तनाव में आकर खुद को ऐसे नुकसान पहुंचा रहे हैं युवा
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दुनियाभर में लोगों का तनावग्रस्त होना कोई नई बात नहीं है। इससे बचने के लिए लोग मनोचिकित्सक, प्राणायाम आदि का सहारा लेते हैं। लेकिन अगर बात युवाओं की करें तो एक नई कहानी सामने आती है। आजकल के युवा तनाव की स्थिति में आने के बाद खुद को कई तरह से नुकसान पहुंचा रहे हैं। चिकित्सकीय क्षेत्र में युवाओं की इस तनावग्रस्त स्थिति को 'नॉन-सुसाइड डेलिबरेट सेल्फ हार्म' कहा जाता है।
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दुनियाभर में लोगों का तनावग्रस्त होना कोई नई बात नहीं है। इससे बचने के लिए लोग मनोचिकित्सक, प्राणायाम आदि का सहारा लेते हैं। लेकिन अगर बात युवाओं की करें तो एक नई कहानी सामने आती है। आजकल के युवा तनाव की स्थिति में आने के बाद खुद को कई तरह से नुकसान पहुंचा रहे हैं। चिकित्सकीय क्षेत्र में युवाओं की इस तनावग्रस्त स्थिति को 'नॉन-सुसाइड डेलिबरेट सेल्फ हार्म' कहा जाता है।
यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें युवा खुद को ही नुकसान पहुंचाते हैं। वह खुदकुशी तो नहीं करते लेकिन अपने तनाव को कम करने के लिए कई तरह से खुद को नुकसान पहुंचाने लगते हैं। मुंबई में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट के तौर पर काम करने वाली सोनाली गुप्ता का कहना है कि उनके पास एक लड़की इलाज के लिए आई। उसने अक्तूबर के गर्म मौसम में भी फुल बाजू की कमीज पहनी हुई थी।
करीब चार सेशन के बाद जब उन्होंने उससे इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि उसने ब्लेड से अपने दोनों हाथों को काटा है। उन्हीं चोटों को ढंकने के लिए उसने फुल बाजू की कमीज पहनी है। उसने यह भी कहा कि वह खुद को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहती थी लेकिन ऐसा करने से उसका तनाव कम होता है।
सोनाली गुप्ता का कहना है कि तनाव की इस स्थिति में युवा खुद को चाकू, ब्लेड और कंपास से नुकसान पहुंचाते हैं। इस स्थिति को मानसिक रोग वशेषज्ञ बेहतर तरीके से समझते हैं।
ये हैं संकेत-
- जब बच्चा खुद को नुकसान पहुंचाने की बात करे।
- जब हाथ पर कई बार कट का निशान दिखे। इसमें एक ही जगह पर कई बार कट लगाया जाता है। साथ ही यह चोट एक्सिडेंट की चोट जैसी नहीं लगती।
- घाव भरने से पहले ही उसे ढंकने के लिए फुल कपड़े और बैंड एड का इस्तेमाल करना।
- व्यवहार में बदलाव दिखना।
- जेब में ब्लेड, पॉकिट वाले चाकू और चोट पहुंचाने वाले अन्य सामान का मिलना।
सोशल मीडिया भी है जिम्मेदार
- स्कूल में दूसरे कपड़े पहनने के लिए मना करना। जैसे स्विमिंग आदि के लिए।
डॉक्टर के. जॉन विजय सागर का कहना है कि ऐसा करना कोई नई बात नहीं है। काफी समय से युवा ये सब कर रहे हैं। लेकिन एक अच्छी बात ये भी है कि अब कई युवा इलाज करवाने के लिए आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि ये खुदकुशी की कोशिश जैसा लगता है लेकिन इससे बिल्कुल उलट होता है। यह स्थिति लड़कियों में सबसे ज्यादा पाई जाती है।
माता पिता के लिए भी यह सब समझ पाना काफी मुश्किल है। अपनी बेटी का इलाज कराने दिल्ली से मुंबई आए एक पिता का कहना है कि आजकल बच्चे जब भी तनाव में होते हैं तो वह सोशल मीडिया पर हर पल की अपडेट पोस्ट करते रहते हैं। यह एक अच्छी स्थिति नहीं है। इसके लिए काफी हद तक सोशल मीडिया भी जिम्मेदार है।
वहीं एक अन्य डॉक्टर का कहना है कि आज के समय में युवाओं को एक बात काफी ज्यादा प्रभावित करती है। और वह स्थिति है 'वे अच्छे नहीं हैं'। उनमें खुद को परफेक्ट दिखाने की होड़ सी लगी रहती है। चाहे वह कितने भी ठीक दिखते हों लेकिन खुद में कोई न कोई कमी निकाल ही लेते हैं। इससे भी उनमें तनाव का स्तर बढ़ता रहता है। जब अधिक तनाव हो जाता है तो वह खुदकुशी तक कर लेते हैं।