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आखिर 10 के नए सिक्कों से परेशान क्यों है RBI
बीबीसी, हिन्दी
Updated Wed, 21 Feb 2018 10:15 PM IST
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10 रुपये का सिक्का
- फोटो : BBC
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भारत के केंद्रीय बैंक रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) ने पिछले कुछ दिनों में आश्चर्यजनक रूप से करोड़ों लोगों को एक एसएमएस भेजा है। इस एसएमएस का संबंध भारतीय मुद्रा 10 रुपए को लेकर है। आरबीआई के इस एसएमएस में कहा गया है कि डरने की जरूरत नहीं है और भारतीय अर्थव्यवस्था की सेहत बिल्कुल ठीक है।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने अपने व्यापक प्रचार तंत्र को 10 रुपए के सिक्के से जुड़े भ्रम को खत्म करने में लगाया है। भारत के 10 रुपए के सिक्के की कीमत महज 10 अमरीकी सेंट्स है। हालांकि इससे पता चलता है कि सरकार अपनी मुद्रा से जुड़े भ्रमों को खत्म करने को लेकर किस हद तक गंभीर है।
आखिर 10 के सिक्के से जुड़ा मिथ क्या है? यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मानवता के इतिहास में मुद्रा का संबंध आत्मविश्वास से रहा है।
भारत में यह समस्या बहुत जटिल नहीं है। ज्यादातर लोगों को लग रहा है कि 10 का नया सिक्का नकली है। इसका असर यह हुआ कि ज्यादातर लोग 10 के नए सिक्के को लेने से इनकार कर रहे हैं।
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अफवाह है कि 10 का नया सिक्का नकली है। कहा जा रहा है कि इसकी शुरुआत भारत के पश्चिमी राज्य गुजरात से हुई और यह अफवाह पूरे देश में फैल गई।
सामी तमिलनाडु में ऑटोरिक्शा ड्राइवर हैं। उनका कहना है कि 10 का नया सिक्का कोई लेता नहीं है। उन्होंने कहा कि 10 के नए सिक्के न तो किराना दुकान वाले लेते हैं और न ही चाय बेचने वाले।
वीरापांडी एक दुकान के मालिक हैं। उनका कहना है कि बस कंडक्टर भी 10 के नए सिक्के को नहीं लेते हैं। वीरापांडी ने कहा, ''बस वाले कहते हैं कि पैसेंजर 10 के नए सिक्के को नहीं लेते हैं, इसलिए वो भी नहीं लेते।''
आरबीआई की परेशानी क्या?
क्या 10 रुपए का नया सिक्का क्या इतना बड़ा मसला है कि इसके लिए आरबीआई इस कदर हरकत में है?
आरबीआई ने करोड़ों लोगों को एसएमएस कर बिना डर के 10 रुपए के नए सिक्के को स्वीकार करने की अपील की है। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि अगर फिर भी आप आश्वस्त नहीं हैं तो 14440 पर फोन करें।
मैंने इस नबंर पर फोन किया। एक या दो सेकंड के बाद मेरे पास आरबीआई ने कॉल बैक किया। हालांकि आरबीआई की तरफ से इस फोन पर कोई व्यक्ति नहीं था बल्कि एक रिकॉर्ड किया हुआ संदेश था।
इसमें बताया गया कि भारत सरकार ने अलग-अलग डिजाइन में 10 के नए सिक्कों को जारी किया है और सभी वैध हैं।
अपनी जेब से एक नोट निकाल करीब से देखिए। लगभग सभी पेपर मनी में एक ही वादा है- 'मैं धारक को भुगतान करने का वादा करता हूं।' नोट अलग-अलग मूल्य के हो सकते हैं।
अगर नोट पर लिखे इस वादे कोई चुनौती देता है तो सरकार से दूसरे नोट की मांग की जा सकती है।
मुद्रा की एक कल्पित कीमत होती है और सरकारें उसे वैध बनाती हैं ताकि स्वीकार्यता पर कोई शक नहीं हो। मुद्रा की कीमत कागज या धातु में निहित नहीं होती है।
इसकी कीमत सामूहिक भरोसे में होती है। चाय वाला चाय के बदले हमसे उस पैसे को लेता है जिसे उसके पड़ोस की दुकानवाला स्वीकार कर लेता है और कोई सवाल नहीं उठाता है।
उसी तरह दुकान वाला उस पैसे का इस्तेमाल कहीं और करता है और उसकी वैधता पर कोई शक नहीं करता है। मुद्रा की कीमत बिना भरोसे के कायम नहीं रह सकती है।
युवल नोआह हरारी ने अपनी किताब 'सिपियंस' में लिखा है कि पैसा लोगों को जोड़ने का काम करता है। उन्होंने लिखा है कि भाषा, संस्कृति, कानून और धर्म के बीच मुद्रा सेतु का काम करती है।
हरारी ने लिखा है, ''यहां तक कि जो लोग एक ईश्वर और एक राजा की आज्ञा नहीं मानते वो भी एक करंसी का इस्तेमाल करने में एतराज नहीं जताते हैं। ओसामा बिन लादेन को अमरीकी संस्कृति, अमरीकीपन और अमरीकी राजनीति से नफरत थी, लेकिन अमरीकी डॉलर से बेपनाह मोहब्बत थी।''
