{"_id":"6a706e0cbd6e8ca1e705cabf","slug":"who-is-prashant-kishor-from-election-strategist-to-bankipur-bypoll-winner-journey-of-jan-suraaj-founder-2026-08-03","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"कौन हैं प्रशांत किशोर?: 31 साल, नौ चुनाव बाद ढहा BJP का गढ़; कभी पीएम मोदी के रणनीतिकार रहे PK की पूरी कहानी","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
कौन हैं प्रशांत किशोर?: 31 साल, नौ चुनाव बाद ढहा BJP का गढ़; कभी पीएम मोदी के रणनीतिकार रहे PK की पूरी कहानी
Mon, 03 Aug 2026 04:53 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Mon, 03 Aug 2026 04:53 PM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
सार
Please wait...
नितिन नवीन की सीट पर प्रशांत किशोर का डंका।
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
बिहार के बांकीपुर सीट पर हुए उपचुनाव में जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने जीत दर्ज की है। ये सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने राज्यसभा जाने से पहले छोड़ी थी। इससे पहले नितिन नवीन यहां से लगातार पांच बार, चार बार बांकीपुर और एक बार पटना पश्चिम(पहले बांकीपुर सीट का अधिकांश हिस्सा इसी सीट में आता था।) से जीते थे। नितिन के पिता नवीन किशोर सिन्हा लगातार चार बार पटना पश्चिम सीट से भाजपा के टिकट पर जीत चुके थे। 31 साल और 9 चुनाव के बाद भाजपा को यहां से हार मिली है। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीतने वाली जन सुराज पार्टी (जेएसपी) ने पहली बार जीत का स्वाद चखा है।ऐसे में यह जानना अहम है कि प्रशांत किशोर कौन हैं? उनकी राजनीति में आने से पहले की पूरी कहानी क्या है? सियासत में एंट्री के बाद कैसे-कैसे उनकी राह लगातार बदलती रही? किशोर के जनसुराज पार्टी खड़ी करने की क्या वजह रही है? बिहार में विधानसभा चुनाव न लड़ने के बाद उनके बांकीपुर उपचुनाव में उतरने की क्या वजह रही? आइये जानते हैं...
पहले जानें- कौन हैं प्रशांत किशोर, सियासत में एंट्री से पहले क्या था जीवन?
प्रशांत किशोर, जिन्हें सियासी गलियारों में पीके भी कहा जाता है भारत के सबसे लोकप्रिय राजनीतिक सलाहकारों में से एक रहे हैं। उन्हें पहली बार पहचान 2014 में पीएम मोदी के सफल हुए चुनावी अभियान के बाद मिली थी। हालांकि, समय के साथ प्रशांत किशोर प्रत्याशियों-पार्टियों के लिए अभियान चलाने से लेकर खुद की पार्टी बनाने और अब बांकीपुर में भाजपा के गढ़ को तोड़ने वाले नेता के तौर पर पहचान बनाने में सफल हुए हैं।राजनीति में आने से पहले क्या रही पहचान?
- प्रशांत किशोर का जन्म 20 मार्च 1977 को बिहार के सासाराम जिले में स्थित कोनार गांव में हुआ था। उनके पिता श्रीकांत पांडेय एक चिकित्सक थे और उनकी मां सुशीला पांडेय एक गृहिणी थीं। उनकी शुरुआती शिक्षा बक्सर में हुई और बाद में वे पढ़ाई के लिए हैदराबाद चले गए।
- उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से बैचलर्स इन बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (बीबीए) और जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी, अमेरिका, हिंदुजा अस्पताल के सहयोग से एएससीआई हैदराबाद से हेल्थकेयर मैनेजमेंट में मास्टर डिग्री हासिल की है। उनकी पत्नी जाह्नवी दास असम से ताल्लुक रखने वाली एक चिकित्सक हैं।
ये भी पढ़ें: Bankipur Election Result Live: बांकीपुर में प्रशांत किशोर जीत के करीब; 26वें राउंड के बाद 15 हजार की बढ़त
प्रशांत किशोर।
- फोटो :
अमर उजाला
राजनीति में आने से पहले प्रशांत किशोर ने आठ साल तक संयुक्त राष्ट्र द्वारा वित्तपोषित सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में काम किया। वे अफ्रीकी देश चाड में यूनिसेफ में सामाजिक नीति और योजना के प्रमुख के पद पर कार्यरत रहे और वहां एक संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन के नेतृत्व से भी जुड़े रहे।
1. कुपोषण पर रिपोर्ट से राजनीति में बना रास्ता
अब जानें- क्या है सियासी दुनिया में एंट्री की कहानी?
