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तो इसलिए जयललिता को कहा जाता है अम्मा!

Thu, 20 Oct 2016 01:02 PM IST
रेहान फ़ज़ल/बीबीसी संवाददाता
रेहान फ़ज़ल/बीबीसी संवाददाता Updated Thu, 20 Oct 2016 01:02 PM IST
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Why Jayalalitha becomes Amma of Tamil nadu?
जयल‌ल‌िता

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता को सब लोग अम्मा बुलाते हैं,लेकिन क्या आप जानते हैं की वो पूरे प्रदेश की अम्मा कैसे बन गयीं? 25 मार्च 1989 का दिन था। तमिलनाडु विधानसभा में बजट पेश किया जा रहा था।

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जैसे ही मुख्यमंत्री करुणानिधि ने बजट भाषण पढ़ना शुरू किया कांग्रेस के सदस्य ने प्वाएंट ऑफ ऑर्डर उठाया कि पुलिस ने विपक्ष की नेता जयललिता के खिलाफ अप्रजातांत्रिक ढंग से काम किया है। जयललिता ने भी उठकर शिकायत की कि मुख्यमंत्री के उकसाने पर पुलिस ने उनके खिलाफ कार्रवाई की है और उनके फोन को टैप किया जा रहा है।
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स्पीकर ने कहा कि वो इस मुद्दे पर बहस की अनुमति नहीं दे सकते क्योंकि बजट पेश किया जा रहा है। ये सुनना था कि विधानसभा सदस्य बेकाबू हो गए। एआईडीएमके के सदस्य चिल्लाते हुए सदन के वेल में पहुंच गए। एक सदस्य ने गुस्से में करुणानिधि को धक्का देने की कोशिश की जिससे उनका संतुलन बिगड़ गया और उनका चश्मा जमीन पर गिरकर टूट गया।
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एक एआईडीएमके सदस्य ने बजट के पन्नों को फाड़ दिया। विधानसभा के अध्यक्ष ने सदन को स्थगित कर दिया। जयललिता की जीवनी 'अम्मा जर्नी फ्रॉम मूवी स्टार टु पॉलिटिकल क्वीन' लिखने वाली वासंती बताती हैं, "जैसे ही जयललिता सदन से निकलने के लिए तैयार हुईं, एक डीएमके सदस्य ने उन्हें रोकने की कोशिश की। उसने उनकी साड़ी इस तरह से खींची कि उनका पल्लू गिर गया। जयललिता भी जमीन पर गिर गईं।" "एक बलिष्ट एआईडीएमके सदस्य ने डीएमके सदस्य की कलाई पर जोर से वार कर जयललिता को उनके चंगुल से छुड़वाया। 

जयललिता ने ली थी प्रतिज्ञा

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जयल‌ल‌िता

अपमानित जयललिता ने पांचाली की तरह प्रतिज्ञा ली की कि वो उस सदन में तभी फिर कदम रखेंगी जब वो महिलाओं के लिए सुरक्षित हो जाएगा। दूसरे शब्दों में वो अपने आप से कह रही थीं कि वो अब तमिलनाडु विधानसभा में मुख्यमंत्री के तौर पर ही वापस आएंगी।"

अभिनेत्री से राजनेता बनीं जयललिता के बारे में बहुत कम लोगों को पता है कि वो अभिनेत्री कतई नहीं बनना चाहती थीं। वो बहुत अच्छी छात्रा थीं। स्कूल के दिनों में उन्हें सर्वश्रेष्ठ छात्रा की शील्ड मिली और दसवीं कक्षा की परीक्षा में उन्हें पूरे तमिलनाडु में दूसरा स्थान मिला।

गर्मियों की छुट्टियों के दौरान वो अपनी माँ के साथ एक समारोह में गईं जहाँ एक प्रोड्यूसर वीआर पुथुलू ने उन्हें अपनी फिल्म में काम करने का प्रस्ताव दिया। उनकी माँ ने उनसे पूछा और उन्होंने हाँ कर दी। अपनी दूसरी ही फिल्म में जयललिता को उस समय तमिल फिल्मों के चोटी के अभिनेता एमजी रामचंद्रन के साथ काम करने का मौका मिला।

जयललिता की  खूबसूरती में फिदा थे एमजीआर

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जयल‌ल‌िता-एमजीअार

वासंती कहती हैं, "एमजीआर उनसे शुरू से फैसिनेटेड थे। जयललिता बहुत अच्छी अंग्रेजी बोलती थीं। दूसरी अभिनेत्रियों और उनमें बहुत अंतर था। शूटिंग के समय वो एक कोने में बैठकर अंग्रेजी उपन्यास पढ़ा करती थीं और किसी से कोई बातचीत नहीं करती थीं।

देखने में बहुत सुंदर थी। एकदम गोरी चिट्टी। तमिलनाडु में आमतौर से इतनी गोरी लड़कियाँ नहीं दिखाई देती हैं।" एमजीआर का जयललिता के प्रति शुरू से ही साफ्ट कार्नर हो गया था। एक बार थार रेगिस्तान में शूटिंग के दौरान रेत इतनी गर्म थी कि जयललिता उस पर चल नहीं पा रही थी।

