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स्टिंग को गंभीरता से क्यों नहीं लेते लोग?

Sat, 26 Mar 2016 01:29 PM IST
आकार पटेल/वरिष्ठ विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
आकार पटेल/वरिष्ठ विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए Updated Sat, 26 Mar 2016 01:29 PM IST
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Why do not people seriously to sting
- फोटो : bbc

अब स्टिंग भी उतना ही बदनाम हो चुका है जितना कि एनकाउंटर पहले से है। दरअसल, किसी स्टिंग से अब झूठ या सच का पता नहीं लगता। भले हम उस घटना के गवाह हों या फिर उसे वीडियो पर फ़िल्माया गया हो और वह सच्चाई का इकलौता प्रमाण हो।

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ऐसा क्यों है, इसे समझने के लिए हम देखते हैं कि किस तरह से इन दोनों शब्दों की विश्वसनीयता ख़त्म हुई है। 1980 के दशक में भारतीयों का वास्ता एनकाउंटर शब्द से पड़ा, जब खालिस्तान के लिए सिख अलगाववादी आंदोलन अपने चरम पर था।
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उस दौर में चरमपंथियों के एनकाउंटर में मारे जाने की ख़बरें आम थीं। इसके बाद मुंबई में 1990 के दशक में, पुलिस ने अंडरवर्ल्ड में काम करने वाले छोटे मोटे बदमाशों को कई एनकाउंटरों में मार गिराया। इसी दौर में वैसे पुलिस अफ़सर जो हथकड़ियों में जकड़े लोगों पर गोलियां चलाने की इच्छा रखते थे, वो एनकाउंटर स्पेशलिस्ट बन गए।
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इन एनकाउंटरों में कुछ निर्दोषों की जानें भी गईं और तब ये मुहावरा भी चलन में आया- उसका एनकाउंटर हो गया, जिसका मतलब ये होता था कि किसी को जानबूझकर उठाया गया और उसे मार दिया गया।

अब, ऐसे में सवाल यह है कि स्टिंग एनकाउंटर की तरह बदनाम क्यों हो गया। मीडिया में, 15 साल पहले तहलका की टीम ने खोजी पत्रकारिता के नाम पर ढेरों स्टिंग किए। वीडियो कैमरे के छोटे उपकरणों और सैन्य -जासूसी तकनीकों के इस्तेमाल से ये संभव हो पाया।

‌क्रिकेटरों नेताओं के ‌स्टिंग में नहीं हुई किसी पर कार्रवाई

Why do not people seriously to sting

तहलका ने क्रिकेटरों और बीसीसीआई अधिकारियों के बीच मैच फ़िक्सिंग की बातचीत रिकॉर्ड की थी और इनमें कई खिलाड़ियों के नाम आए थे, जिनमें मोहम्मद अजहरूद्दीन भी शामिल थे।

बाद में क्या हुआ? जब विदेशी खिलाड़ियों ने सट्टेबाज़ी में शामिल होने की बात कबूली और उन्हें सजा भी हुई, जिनमें सबसे मशहूर दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेटर हैंसी क्रोन्ये भी थे। तब भारत में ये मामला अस्पष्टता के साथ बंद हो गया।

अज़हरूद्दीन पर लगी पाबंदी हटा ली गई, वे राजनेता बन गए और लोकसभा का चुनाव जीतने में कामयाब रहे। उन्होंने कभी अपनी ग़लती नहीं स्वीकार की।उनके ख़िलाफ़ सबूत भी थे, लेकिन वे इन सबसे बचकर जिस तरह से बाहर आ गए, वैसा क्रोन्ये के साथ नहीं हुआ। कोई दूसरे अहम क्रिकेटर को शायद ही नुकसान उठाना पड़ा।

जब तहलका ने स्टिंग किया था, तब मैं मुंबई में एक समाचार पत्र का संपादन कर रहा था। हम स्टिंग की सामाग्री से इतने प्रभावित हुए थे कि हमने उस पर अपने अख़बार का पूरा अंक ही निकाला था, जिसमें कुछ महान और कुछ अच्छे खिलाड़ी खुले तौर पर भ्रष्टाचार के बारे में बात कर रहे थे। लेकिन उस स्टिंग से वास्तविकता में क्या हासिल हुआ?