1. कुपोषण पर रिपोर्ट से राजनीति में बना रास्ता
- यूनिसेफ में काम करते हुए ही प्रशांत किशोर ने 2011 में भारत में आर्थिक समृद्धि और कुपोषण के विषय पर एक रिसर्च पेपर तैयार किया था। यह रिपोर्ट तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भेजी गई थी। बताया जाता है कि पहली बार इसी रिपोर्ट ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का ध्यान अपनी ओर खींचा था। इसके बाद मोदी ने प्रशांत किशोर को मिलने के लिए आमंत्रित किया।
- बैठक में प्रशांत किशोर ने मोदी को इतना प्रभावित किया कि पीएम पद के लिए दावेदारी पेश करने से ठीक पहले मोदी ने उन्हें एक राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में अपनी टीम का हिस्सा बना लिया। यहीं से प्रशांत किशोर के राजनीतिक करियर की शुरुआत हुई और उन्होंने 2012 के गुजरात विधानसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के सफल चुनाव अभियान में अहम भूमिका निभाई।
2. मोदी के लिए संभाला 2014 लोकसभा चुनाव अभियान का जिम्मा
2014 के लोकसभा चुनावों से पहले प्रशांत किशोर ने सिटिजन्स फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस (सीएजी) नाम की संस्था की सह-स्थापना की। इसने भाजपा के लिए चाय पे चर्चा और '3डी रैलियों' जैसे कई नए अभियान चलाए। माना जाता है कि प्रशांत किशोर की इन योजनाओं ने चुनाव में भाजपा को जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
3. फिर भाजपा से अलग हुए और कहलाए चुनावी रणनीतिकार
2014 के बाद भाजपा संगठन से मतभेदों के चलते वे पार्टी से अलग हो गए। इसके बाद उन्होंने इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (आईपैक) की स्थापना की। 2015 में उन्होंने बिहार में जदयू, राजद, कांग्रेस, आदि दलों के नेतृत्व वाले महागठबंधन को जीत दिलाई, वह भी भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए के खिलाफ। इसके बाद वे जदयू प्रमुख नीतीश कुमार के बेहद करीबी बनते चले गए।
बिहार चुनाव के बाद उन्होंने अलग-अलग राज्यों में कांग्रेस, आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी), दिल्ली में आम आदमी पार्टी, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कझगम (द्रमुक) जैसी कई पार्टियों के लिए चुनावी रणनीतियां बनाकर एक किंगमेकर के तौर पर अपनी पहचान बनाई।
1. जदयू से की राजनीतिक पारी की शुरुआत
पर्दे के पीछे से काम करने के बाद प्रशांत किशोर ने 2018 में औपचारिक रूप से राजनीति में प्रवेश किया। वे 16 सितंबर 2018 को नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल-यूनाइटेड (जदयू) में शामिल हो गए और उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। हालांकि, उनका यह सफर लंबा नहीं चला। 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के मुद्दे पर नीतीश कुमार से उनके मतभेद हुए। इसके बाद उन्हें अनुशासनहीनता के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।
सक्रिय राजनीति में कैसे उतरे प्रशांत किशोर?
