आप भी शुरू कीजिए ये अनोखे 'बिजनेस', लागत कुछ नहीं और कमाई बेशुमार
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इस भागती-दौड़ती ज़िन्दगी में क्या आपने कभी सोचा है कि काश आपके निजी काम कोई और कर दे। ऐसे में लोगों की ज़िंदगी को आसान बनाने के लिए कुछ नए लेकिन अनोखे बिज़नेस सामने आ रहे हैं।
'गेट माई पीओन'
इस वेबसाइट के स्टाफ़ आपके रोज़मर्रा के काम जैसे कि बिजली का बिल भरना या किराने का सामान घर पहुंचाना इत्यादि, कर देते हैं। यह वे काम हैं जिनके लिए आपको अपनी व्यस्त दिनचर्या से अलग समय निकालना पड़ता है।
30 वर्षीय भरत अहिरवार के बिज़नेस आइडिया ने इस परेशानी का हल ढूंढ लिया है। वे कहते है, 'ये भारत की पहली ऐसी कंपनी है जो आपके रोज़ के कामों के लिए एक आदमी उपलब्ध करवाती है फिर चाहे किसी के लिए तोहफ़ा पंहुचाना हो या फिर आपके घर में छूटा कोई दस्तावेज़ आपके दफ़्तर ले जाना हो- हम वह काम उसी दिन दिए गए समय में पूरा करते हैं।'
साल 2013 में मुंबई से अपनी कंपनी की शुरूआत करने वाले भरत कहते हैं, 'शुरुआत के दिनों में एक महीने हम केवल 35 से 40 ऑर्डर लिया करते थे लेकिन आज तीन साल बाद हम एक दिन मे 200 से 250 ऑडर्स पूरे करते हैं। आज हम डेढ़ करोड़ रूपए के टर्नओवर वाली कंपनी बन चुके है।'
'सीक शेरपा' का नाम सुना है आपने?
अगर आप किसी नए शहर जा रहे हैं और आपको किसी स्थानीय निवासी के साथ शहर घूमने का मौक़ा मिले तो यह एक अलग अनुभव होगा। इसी थीम पर साल 2014 में दिल्ली में ध्रुव राज आनंद ने 'सीक शेर-पा' नाम से एक 'टूर गाइड' वेबसाइट और मोबाईल ऐप शुरू की।
ध्रुव के मुताबिक़, 'हमारे टूर गाइड, पर्यटकों को ऐसे माइक्रो टूर करवाते हैं जो सामान्य टूर गाइड शायद नहीं करवा सकते क्योकिं इस ऐप में हम ऐसे लोगों को उपलब्ध कराते हैं जो शहर के स्थानीय निवासी हैं जिन्हें उस जगह की विस्तार में जानकारी होती है।'
हालांकि टूर गाइड और पर्यटकों का पुलिस वेरिफ़िकेशन और उनकी सुरक्षा का सवाल इस बिज़नेस के साथ जुड़ा हुआ है। 50 लाख़ के निवेश पर बनी यह कंपनी दिल्ली, मुंबई और कोलकाता के बाद अब भारत के 15 और शहरों में अपना काम शुरु करने वाली है।
और ये है 'मटरफ़्लाई'
24 वर्षीय अक्षय भाटिया लंदन में 'मॉर्गन स्टैनली' नाम की कंपनी में काम किया करते थे जब उन्हें 'मटरफ़्लाई' मोबाइल ऐप बनाने का ख़्याल आया।
अपनी नौकरी छोड़ स्वदेश लौटे अक्षय ने 'फ़ूड शेरिंग प्लेटफॉर्म' के आधार पर यह ऐप बनाई जहां आप अपना खाना अपने पड़ोसी के साथ स्वेच्छा से बांट सकते हैं।
अक्षय कहते हैं, 'लंदन में मैंने घर से बाहर रह रहे लोगों, ख़ासकर अकेले युवाओं को अच्छे खाने के लिए तरसते देखा और यहीं से इस ऐप का विचार मुझे मिला।'
वो कहते हैं, 'हमारे ऐप के ज़रिए आप अपने आसपास ऐसे लोगों के बारे में जान सकते हैं जो आपके साथ खाना बांटने को तैयार हैं। इसके लिए हम कोई चार्ज नहीं करते लेकिन यूज़र चार्ज़ कर सकता है।'
'कमाल का है ये ऐप'
न्यूयॉर्क से भारत काम करने आई श्रेया ने इस ऐप का इस्तेमाल किया है और वो बताती हैं कि इस ऐप के ज़रिए कई बार उन्होंने आस-पड़ोस के घरों में बन रहे खाने का ज़ायक़ा लिया है।
लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि इस ऐप से आप हमेशा लज़ीज़ खाना ही खा पाएंगे, कई बार खाने की तलाश में लोग ऐसे घरों में भी पहुंचे हैं जहां खाना किसी सड़क किनारे के ढाबे से भी बुरा था।
इस पर 'मटरफ़्लाई' के संस्थापक अक्षय हंसते हुए कहते हैं, 'इसलिए ही हम लोगों से चार्ज नहीं करते क्योंकि हम हर घर के खाने की क्वालिटी पर नज़र नहीं रख सकते, खाने को लेकर आपको ही सावधान रहना होगा।'
फ़िलहाल इस ऐप में एक लाख रूपए लगा चुके अक्षय इसके डेटाबेस को बड़ा करने में जुटे हुए हैं और क्योंकि मामला खान पान से जुड़ा है तो उन्हें कई सरकारी संस्थाओं से इसके लिए मंज़ूरी लेनी पड़ रही है।