तभी एमजीआर ने पीछे से आ कर उन्हें गोदी में उठा लिया था ताकि उनके पैर न जलें। वासंती बताती हैं, "जयललिता ने खुद कुमुदन पत्रिका में लिखा है कि कार पार्किंग थोड़ी दूर पर थी। पैरों में कोई चप्पल और जूते नहीं थे। एक कदम भी नहीं चल पा रही थी। मेरे पैर लाल हो गए थे। मैं कुछ कह नहीं पा रही थी लेकिन एमजीआर मेरी परेशानी को समझ गए और उन्होंने मुझे
अपनी गोद में उठा लिया।"

एमजीआर और जयललिता के संबंधों में भी बहुत उतार चढ़ाव आए। उन्होंने उन्हें पार्टी के प्रोपेगेंडा सचिव के साथ साथ राज्यसभा का सदस्य भी बनाया। लेकिन पार्टी में जयललिता का इतना विरोध हुआ कि एमजीआर को उन्हें प्रोपेगेंडा सचिव के पद से हटाना पड़ा। इस बीच एमजीआर गंभीर रूप से बीमार हो गए। जब उनका देहांत हुआ तो उनके परिवार वालों ने जयललिता को उनके घर तक में नहीं घुसने दिया।

एमजीआर के देहांत के बाद दो दिन तक खड़ी रही जयललिता

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जयल‌ल‌िता

वासंती बताती हैं, "जयललिता एमजीआर के घर के सामने कार से उतरीं और अपनी हथेलियों को जोर जोर से गेट पर मारने लगीं। जब गेट खुला तो किसी ने उनसे नहीं बताया कि एमजीआर के शव को कहाँ रखा गया है।

वो गेट से पीछे की सीढ़ियों तक कई बार दौड़कर गईं लेकिन एमजीआर के घर का हर दरवाजा उनके लिए बंद कर दिया गया।" "बाद में उन्हें बताया गया कि एमजीआर के पार्थिव शरीर को पिछले दरवाजे से राजाजी हॉल ले जाया गया है। जयललिता तुरंत अपनी कार में बैठीं और ड्राइवर से राजाजी हॉल चलने के लिए कहा। वहाँ वो किसी तरह अपने आप को एमजीआर के सिरहाने पहुंचाने में सफल हो गईं।"

वासंती बताती हैं कि उस दिन जयललिता की आँखों से एक आँसू नहीं निकला। वो दो दिनों तक एमजीआर के पार्थिव शरीर के सिरहाने खड़ी रहीं। 13 घंटे पहले दिन और 8 घंटे दूसरे दिन। एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन की कुछ महिला समर्थकों ने उनके पैरों को अपनी चप्पलों से कुचलने की कोशिश की। "कुछ ने उनकी त्वचा में नाखू गड़ा कर उन्हें चिकोटी काटने की कोशिश की ताकि वो वहाँ से चली जाएं। लेकिन जयललिता सारा अपमान सहते हुए वहाँ से टस से मस नहीं हुईं।

जब एमजीआर के पार्थिव शरीर को अंतिम यात्रा के लिए गन कैरेज पर ले जाया गया तो जयललिता भी उसके पीछे पीछे दौड़ीं। उस पर खड़े एक सैनिक ने अपने हाथों का सहारा देकर उन्हें ऊपर आने में भी मदद की।" "तभी अचानक जानकी के भतीजे दीपन ने उन पर हमला किया और उन्हें गन कैरेज से नीचे गिरा दिया। जयललिता ने तय किया कि वो एमजीआर की शव यात्रा में आगे नहीं भाग लेंगीं। वो अपनी कंटेसा कार में बैठीं और अपने घर वापस आ गईं।" 1992 के आम चुनाव में जयललिता ने पहली बार जीत दर्ज की और राज्यपाल भीष्म नारायण सिंह ने उन्हें पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई।

हर ट्रांसफर की जानकारी राज्यपाल को भेजती थीं जयललिता

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भीष्म नारायण सिंह

भीष्म नारायण सिंह बताते हैं, "जयललिताजी जब शपथ लेने के बाद मुझसे मिलने आईं तो मुझे पता चल चुका था कि वो गाजर का हलवा पसंद करती हैं। इसलिए मैंने उनके लिए गाजर का हलवा बनवाया। मैंने उनसे कहा कि आपका दृष्टिकोण राष्ट्रीय है, इसलिए मैं उम्मीद करता हूँ कि आप कानून और व्यवस्था के मुद्दे पर वही लाइन लेंगीं और एलटीटीई जैसे पृथकतावादी संगठनों को अपनी जड़ें जमाने का मौका नहीं मिलेगा।"

