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Supreme Court News: कॉलेजियम की सिफारिश वाले जजों की नियुक्ति में देरी, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- ये स्वीकार्य नही
Fri, 11 Nov 2022 04:34 PM IST
Amit Mandal
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Amit Mandal
Updated Fri, 11 Nov 2022 04:34 PM IST
सार
पीठ ने केंद्र को नोटिस जारी कर पिछले साल शीर्ष अदालत के 20 अप्रैल के आदेश में समय पर नियुक्ति के लिए निर्धारित समय सीमा की जानबूझकर अवज्ञा करने का आरोप लगाने वाली याचिका पर जवाब मांगा।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा दोहराए गए नामों सहित उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों के रूप में नियुक्ति के लिए अनुशंसित नामों को लंबित रखने पर केंद्र से नाखुशी जताते हुए कहा कि यह स्वीकार्य नहीं है। शीर्ष अदालत ने कहा कि नामों को लंबित रखना ऐसे लोगों को अपने नाम की सहमित वापस लेने पर मजबूर करने का तरीका लग रहा है, जिनके नामों की सिफारिश उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों के रूप में नियुक्ति के लिए की गई है। न्यायमूर्ति एस के कौल और न्यायमूर्ति ए एस ओका की पीठ ने कहा कि नामों को लंबित रखना स्वीकार्य नहीं है।
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शीर्ष अदालत के 20 अप्रैल के आदेश की अवज्ञा
पीठ ने केंद्रीय कानून मंत्रालय के मौजूदा सचिव (न्याय) को नोटिस जारी कर पिछले साल शीर्ष अदालत के 20 अप्रैल के आदेश में समय पर नियुक्ति के लिए निर्धारित समय सीमा की जानबूझकर अवज्ञा करने का आरोप लगाने वाली याचिका पर जवाब मांगा। एडवोकेट्स एसोसिएशन बेंगलुरु द्वारा वकील पई अमित के माध्यम से दायर याचिका ने उच्च न्यायालयों में जजों की नियुक्ति के साथ-साथ नामों के पृथक्करण में असाधारण देरी के मुद्दे को उठाया है।
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इसने 11 नामों का उल्लेख किया है जिनकी सिफारिश की गई थी और बाद में उन्हें दोहराया भी गया था। शीर्ष अदालत ने उल्लेख किया कि उच्च न्यायालयों में रिक्तियों की गंभीर स्थिति और न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी ने शीर्ष अदालत की तीन-न्यायाधीशों की पीठ को पिछले साल 20 अप्रैल के आदेश को पारित करने के लिए बाध्य किया था, जिसमें समय सीमा निर्धारित करने की मांग की गई थी। पीठ ने कहा कि अगर हम विचार के लिए लंबित मामलों की स्थिति को देखें, तो सरकार के पास 11 मामले लंबित हैं, जिन्हें कॉलेजियम ने मंजूरी दे दी थी और अभी तक नियुक्ति की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
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केंद्र ने कहा, जीएम फसलों का विरोध निराधार
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि आनुवंशिक रूप से संशोधित (जीएम) फसलों का विरोध निराधार है क्योंकि भारत पहले से ही इससे प्राप्त तेल का आयात और उपभोग कर रहा है। शीर्ष अदालत के समक्ष दायर एक हलफनामे में पर्यावरण और वन मंत्रालय (MoEF) ने कहा कि रिफाइंड पाम तेल, सोया तेल और सरसों के तेल की औसत कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और घरेलू खपत की मांग को पूरा करने के लिए भारत को तेल उत्पादन में स्वतंत्र होने की आवश्यकता है। मंत्रालय ने शीर्ष अदालत को बताया कि सरसों भारत की सबसे महत्वपूर्ण तेल और बीज खाद्य फसल है, जो लगभग 8-9 मिलियन हेक्टेयर भूमि में उगाई जाती है और एक लंबी प्रक्रिया के बाद ट्रांसजेनिक सरसों के संकर, डीएमएच -11 की पर्यावरणीय मंजूरी मिल गई है।