1. जदयू से की राजनीतिक पारी की शुरुआत
पर्दे के पीछे से काम करने के बाद प्रशांत किशोर ने 2018 में औपचारिक रूप से राजनीति में प्रवेश किया। वे 16 सितंबर 2018 को नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल-यूनाइटेड (जदयू) में शामिल हो गए और उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। हालांकि, उनका यह सफर लंबा नहीं चला। 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के मुद्दे पर नीतीश कुमार से उनके मतभेद हुए। इसके बाद उन्हें अनुशासनहीनता के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।
2. राजनीति से बाहर हुए, पर बिहार 'लौटे'
2021 में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और तमिलनाडु में द्रमुक को अपनी रणनीति से शानदार जीत दिलाने के बाद प्रशांत किशोर ने 2 मई 2021 को चुनाव रणनीतिकार के काम से हमेशा के लिए संन्यास लेने की घोषणा कर दी। तब उन्होंने बताया कि कोविड-19 महामारी के दौरान इतने संसाधनों और संपर्कों के बावजूद लोगों की मदद न कर पाने की लाचारी ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया। किशोर का कहना था कि बिहार में सुशासन के खोखले दावों ने उन्हें वापस अपने राज्य लौटने के लिए प्रेरित किया।
3. बिहार में खुद की पार्टी खड़ी करने की ये है कहानी
बिहार लौटने के बाद प्रशांत किशोर ने सीधे जनता के बीच जाकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार की और पदयात्रा से लेकर पार्टी तक की स्थापना कर डाली।
2021 में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और तमिलनाडु में द्रमुक को अपनी रणनीति से शानदार जीत दिलाने के बाद प्रशांत किशोर ने 2 मई 2021 को चुनाव रणनीतिकार के काम से हमेशा के लिए संन्यास लेने की घोषणा कर दी। तब उन्होंने बताया कि कोविड-19 महामारी के दौरान इतने संसाधनों और संपर्कों के बावजूद लोगों की मदद न कर पाने की लाचारी ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर किया। किशोर का कहना था कि बिहार में सुशासन के खोखले दावों ने उन्हें वापस अपने राज्य लौटने के लिए प्रेरित किया।
3. बिहार में खुद की पार्टी खड़ी करने की ये है कहानी
बिहार लौटने के बाद प्रशांत किशोर ने सीधे जनता के बीच जाकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार की और पदयात्रा से लेकर पार्टी तक की स्थापना कर डाली।
जनसुराज पार्टी की स्थापना की कहानी।
- फोटो :
अमर उजाला
4. बिहार विधानसभा चुनाव में अपने दल को लड़ाया
जन सुराज पार्टी ने 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों में अपने उम्मीदवार उतारे, हालांकि प्रशांत किशोर ने खुद चुनाव नहीं लड़ा। इस चुनाव में जेएसपी को बुरी तरह हार मिली और उसका एक भी उम्मीदवार जीत नहीं पाया। इसके बावजूद प्रशांत किशोर ने बिहार में अपना डेरा जमाए रखा और संकेत दिया कि अगले चुनाव तक वे पार्टी की नींव मजबूत करने के लिए राज्य की जनता के बीच पहुंचते रहेंगे।
5. ...और अब बांकीपुर उपचुनाव में जीत
बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा-जदयू गठबंधन की बंपर जीत हुई। इस चुनाव के कुछ समय बाद ही भाजपा ने राज्य की बांकीपुर सीट से विधायक चुने गए नितिन नवीन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए। इसके बाद पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेजने का फैसला किया। इस घटनाक्रम के बीच प्रशांत किशोर ने एलान किया कि वह खुद बांकीपुर में चुनाव लड़ने उतरेंगे।
जन सुराज पार्टी ने 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों में अपने उम्मीदवार उतारे, हालांकि प्रशांत किशोर ने खुद चुनाव नहीं लड़ा। इस चुनाव में जेएसपी को बुरी तरह हार मिली और उसका एक भी उम्मीदवार जीत नहीं पाया। इसके बावजूद प्रशांत किशोर ने बिहार में अपना डेरा जमाए रखा और संकेत दिया कि अगले चुनाव तक वे पार्टी की नींव मजबूत करने के लिए राज्य की जनता के बीच पहुंचते रहेंगे।
5. ...और अब बांकीपुर उपचुनाव में जीत
बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा-जदयू गठबंधन की बंपर जीत हुई। इस चुनाव के कुछ समय बाद ही भाजपा ने राज्य की बांकीपुर सीट से विधायक चुने गए नितिन नवीन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए। इसके बाद पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेजने का फैसला किया। इस घटनाक्रम के बीच प्रशांत किशोर ने एलान किया कि वह खुद बांकीपुर में चुनाव लड़ने उतरेंगे।