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क्यों कांग्रेस से दूर भाग रही है सत्ता?

Sat, 21 May 2016 02:38 PM IST
सौतिक बिस्वास/बीबीसी संवाददाता
सौतिक बिस्वास/बीबीसी संवाददाता Updated Sat, 21 May 2016 02:38 PM IST
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- फोटो : reuters

आम चुनाव में ऐतिहासिक शिकस्त के दो साल बाद 130 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी में उबरने के संकेत बहुत कम दिख रहे हैं। 19 मई को भी कांग्रेस की मुश्किलें जारी रहीं और विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के साथ ही असम और केरल उसके हाथ से फिसल गए। अब कांग्रेस की सत्ता देश के 29 राज्यों से 6 राज्यों तक सिमट गई है। इनमें से आधे पूर्वोत्तर के छोटे-छोटे राज्य हैं। बिहार में वो जेडीयू के साथ गठबंधन में है। तमिलनाडु में पार्टी के प्रदर्शन को देखें तो गठबंधन के साझेदार के रूप में भी वो पिट रही है। उस पार्टी का ऐसा प्रदर्शन सिर चकरा देने वाला है, जिसने 2004 और 2009 में लगातार दो आम चुनाव जीते। 1989 के बाद ऐसा पहली बार हुआ था जब किसी पार्टी ने केंद्र में लगातार दो बार सरकार बनाई थी।

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एक के बाद एक घोटालों ने कांग्रेस को बौना बना दिया

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इसके बाद सामने आए एक के बाद एक घोटालों और ग़लत निर्णयों ने सरकार की उपलब्धियों को बौना बना दिया। राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव कहते हैं, “कांग्रेस में गिरावट बेहद गंभीर है और ये राष्ट्रीय पार्टी के रूप में भी सिकुड़ रही है।” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अकसर ‘कांग्रेस मुक्त’ भारत की बात करते रहते हैं और कांग्रेस उन्हें ग़लत साबित करने के लिए कुछ ख़ास नहीं कर रही है। कांग्रेस की सबसे बड़ी बाधा है नेहरू-गांधी परिवार पर उनकी बहुत अधिक निर्भरता। कई लोगों का मानना है कि नेहरू-गांधी परिवार में अब वो पहले वाला आकर्षण नहीं रहा।

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परिवारवाद भी एक बड़ी वजह है कांग्रेस के पतन की

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आलोचकों का कहना है कि परिवार के प्रभुत्व, निर्णय लेने में लड़खड़ाहट, सामंती राजनीतिक संस्कृति को बनाए रखने से चाटुकारिता को बढ़ावा मिला है और पार्टी का अंदरूनी लोकतंत्र कमज़ोर होने के साथ ही प्रतिभाओं का दम घुटा है। क्षेत्रीय नेताओं की निर्बलता का मतलब है कि परिवार पार्टी का सबसे बड़ा आकर्षण बना हुआ है। उत्तराधिकारी राहुल गांधी ने हाल के कुछ महीनों में मोदी और उनकी पार्टी के ख़िलाफ़ कुछ चिंगारी ज़रूर दिखाई है, लेकिन कई लोगों का मानना है कि मौजूदा राजनीति में जिस गति, ऊर्जा और फोकस बनाए रखने की ज़रूरत होती है, उसकी कमी पार्टी पर भारी पड़ रही है। पिछले साल, राहुल गांधी दो महीने की छुट्टियों पर गए थे और कहा जा रहा था कि वे पार्टी को उबारने के लिए नए विचारों के साथ लौटेंगे, लेकिन वे अब भी रिमोट कंट्रोल नज़र आते हैं और कार्यकर्ताओं की पहुँच से दूर हैं। पार्टी पदाधिकारी उम्मीद कर रहे हैं कि वे इस साल पार्टी की कमान अपनी मां सोनिया गांधी से अपने हाथ में ले लेंगे।

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भ्रष्टाचार के दाग भी कम नहीं हैं

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सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के प्रताप भानु मेहता कहते हैं, “पार्टी की मुख्य समस्या ये है कि ये न तो गांधी परिवार को छोड़ सकती है और न ही मौजूदा हालात में उसके साथ बनी रह सकती है।” एक धारणा ये बनी है कि कांग्रेस भ्रष्टाचार से दाग़दार है और इसे हंसते-हंसते सह लेती है। मेहता कहते हैं, “इससे पार्टी लड़खड़ा जाती है।” समृद्ध इतिहास वाली राजनीतिक पार्टियां आसानी से गुम नहीं होती। इससे पहले कम से कम दो बार कांग्रेस का मर्सिया पढ़ा जा चुका है। लेकिन, बढ़ती आकांक्षाओं और फैलते संचार वाले तेज़ी से बदलते भारत में पार्टी को भी नई उम्मीदें दिखाने की ज़रूरत है। मेहता कहते हैं, “कांग्रेस को उम्मीद की नई किरण दिखानी होगी या फिर उसे और अधिक राजनीतिक गुस्से का सामना करना पड़ेगा।”भाजपा से उसे ज़ोरदार तरीके से निपटना होगा। भाजपा ने राष्ट्रवाद का मुद्दा ज़ोर-शोर से उठाया है और उस पर अक्सर विभाजनकारी राजनीति करने का आरोप लगाया जाता है।

कहीं केंद्रीय विचारधारा तो कमजोर नहीं है

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एक नया इतिहास एक नए नेतृत्व और संगठनात्मक सुधार की मांग करेगा। राजनीतिक विश्लेषक ज़ोया हसन कहती हैं, “क्या ये विडंबना नहीं है कि कई वर्षों से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रबंधन ऐसी पार्टी के हाथ में था जो आंतरिक तौर पर एक अलोकतांत्रिक है।” कई लोगों का कहना है कि पार्टी की केंद्रीय विचारधारा कमजोर हुई है। काल्पनिक ‘मध्यम मार्ग’ पर चल रही पार्टी जो कि कभी समाज के प्रत्येक तबके का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती थी, भारत की तेज़ी से खंडित हो रही राजनीति में जनाधार खो रही है। लेकिन सब कुछ बर्बाद नहीं हुआ है। कांग्रेस नेता शशि थरूर ज़ोर देते हुए कहते हैं कि “कांग्रेस सबसे अधिक विश्वसनीय राष्ट्रीय विकल्प बनी रहेगी और इसका फिर से उदय होगा।”

गुजरात फतेह कांग्रेस में जान फूंक सकती है

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हसन कहती हैं कि तमाम कमियों के बावजूद कांग्रेस का बहुलतावादी चरित्र इसकी विशेषता बना रहेगा। वह कहती हैं, “कई बुराइयों के बीच ये भारत की गैर संकीर्ण विचार का प्रतिनिधित्व करती है।”
क्या पार्टी भारत को फिर से हासिल कर सकती है? इसकी शुरुआत के लिए कांग्रेस को बड़ा और अहम किला फतेह करना होगा और वो है गुजरात। मोदी का गृह राज्य जहाँ अगले साल चुनाव होने हैं। भाजपा शासित राज्यों में सरकारविरोधी लहर को भुनाने का ये अच्छा मौका हो सकता है और अच्छी शुरुआत भी।

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