यह भरोसा कि जो व्यवस्था है वो काफी नाजुक है, इसीलिए टूटना भी आसान होता है। इसलिए आरबीआई इतनी गंभीरता इसमें दिखा रहा है। आरबीआई का प्रचार तंत्र 10 के नए सिक्के को लेकर भरोसा बहाल करने की कोशिश कर रहा है।
आरबीआई को पता है कि अगर मुद्रा से भरोसा उठा तो अर्थव्यवस्था को संभालना कोई आसान काम नहीं है।
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रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने अपने व्यापक प्रचार तंत्र को 10 रुपए के सिक्के से जुड़े भ्रम को खत्म करने में लगाया है। भारत के 10 रुपए के सिक्के की कीमत महज 10 अमरीकी सेंट्स है। हालांकि इससे पता चलता है कि सरकार अपनी मुद्रा से जुड़े भ्रमों को खत्म करने को लेकर किस हद तक गंभीर है।
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आखिर 10 के सिक्के से जुड़ा मिथ क्या है? यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मानवता के इतिहास में मुद्रा का संबंध आत्मविश्वास से रहा है।
भारत में यह समस्या बहुत जटिल नहीं है। ज्यादातर लोगों को लग रहा है कि 10 का नया सिक्का नकली है। इसका असर यह हुआ कि ज्यादातर लोग 10 के नए सिक्के को लेने से इनकार कर रहे हैं।
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अफवाह है कि 10 का नया सिक्का नकली है। कहा जा रहा है कि इसकी शुरुआत भारत के पश्चिमी राज्य गुजरात से हुई और यह अफवाह पूरे देश में फैल गई।
सामी तमिलनाडु में ऑटोरिक्शा ड्राइवर हैं। उनका कहना है कि 10 का नया सिक्का कोई लेता नहीं है। उन्होंने कहा कि 10 के नए सिक्के न तो किराना दुकान वाले लेते हैं और न ही चाय बेचने वाले।
वीरापांडी एक दुकान के मालिक हैं। उनका कहना है कि बस कंडक्टर भी 10 के नए सिक्के को नहीं लेते हैं। वीरापांडी ने कहा, ''बस वाले कहते हैं कि पैसेंजर 10 के नए सिक्के को नहीं लेते हैं, इसलिए वो भी नहीं लेते।''
आरबीआई की परेशानी क्या?
क्या 10 रुपए का नया सिक्का क्या इतना बड़ा मसला है कि इसके लिए आरबीआई इस कदर हरकत में है?
आरबीआई ने करोड़ों लोगों को एसएमएस कर बिना डर के 10 रुपए के नए सिक्के को स्वीकार करने की अपील की है। इसके साथ ही यह भी कहा गया कि अगर फिर भी आप आश्वस्त नहीं हैं तो 14440 पर फोन करें।
मैंने इस नबंर पर फोन किया। एक या दो सेकंड के बाद मेरे पास आरबीआई ने कॉल बैक किया। हालांकि आरबीआई की तरफ से इस फोन पर कोई व्यक्ति नहीं था बल्कि एक रिकॉर्ड किया हुआ संदेश था।
इसमें बताया गया कि भारत सरकार ने अलग-अलग डिजाइन में 10 के नए सिक्कों को जारी किया है और सभी वैध हैं।
अपनी जेब से एक नोट निकाल करीब से देखिए। लगभग सभी पेपर मनी में एक ही वादा है- 'मैं धारक को भुगतान करने का वादा करता हूं।' नोट अलग-अलग मूल्य के हो सकते हैं।
अगर नोट पर लिखे इस वादे कोई चुनौती देता है तो सरकार से दूसरे नोट की मांग की जा सकती है।
मुद्रा की एक कल्पित कीमत होती है और सरकारें उसे वैध बनाती हैं ताकि स्वीकार्यता पर कोई शक नहीं हो। मुद्रा की कीमत कागज या धातु में निहित नहीं होती है।
इसकी कीमत सामूहिक भरोसे में होती है। चाय वाला चाय के बदले हमसे उस पैसे को लेता है जिसे उसके पड़ोस की दुकानवाला स्वीकार कर लेता है और कोई सवाल नहीं उठाता है।
उसी तरह दुकान वाला उस पैसे का इस्तेमाल कहीं और करता है और उसकी वैधता पर कोई शक नहीं करता है। मुद्रा की कीमत बिना भरोसे के कायम नहीं रह सकती है।
युवल नोआह हरारी ने अपनी किताब 'सिपियंस' में लिखा है कि पैसा लोगों को जोड़ने का काम करता है। उन्होंने लिखा है कि भाषा, संस्कृति, कानून और धर्म के बीच मुद्रा सेतु का काम करती है।
हरारी ने लिखा है, ''यहां तक कि जो लोग एक ईश्वर और एक राजा की आज्ञा नहीं मानते वो भी एक करंसी का इस्तेमाल करने में एतराज नहीं जताते हैं। ओसामा बिन लादेन को अमरीकी संस्कृति, अमरीकीपन और अमरीकी राजनीति से नफरत थी, लेकिन अमरीकी डॉलर से बेपनाह मोहब्बत थी।''
यह भरोसा कि जो व्यवस्था है वो काफी नाजुक है, इसीलिए टूटना भी आसान होता है। इसलिए आरबीआई इतनी गंभीरता इसमें दिखा रहा है। आरबीआई का प्रचार तंत्र 10 के नए सिक्के को लेकर भरोसा बहाल करने की कोशिश कर रहा है।
आरबीआई को पता है कि अगर मुद्रा से भरोसा उठा तो अर्थव्यवस्था को संभालना कोई आसान काम नहीं है।