क्रिकेट में भ्रष्टाचार बना रहा, मैच फ़िक्सिंग के मामले में खिलाड़ियों का निलंबन जारी रहा, उन्हें सजा भी मिलती रही। इसमें दुनिया के सबसे भ्रष्ट लीगों में एक इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) भी शामिल है। स्पष्ट नतीजे तक पहुंचने में स्टिंग की ये नाकामी दूसरी जगहों पर भी देखी जा सकती है।

लोगों को भी नैतिक जिम्मेदारी का एहसास नहीं

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इसी महीने ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस पार्टी का एक स्टिंग आया है है, जिसमें पार्टी के सांसदों, मंत्रियों से लेकर शीर्ष अधिकारी पैसे लेते हुए और किसी को फ़ायदा पहुंचाते दिख रहे हैं।

इस स्टिंग के बाद पार्टी की प्रतिक्रिया क्या रही? पार्टी ने कहा कि ये स्टिंग विरोधियों की ओर से पार्टी को बदनाम करने की साजिश है। भारत में स्टिंग की इस नाकामी की दो वजहें हैं। सबसे अहम वजह तो यही है कि नैतिक ज़िम्मेदारी का विचार हमारे यहां बहुत मज़बूत नहीं है। 

ऐसा इसलिए है कि हमारी नैतिकता काफी हद तक लचीली है, बदल जाने वाली है। इसका प्रमाण तो यही है कि भ्रष्ट नेता राजनीति में बने हुए हैं, यहां तक कि लालू यादव जैसे दोषी करार दिए गए नेता भी राजनीति में हैं और वो अकेले भी नहीं हैं।

हमारे आसपास की व्यवस्था ही ऐसी है, जहां कुछ भी काम नहीं करता, ऐसे बिचौलिए वैध हो जाते हैं और रिश्वतखोरी के साथ लोगों को जीना पड़ता है। ऐसी संस्कृति में किसी आदमी को भ्रष्ट बताना या अनैतिक बताने का प्रभावी असर नहीं होता।

सत्ता में रहने वाले कई लोगों के स्टिंग हुए हैं लेकिन उनके ख़िलाफ़ सबूतों को ठेंगा बताया जाता रहा है। उदाहरण के लिए, उस स्कैंडल को ही लीजिए, जिसमें अमित शाह वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से एक युवा महिला पर नज़र रखने के लिए कह रहे हैं, क्योंकि साहब ने इसकी मांग की है।

भारतीय जनता पार्टी के एक और अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण स्टिंग किए जाने के बाद दोषी करार दिए गए और वे जेल भी गए. लेकिन जल्द ही उन्हें जमानत मिल गई और उनकी मौत अपने घर पर ही हुई।

सरकार भी नागरिकों से कर रही स्टिंग करने की बात

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स्टिंग के नाकाम होने की दूसरी वजह ये भी है कि मीडिया अक्सर समझौता कर लेता है, ज़ीटीवी के संपादक पर ख़ुद भ्रष्टाचार के आरोप हैं। वे एक स्टिंग में एक कॉर्पोरेशन हाउस से रिश्वत मांगते नज़र आए थे। वो गिरफ़्तार भी हो चुके हैं लेकिन अपने पद पर बने हुए हैं।

तहलका के संस्थापक तरुण तेजपाल की अपनी गतिविधियों के चलते भी तहलका की प्रतिष्ठा को भारी नुकसान हुआ है। मुझे ये भी संदेह है कि लोग अब स्टिंग से ऊब चुके हैं। जिन ख़बरों का कोई संतोषजनक परिणाम नहीं निकला हो, भले ही उसकी कोई भी वजह हो, उसमें लोगों की दिलचस्पी नहीं रहती।

तहलका के पूर्व पत्रकार अनिरुद्ध बहल नियमित तौर पर स्टिंग पत्रकारिता करते रहे हैं, लेकिन उनके कामों को ज़्यादा कवरेज नहीं मिलता। अरविंद केजरीवाल जब दिल्ली के मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने आम नागरिकों से सरकारी दफ़्तरों में रिश्वत मांगे जाने की घटना की गोपनीय रिकॉर्डिंग करने की अपील की ताकि दोषी को सजा दी जा सके।

उन्होंने इस अभियान का विज्ञापन भी ख़ूब किया लेकिन ये स्पष्ट नहीं है कि इसमें आगे क्या हुआ. जहां तक मेरी जानकारी है कि इस मामले में ज़्यादा कुछ नहीं हुआ है। अगर मौजूदा स्टिंग से पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी पर कोई असर पड़ता है, तो मेरे लिए ये अचरज की बात होगी। मैं ये कहना चाहूंगा कि स्टिंग पत्रकारिता का एक दौर तहलका ने शुरू किया था, लेकिन अब वह अतीत की बात है। एक और बात है, भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं हुआ है लेकिन सरकार में बैठे लोग अब ज़्यादा सावधान हो गए हैं।

(लेखक के निजी विचार हैं।)

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