Politics: क्या रोटी पलटने में माहिर मराठा सरदार शरद पवार बचा पाएंगे राजनीति में साख? सामने खड़ी है बड़ी चुनौती
महाराष्ट्र के दर्जन भर से अधिक वरिष्ठ नेताओं से बातचीत में कोई खुलकर और विश्वास से कुछ कहने की स्थिति में नहीं है। अजित पवार को लेकर तमाम नेताओं का कहना है कि राजनीति में अजित की कोई हैसियत नहीं है। वह जो भी हैं अपने चाचा शरद पवार द्वारा खड़े किए और तीन बार के उप मुख्यमंत्री, विधानसभा में विरोधी दल के नेता हैं।
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मराठा सरदार शरद पवार की 83 वर्ष की आयु में राजनीतिक साख दांव पर है। 2019 की तरह उनके भतीजे अजित पवार ने फिर उनकी साख को दांव पर लगाया है। शरद पवार वाईबी चह्वाण सेंटर में हैं और उनसे मिलने साथ छोड़कर गए प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल, दिलीप वलसे पाटिल और तटकरे पहुंचे। इस हलचल के बीच शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के संजय राउत खामोश हैं। उद्धव ठाकरे भी 2019 में अजित पवार के शपथ ग्रहण के बाद वाली राजनीतिक सरगर्मी नहीं दिखा रहे हैं। शिवसेना को छोड़िए। महाविकास अघाड़ी की मुख्य घटक दल कांग्रेस के नेता सुशील कुमार शिंदे, बाला साहब थोराट, नाना पटोले और पृथ्वीराज चह्वाण भी मानों तेल और तेल की धार देख रहे हैं। सबकी निगाह आगे टिकी है कि अब पवार साहब क्या करते हैं?
चार साल पीछे यानी 2019 में चलते हैं। महाराष्ट्र के चुनाव नतीजे आने के बाद एनसीपी प्रमुख शरद पवार संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से संसद भवन में उनके कार्यालय में मिलकर लौटे थे। तब महाविकास अघाड़ी की तस्वीर साफ नहीं थी। शिवसेना के सांसद उद्धव ठाकरे ने प्रतिक्रिया दी थी कि पवार साहब और उनकी राजनीति को समझने के लिए महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस और भाजपा के नेताओं को कई जन्म लेने पड़ेंगे।
पिछले कुछ सप्ताह से महाराष्ट्र में इतनी बड़ी राजनीतिक हलचल हो रही है, लेकिन शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के नेता राउत का उम्मीद के मुताबिक बयान न आना काफी चौंका रहा है। इससे भी कहीं ज्यादा उद्धव ठाकरे का खामोशी भरा इंतजार। इस मामले में संजय राउत केवल अजित पवार के मुख्यमंत्री बनने और शिवसेना के बागी और राज्य के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के जल्द पद से बाहर होने की भविष्यवाणी कर रहे हैं।
क्या सच में पवार साहब ने रोटी पलट दी या फिर पलटने वाले हैं?
महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारे में तरह-तरह की चर्चा है। चर्चा के केंद्र में शरद पवार की पत्नी प्रतिभा ताई से लेकर शरद पवार तक के इर्द गिर्द घूमने वाली गतिविधियां भी हैं। महाराष्ट्र में एनसीपी के एक बड़े नेता अमर उजाला से बातचीत में कहते हैं कि जो लोग शरद पवार को छोड़कर गए हैं, उनके पैर के नीचे कोई जमीन नहीं है।
सूत्र का कहना है कि मैंने पहले भी कहा था कि इंतजार कीजिए। छगन भुजबल, दिलीप वलसे पाटिल, प्रफुल्ल पटेल, तटकरे जैसे नेता अजित पवार के साथ गए हैं। अभी भी कह रहा हूं थोड़ा इंतजार कीजिए। जल्द सबकुछ सामने आएगा। महाराष्ट्र के ही एक पूर्व मंत्री ने कहा कि राजनीति की रोटी पलटी जा रही है। यह नहीं पता कि अभी कौन और किसकी रोटी पलट रहा है।
भाजपा के एक बड़े नेता की सुन लीजिए। महाराष्ट्र से हैं। वह कहते हैं कि अनिश्चितता और रहस्य से भरी राजनीति करने वाले का नाम है शरद पवार और पवार का परिवार। सूत्र का कहना है कि 1980 के दशक में शरद पवार मराठा राजनीति का केन्द्र एक प्रमुख कारण से बने थे। कांग्रेस ने उन्हें शिवसेना के संस्थापक और प्रमुख बालासाहब ठाकरे को कमजोर करने के लिए आगे बढ़ाया था, लेकिन हुआ उल्टा। बालासाहब ठाकरे राजनीति में मजबूत हो गए और शरद पवार ने भी अपनी राजनीति खड़ी कर ली। इसके सामानांतर कांग्रेस को वह फायदा न हुआ। यहां तक कि राष्ट्रीय पार्टी भाजपा भी उतनी मजबूती नहीं बना पाई थी।
हमेशा संदेह और अनिश्चितता में रही पवार की राजनीतिक शैली
वसंत दादा पाटिल ने 70 के दशक में शरद पवार पर पीठ में छुरा घोंपने का आरोप लगाया था। तब 12 विधायकों के साथ शरद पवार ने पाटील का साथ छोड़ दिया था। 18 जुलाई 1978 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली थी। इसके बाद शरद पवार ने राजनीति के तमाम उतार चढ़ाव को देखा। 1999 में शरद पवार ने इटली मूल की सोनिया गांधी के मुद्दे पर कांग्रेस का साथ छोड़ा। एनसीपी बनाई।
2004 में उसी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के समय में यूपीए में शामिल होकर केंद्र सरकार में कृषि मंत्री बने। महाराष्ट्र में गठबंधन की सरकार बनी। 2019 में भी अजित पवार के देवेन्द्र फडणवीस के साथ शपथ लेने का जब देवेंद्र फडणवीस ने ताना मारा और कहा कि अजित पवार शरद पवार से बात करके समर्थन देने और शपथ लेने आए तो शरद पवार ने इसका खंडन नहीं किया। पवार ने भी स्वीकार करते हुए इसे अपना राजनीति का दांव बता दिया था।
अब रोटी पलटने वाले बयान को लेकर क्या है चर्चा?
महाराष्ट्र के दर्जन भर से अधिक वरिष्ठ नेताओं से बातचीत में कोई खुलकर और विश्वास से कुछ कहने की स्थिति में नहीं है। अजित पवार को लेकर तमाम नेताओं का कहना है कि राजनीति में अजित की कोई हैसियत नहीं है। वह जो भी हैं अपने चाचा शरद पवार द्वारा खड़े किए और तीन बार के उप मुख्यमंत्री, विधानसभा में विरोधी दल के नेता हैं।
अनिल देशमुख भी कहते हैं कि प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल जैसे तमाम नेताओं को शरद पवार ने ही आगे बढ़ाया है। माना यह जा रहा है कि शरद पवार के रोटी पलटने वाले बयान का पूरा अर्थ निकल रहा है। अजित पवार को किनारे रखना,सुप्रिया सूले और प्रफुल्ल पटेल को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाना इसका हिस्सा हो सकता है। एनसीपी के ही एक नेता के गले के नीचे कुछ चीजें नहीं उतर रही है। मसलन छगन भुजबल और प्रफुल्ल पटेल उनका (शरद पवार) साथ छोड़ दें और भाऊ (शरद) को भनक ही न लगे।
सुप्रिया सुले ने दी सूचना और प्रफुल्ल पटेल ने पैर पकड़कर मांग ली माफी
