य करना चाहती थी
वह हर रात मेरी माँ से निकलती थी
जब वह खिड़की से चाँद देखती थी
मैं कभी बूढ़ी नहीं हुई
क्योंकि सूर्य का ताप
उसकी अलसायी उम्र को लगातार प्रेम करता रहा
वह जादू सिखाता रहा
और मां सीखती रही
भ्रम टूटते रहे और मैं बार-बार जन्मती रही
जो नृत्य करना चाहती थी
वह हर रात मेरी माँ से निकलती थी
जब वह खिड़की से चाँद देखती थी
मैं कभी बूढ़ी नहीं हुई
क्योंकि सूर्य का ताप
उसकी अलसायी उम्र को लगातार प्रेम करता रहा
वह जादू सिखाता रहा
और मां सीखती रही
भ्रम टूटते रहे और मैं बार-बार जन्मती रही
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अदृश्य दीवारों के पीछे
रचती है दृश्य
गिनती है अनगिनत महीने गर्भ के
देखती है सपाट उदर को बढ़ते
हाथ पिता के छूती है
जैसे स्पर्श किया हो ईश्वर की कोमलता को
उधेड़ती है कल्पना की चादरें
और सीती है दोहरे आयाम
दयनीय और आक्रामक
विद्रोह और मर्म के
जानती है जन्म देने से केवल
नहीं हो सकती माँ
इसलिए
रचना होगा प्रेमी, सन्तान और ईश्वर को
अपने ही सम्मोहन से
रचती है दृश्य
गिनती है अनगिनत महीने गर्भ के
देखती है सपाट उदर को बढ़ते
हाथ पिता के छूती है
जैसे स्पर्श किया हो ईश्वर की कोमलता को
उधेड़ती है कल्पना की चादरें
और सीती है दोहरे आयाम
दयनीय और आक्रामक
विद्रोह और मर्म के
जानती है जन्म देने से केवल
नहीं हो सकती माँ
इसलिए
रचना होगा प्रेमी, सन्तान और ईश्वर को
अपने ही सम्मोहन से