हलफनामे में कहा गया है कि चूंकि भारत जीएम फसलों से प्राप्त तेल का आयात और उपभोग कर रहा है, इसलिए निराधार आशंकाओं के आधार पर ऐसी प्रौद्योगिकियों का विरोध केवल किसानों, उपभोक्ताओं और उद्योग को नुकसान पहुंचाएगा। व्यावसायिक खेती के लिए आनुवंशिक रूप से संशोधित सरसों को मंजूरी देने के जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (जीईएसी) के फैसले के खिलाफ एक याचिका के जवाब में हलफनामा दायर किया गया था। वन मंत्रालय ने आगे कहा कि देश में उगाई जाने वाली कपास एक जीएम फसल है और भारत सालाना लगभग 9.5 मिलियन टन कपास बीज और 1.2 मिलियन टन कपास तेल का उत्पादन करता है।
हलफनामे में कहा गया है कि चूंकि भारत जीएम फसलों से प्राप्त तेल का आयात और उपभोग कर रहा है, इसलिए निराधार आशंकाओं के आधार पर ऐसी प्रौद्योगिकियों का विरोध केवल किसानों, उपभोक्ताओं और उद्योग को नुकसान पहुंचाएगा। व्यावसायिक खेती के लिए आनुवंशिक रूप से संशोधित सरसों को मंजूरी देने के जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (जीईएसी) के फैसले के खिलाफ एक याचिका के जवाब में हलफनामा दायर किया गया था। वन मंत्रालय ने आगे कहा कि देश में उगाई जाने वाली कपास एक जीएम फसल है और भारत सालाना लगभग 9.5 मिलियन टन कपास बीज और 1.2 मिलियन टन कपास तेल का उत्पादन करता है।
दिल्ली में अधिकारियों के तबादलों और पोस्टिंग के अधिकार को लेकर सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दिल्ली में अधिकारियों के तबादलों और पोस्टिंग को लेकर दिल्ली में प्रशासनिक सेवाओं को नियंत्रित करने वाले विवादास्पद मुद्दे पर विवाद से संबंधित मामले में किसी भी दलील को दाखिल करने पर रोक लगा दी। आम आदमी पार्टी सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने भारत के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति हेमा की पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि दिल्ली के उपमुख्यमंत्री ने प्रशासन में पक्षाघात दिखाने के लिए एक हलफनामा दायर किया।
सिंघवी ने अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार के साथ नौकरशाहों द्वारा असहयोग के कारण दिल्ली में प्रशासन के काम प्रभावित होने का जिक्र किया। केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) संजय जैन ने इस मामले में सिसोदिया द्वारा हलफनामा दाखिल करने पर आपत्ति जताई और दिल्ली सरकार पर शीर्ष अदालत में दायर होने से पहले हलफनामा मीडिया में लीक करने का भी आरोप लगाया। सिंघवी ने प्रेस में हलफनामा साझा करने के आरोप का खंडन किया। पीठ ने सिंघवी से कहा कि दिल्ली सरकार बिना हलफनामा दाखिल किए भी ऐसा कह सकती थी। हम केंद्र से इस हलफनामे पर जवाब दाखिल करने के लिए नहीं कहेंगे। हम संवैधानिक मुद्दों से निपटेंगे।
सिंघवी ने अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार के साथ नौकरशाहों द्वारा असहयोग के कारण दिल्ली में प्रशासन के काम प्रभावित होने का जिक्र किया। केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) संजय जैन ने इस मामले में सिसोदिया द्वारा हलफनामा दाखिल करने पर आपत्ति जताई और दिल्ली सरकार पर शीर्ष अदालत में दायर होने से पहले हलफनामा मीडिया में लीक करने का भी आरोप लगाया। सिंघवी ने प्रेस में हलफनामा साझा करने के आरोप का खंडन किया। पीठ ने सिंघवी से कहा कि दिल्ली सरकार बिना हलफनामा दाखिल किए भी ऐसा कह सकती थी। हम केंद्र से इस हलफनामे पर जवाब दाखिल करने के लिए नहीं कहेंगे। हम संवैधानिक मुद्दों से निपटेंगे।