आखिर क्यों चीनी सैनिक एलएसी पर सिख रेजीमेंट के सामने बजा रहे हैं पंजाबी गाने?
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भारत और चीन के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव अभी बरकरार है। यहां पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग त्सो इलाके में भारत और पीएलए के जवान आमने-सामने मौजूद हैं और दोनों तरफ से लगातार सैन्य क्षमता में बढ़ोतरी हो रही है। हाल के दिनों में फिंगर चार समेत कई इलाकों में भारतीय सैनिकों द्वारा मात खाने के बाद चीनी सैनिकों ने प्रोपगंडा फैलाना शुरू कर दिया है। फॉरवर्ड पोस्ट पर मौजूद सिख रेजीमेंट के जवानों पर दबाव बनाने की रणनीति के तहत चीनी सैनिकों ने हाल ही में इन इलाकों में पंजाबी में गाने बजाए और केंद्र सरकार के खिलाफ झूठी बातें फैलाने की कोशिश की।
दरअसल, चीनी सैनिकों द्वारा पंजाबी गाने बजाने और सिख सैनिकों को मुख्य रूप से अपना निशाना बनाने के पीछे एक प्रमुख कारण है। यह बात एक शताब्दी पुरानी है, जब 1900 में चीन में बॉक्सर विद्रोह हुआ था। उस वक्त मार्शल आर्ट में निपुण माने जाने वाले चीनी किसानों और कामगारों ने विदेशी प्रभाव के खिलाफ बगावत कर दी थी और चीनी ईसाईयों को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया था।
चीन में शुरू हुए इस विद्रोह के खिलाफ दुनिया के करीब आठ मुल्कों ने एकजुट होकर हमला किया और बॉक्सर विद्रोह को कुचलना शुरू किया। उस वक्त ब्रिटिश इंडिया की तरफ से करीब 3000 सिख सैनिक भी शामिल हुए थे। इन्हें चीन में मौजूद ईसाईयों और गिरजाघरों को बचाने की जिम्मेदारी दी गई थी। लंबी लड़ाई के बाद चीनी बॉक्सरों को हार मान ली थी। लेकिन इस युद्ध में सिखों के साहस को देखकर चीनी हैरान रह गए थे।
उस युद्ध के बाद ब्रिटेन, फ्रांस और रूस के सैनिकों ने चीन में काफी लूटपाट की थी और चीनियों को प्रताड़ित भी किया था। पैंगोंग त्सो से कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित चुशुल ब्रिगेड मुख्यालय मेस में अभी भी उस वक्त की लाफिंग बुद्धा की सोने की मूर्ति सहित कई कलाकृतियां हैं, जिन्हें सिख सैनिक लेकर आए थे। 1368-1644 मिंग राजवंश की एक कांस्य की घंटी जो 16 में से एक ब्रिटिश जनरल ने लूटी थी, उसे 1995 में भारतीय सेना ने बीजिंग के एक मंदिर को लौटा दी थी।
एक भारतीय सेना के कमांडर ने कहा कि यह ऐतिहासिक संदर्भ एक कारण हो सकता है कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी पंजाबी, या सिख सैनिकों पर इतना ध्यान केंद्रित करती है। और यही वजह है कि चीन के सैनिक लगातार तनाव वाले इलाके में पंजाबी गाने बजाकर ये एहसास दिला रहे हैं कि चीनी और पंजाबी एक हैं। चीन की ये चाल पंजाबी सैनिकों को तोड़ने का प्रयास है।
भारत के चीन युद्ध पर ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार नेविल मैक्सवेल ने अपनी मौलिक पुस्तक में कहा कि चीनी नेतृत्व ने क्रांति के बाद हुए अपमान का इस्तेमाल देश में आंदोलन खड़ा करने के लिए किया। मैक्सवेल ने भी माना कि इस मानसिकता और भारत के साथ 1962 के युद्ध के बीच एक कड़ी थी।
वहीं, भारतीय सेना के एक कमांडर का मानना है कि यह ऐतिहासिक संदर्भ एक कारण हो सकता है कि चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी पंजाबी या सिख सैनिकों पर इतना ध्यान क्यों केंद्रित करती है।