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2017 के बाद इतनी तेजी से क्यों घट रही है क्रेच की संख्या?
Thu, 31 Jan 2019 10:30 AM IST
Shilpa Thakur
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: Shilpa Thakur
Updated Thu, 31 Jan 2019 10:30 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : pexels.com
भारत में गरीबों के लिए सरकार द्वारा चलाए जाने वाले क्रेचिस (बच्चों के खेलने, रहने का स्थान) की संख्या 2015 तक 23 हजार थी। लेकिन अचानक से 2017 के बाद से ये संख्या कम होने लगी। अब ये संख्या 7 हजार से थोड़ी ही अधिक रह गई है। इसकी घटती संख्या के चलते कामकाजी माता-पिता की चिंता भी बढ़ती जा रही है। अब उन्हें अपने 6 महीने से लेकर 6 साल तक के बच्चों को रखने के लिए कोई जगह नहीं बची है।
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साल 2016 तक राजीव गांधी नेशनल क्रेचिस स्कीम (आरजीएनसीएस) अनवार्य रूप से केंद्र द्वारा चलाया जाता था। क्रेच को चलाने वाला एनजीओ 10 फीसदी योगदान करता था, वहीं केंद्र द्वारा 90 फीसदी योगदान किया जाता था। लेकिन ये सब जनवरी 2017 में बदल गया।
केंद्र और राज्य के बीच इन क्रेचिस को चलाने के लिए लागत 60:40 है। उत्तर पूर्वी और पहाड़ी राज्यों में ये आंकड़ा 90:10 है। बिना विधानमंडल वाले केंद्र शासित प्रदेशों में पूरी तरह से केंद्र द्वारा फंड किया जाता है। अब केवल 7,316 क्रेचिस ही बचे हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुसार मंत्रालय को नेशनल क्रेच स्कीम को लागू करने में कम समर्थन का पता चला है। सरकार ने 2018 तक 23,555 क्रेचिस का आंकड़ा रखा था।
साल 2017 में नेशनल क्रेच स्कीम आईसीडीएस के अंतर्गत आ गई। कॉस्ट शेयरिंग फार्मूला के तहत 349.33 करोड़ रुपये अप्रैल 2017 से नवंबर 2018 तक 23,555 क्रेचिस के लिए आवंटित किए गए थे। अप्रैल 2017 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने लोकसभा में क्रेचिस की संख्या और लाभार्थियों का विवरण पेश किया था। साल 2015-2016 वित्त वर्ष में क्रेचिस की संख्या 16,853 थी, जो 2016-2017 के वित्त वर्ष में 11,666 रह गई। यानि इसमें 30 फीसदी की गिरावट आई है। जनवरी 2015 तक क्रेचिस की संख्या 23,292 थी, जो अब जनवरी 2019 में महज 7,316 रह गई है।
मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि वह इस मामले में राज्यों से जवाब मांगेंगे। उनके मुताबिक अधिकतर क्रेचिस (करीब 21,000) जो आरजीएनसीएस के अंतर्गत आते हैं, एक स्वैच्छिक संगठन, इंडियन काउंसिल फॉर चाइल्ड वेलफेयर (आईसीसीडब्लू) द्वारा दिसंबर 2016 तक चलाए गए थे।
हालांकि मंत्रालय ने खुद को आईसीसीडब्लू से अलग कर लिया है। जो कि वित्त संबंधी मुद्दों के कारण किया गया है। वहीं आईसीसीडब्लू की गीता सिद्धार्थ ने इन सभी दावों को नकार दिया है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि ऐसे कई मामले सामने आए हैं जिनमें पता चला है कि आईसीसीडब्लू द्वारा चलाए जा रहे कई क्रेच जाली थे। मंत्रालय ने आईसीसीडब्लू के खिलाफ इस महीने की शुरुआत में एफआईआर भी दर्ज करवाई है। ये शिकायत क्रेच फंडिंग मामले में दर्ज कराई गई है।
बच्चों के साथ आए दिन होने वाले यौन शोषण को देखते हुए ये क्रेचिस झुग्गी झोपड़ी जैसी जगहों में रहने वाले गरीबों के लिए बहुत जरूरी हैं। इन एनजीओ को फंड से संबंधित परेशानियों का सामना भी करना पड़ा रहा है।