{"_id":"599e696c4f1c1b14098b4677","slug":"why-does-india-needs-a-uniform-civil-code","type":"story","status":"publish","title_hn":"तीन तलाक पर बैन के बाद जानें क्यों हो रही है यूनिफॉर्म सिविल कोड पर चर्चा?","category":{"title":"India News","title_hn":"भारत","slug":"india-news"}}
तीन तलाक पर बैन के बाद जानें क्यों हो रही है यूनिफॉर्म सिविल कोड पर चर्चा?
amarujala.com- Presented by: अभिषेक मिश्रा
Updated Thu, 24 Aug 2017 11:49 AM IST
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यूनिफॉर्म सिविल कोड
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तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड पर चर्चा तेज हो गई है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या भारत में भी समान नागरिक संहिता लागू होगा या पर्सनल लॉ बोर्ड बने रहेंगे? बता दें कि पर्सनल लॉ बोर्ड ज्यादातर पारिवारिक मसलों को हल करने के लिए हैं।
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हालांकि एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो लंबे समय से समान नागरिक संहिता को लागू करने की मांग कर रहा है लेकिन बहुत सी महिलाएं इसके खिलाफ भी हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर यूनिफॉर्म सिविल कोड में ऐसा क्या है जो इस पर इतनी चर्चा हो रही है।
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क्या है यूनिफॉर्म सिविल कोड?
यूनिफॉर्म सिविल कोड या समान नागरिक संहिता का अर्थ एक सेक्युलर जो देश में सभी धर्म को मानने वालों के लिए एक समान होता है। भारत में अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग सिविल कोड हैं, ऐसे में अगर यूनिफॉर्म सिविल कोड बनता है तो देश के हर नागरिक को इसका पालन करना होगा। चाहे वह किसी भी धर्म का हो, यह कानून पर हर किसी पर लागू होता है। यह कानून किसी धर्म, जाति या निजी कानून से ऊपर है। कई देशो में यह कानून लागू है।
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पढ़ें: खत्म हो सकती है मुस्लिमों की एक पुरानी परंपरा
भारतीय संविधान और यूनिफॉर्म सिविल कोड
भारतीय संविधान के भाग 4 के अनुच्छेद 44 में युनिफॉर्म सिविल कोड का उल्लेख किया गया है। इस अनुच्छेद में कानून को लेकर नीति निर्देश दिया गया है और कहा गया है कि समान नागरिक संहिता लागू करना हमारा लक्ष्य होगा। यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर कई बार सुप्रीम कोर्ट भी केंद्र सरकार को निर्देश दे चुका है।
भारत में क्यों है कि पर्सनल लॉ?
भारत में अगल-अगल धर्मों के मसलों को सुलझाने के लिए पर्सनल लॉ बनाया है। इस कानून के तहत शादी, तलाक, परिवार जैसे मामले आते हैं। भारत में अधिकतर निजी कानून धर्म के आधार पर तय किए गए हैं। हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध धर्म हिंदू विधि के अंतर्गत आते हैं, जबकि मुस्लिम और ईसाई के लिए अपने अलग कानून हैं। मुस्लिमों का कानून शरीअत पर आधारित है जबकि अन्य धार्मिक समुदायों के कानून भारतीय संसद के संविधान पर आधारित हैं।
क्या है इतिहास?
महिलाओं के खिलाफ होने वाले भेदभाव और अत्याचार को कम करने के लिए 1993 में कई कानूनों में संशोधन किया गया। जिसके कारण धर्मनिरपेक्ष और मुस्लिम समाज के बीच की खाई और गहरी हो गई। जबकि इस मामले पर कई मुसलमानों ने विरोध किया। उनका मानना था कि इस फैसले से मुस्लिम संस्कृति नष्ट हो जाएगी। गौरतलब है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर ब्रिटिशकाल से ही विवाद चल रहा है।