शरद पवार की बेटी, सांसद सुप्रिया सूले ने एनसीपी के महाराष्ट्र के अध्यक्ष जयंत पाटिल को फोन किया। उन्हे वाईबी चह्वाण सेंटर पहुंचने के लिए कहा। सुप्रिया सुले ने अजित पवार के साथ गए नेताओं को भी सूचना दी। प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल, दिलीप वलसे पाटिल, अदिति तटकरे समेत सभी कतार में पहुंच गए। प्रफुल्ल पटेल ने बताया कि सभी ने शरद पवार का पैर पकड़ा। माफी मांगी। एनसीपी को एकजुट रखने का उपाय पूछा। शरद पवार ने अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
इससे पहले उपमुख्यमंत्री अपनी चाची (एनसीपी में काकी नाम से मशहूर) और शरद पवार की पत्नी प्रतिभा ताई पवार को देखने गए थे। वहां उनकी भेंट चाचा और बहन सूले से भी हुई। चर्चा भी हुई। संस्कारों का भी अजीत पवार ने हवाला दिया। शरद पवार ने उन्हें शिक्षा में सुधार से जुड़ा कागद भी थमाया। यह सब जानकारी अजित पवार ने ही सार्वजनिक की है। इसके अगले ही दिन अजित पवार के साथ गए एनसीपी के नेताओं ने आज शारद पवार से भी माफी मांग ली है। अब सभी को शरद पवार की प्रतिक्रिया का इंतजार है।
क्या माफ कर देंगे शरद पवार? हो जाएगी सुलह
इसकी पूरी संभावना है। इसके लिए एनसीपी के अंदरखाने में जाने की जरूरत है। चाहे प्रफुल्ल पटेल हों या अन्य। एनसीपी का साथ छोड़कर जाने वाले नेताओं में व्यवसाय-कारोबार से जुड़े परिवार के नेताओं की संख्या अधिक है। प्रफुल्ल पटेल का भी बीड़ी, तंबाकू का पुराना कारोबार है। तमाम नेता सहकारी चीनी मिलों का संचालन करते हैं।
एनसीपी के अंदरखाने में बताते हैं कि यही वजह थी कि उप मुख्यमंत्री अजीत पवार के सामने वित्त मंत्रालय, सहकारिता जैसे विभागों को हासिल करने की चुनौती थी। कहा जाता है कि प्रफुल्ल पटेल के साथ केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह से भेंट दौरान उन्होंने चाचा शरद पवार का हवाला देकर इन विभागों की अहमियत भी गिनाई थी। दूसरे शरद पवार द्वारा बनाई गई एनसीपी के करीब-करीब महाराष्ट्र के मुख्य नेता भतीजे अजीत पवार के साथ जा चुके हैं। अभी इस गुट के साथ 30 के करीब विधायकों के होने का दावा किया जा रहा है। महाराष्ट्र की राजनीति के विश्लेषकों का एक वर्ग मान रहा है कि शरद पवार इन परिस्थितियों से कुछ हद तक समझौता कर सकते हैं।
चाचा-भतीजा में सुलह हुई तो ठगा रह जाएगा विपक्ष
सोमवार से महाराष्ट्र विधानसभा का मानसून सत्र शुरू होना है। शरद पवार ने अजित पवार के साथ गए 12 विधायकों को नोटिस दे रखा है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस बेंग्लुरू में विपक्षी नेताओं को एकजुट करने में जुटा है। इसमें विपक्ष को शरद पवार से महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की उम्मीद है। संसद का मानसूत्र सत्र भी 20 जुलाई से आहूत है। ऐसे समय में महाराष्ट्र की राजनीति में हलचल मची हुई है।एनसीपी के बागियों ने शरद पवार को अपना अभिभावक बताकर उनका कद बढ़ा दिया है।
एनसीपी के नेता अनिल देशमुख कहते हैं कि अब तो महत्वपूर्ण यह है कि कौन अगले साल प्रस्तावित विधानसभा और लोकसभा चुनाव में अधिक सीटें जीतता है। कौन क्या कह रहा है, उस पर जाने की जरूरत नहीं है। ऐसे में यदि शरद पवार ने भतीजे पवार को माफ कर दिया तो क्या? इस सवाल के जवाब में भाजपा के महाराष्ट्र के एक मंत्री कहते हैं कि विपक्ष ठगा सा रह जाएगा? शिवसेना(उद्धव ठाकरे)गुट के नेता को उम्मीद है कि ऐसा नहीं होना चाहिए।
कांग्रेस के नासिक क्षेत्र के सूत्र का कहना है कि मुझे इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। अर्थात राजनीति में रोटी पलट सकती है। आइए, एनसीपी में शरद पवार में के साथ के नेता की सुन लीजिए। सूत्र का कहना है कि शरद पवार उदार दिल वाले हैं। दूर की राजनीति करते हैं। उनकी राजनीतिक गुगली समझना सबके बस की बात नहीं। यानी कुछ भी संभव है।