"मेरे प्रति उनके मन में इतना सम्मान था कि वो हर हफ्ते कोशिश करती थीं कि आकर राज्यपाल को ब्रीफ करें। भारत के किसी राज्य में एसपी से लेकर मुख्य सचिव की ट्रांसफर की फाइल कभी भी राज्यपाल को नहीं भेजी जाती हैं, लेकिन जब तक मैं वहाँ का राज्यपाल रहा, ट्रांसफर और पोस्टिंग की फाइल हमेशा मेरे पास आती थी।" जयललिता अब तक चार बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं।

अपने मजबूत प्रशासन के लिए जहाँ उन्हें अक्सर वाहवाही मिली है, वहीं उन पर व्यक्ति पूजा और भृष्टाचार के आरोप भी लगे हैं। वरिष्ठ पत्रकार एम आर नारायणस्वामी कहते हैं, "काफी अद्भुत करियर रहा है इनका। ध्यान देने वाली बात ये है कि ये ब्राह्मण जाति से आती हैं और इनका जन्म कर्नाटक में हुआ है। उन्होंने जिस तरह से एआईडीएमके पार्टी पर अपना नियंत्रण जमाया, उसे एक बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाएगा।" "चाहे हम उन्हें पसंद करें या नापसंद करें। इनके प्रशासन में बहुत कमियाँ रही हैं, लेकिन बहुत उपलब्धियाँ भी रही हैं, जिस तरह उन्होंने सुनामी के दौरान प्रशासन चलाया, लोग उसे आज भी याद करते हैं। ये अलग बात है कि जब पिछले साल चेन्नई में बाढ़ आई थी तो उनका प्रशासन फेल हो गया था।"

मीडिया और जयललिता में नहीं बनती

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जयल‌ल‌िता-एमजीअार

जयललिता की मीडिया से बहुत कम बनी। उन पर सनकी और मूडी होने का ठप्पा भी लगा। बीबीसी के लिए दिए एकमात्र इंटरव्यू में वो मशहूर पत्रकार करण थापर के सवाल पूछने के ढंग से नाराज हो गईं।

जब इंटरव्यू के अंत में थापर ने कहा कि उन्हें उनसे बात कर बहुत खुशी हुई है तो जयललिता का जवाब था, "मुझे आपसे मिल कर कतई खुशी नहीं हुई। नमस्ते।" 1898 में उन्होंने वाजपेयी सरकार को समर्थन दिया, लेकिन जब उन्होंने देखा कि उनकी करुणानिधि सरकार को बर्खास्त करने में कोई दिलचस्पी नहीं है, तो उन्होंने समर्थन वापस ले लिया। सन 2002 में जब आधी रात को करुणानिधि को जगा कर गिरफ्तार किया गया तो उन पर बदले की कार्रवाई करने का आरोप भी लगा।

नारायणस्वामी कहते हैं, "वो बदले की भावना से काम करने में यकीन करती हैं। वो बहुत मूडी हैं, मतलब आज वाजपेयी से हाथ मिला लिया। कल धकेल दिया। आज सोनिया गांधी से गले मिल गईं। कल कह दिया बेकार हैं। उनमें स्थायित्व का अभाव एक बड़ा अवगुण रहा। वो मास लीडर हैं। उनको लाखों लोग पसंद करते हैं लेकिन उन्होंने चंद लोगों को जिनका राजनीति से कोई वास्ता नहीं है, अपने इर्द गिर्द रख रखा है।"

उन्होंने बताया- "जिस ढ़ंग से उन्होंने मुंहबोले भान्जे की शादी करवाई, इसने उनको बहुत नुकसान पहुंचाया। इससे साफ़ लगा कि जो शादी करवा रहा है, वो राजनीति का बंदा नहीं है। उसे इस बात की समझ ही नहीं है कि देश और तमिलनाडु में कितनी गरीबी है और लोग किस तरह से रहते हैं। राजनीति में इस तरह के इंप्रेशन या संकेत ज्यादा नुकसान करते हैं, बजाए इसके कि अदालत में ये तय हो कि आप भ्रष्ट हैं या नहीं।"

मुफ्त सामान बांटने से बनी जनता में जगह

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जयल‌ल‌िता

वो तुनुकमिजाज हों, अस्थिर हों, अक्खड़ हों, लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि वो बहुत मजबूत नेता रही हैं जिनको लोगों ने असीम प्यार दिया है। वासंती कहती हैं, "उनकी ताकत थी कि वो बहुत मजबूत नेता रही हैं।

उनका पार्टी पर इतना मजबूत नियंत्रण है कि लोग उनके सामने काँपा करते हैं। वो अपने मंत्रियों से मिलना भी पसंद नहीं करती हैं।

लोगों में मुफ्त चीजे बांटने की नीति ने भी उन्हें बहुत लोकप्रिय बनाया। मुफ्त ग्राइंडर, मुफ्त  मिक्सी, बीस किलो चावल देने पर अर्थशास्त्रियों ने बहुत नाक भौं सिकोड़ी, लेकिन इसने महिलाओं के जीवनस्तर को उठा दिया और लोगों के बीच उनकी जगह बनती चली गई।"

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