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जहां आजाद हिंद फौज के 2300 सैनिकों को मौत के घाट उतारा, वहां नहीं मिल रही फूल चढ़ाने की इजाजत

Sat, 08 Aug 2020 05:17 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Sat, 08 Aug 2020 05:17 PM IST
सार

बनारस की सुभाष संस्था के महासचिव तमल सान्याल ने इस इंस्टीट्यूट के भीतर जाकर आजाद हिंद फौज के शहीदों को श्रद्धांजलि देने और लोगों को इस घटना के बारे में बताने के लिए एक छोटा सा कार्यक्रम आयोजित करने की इजाजत मांगी थी, जिसके लिए इंस्टीट्यूट ने मना कर दिया...

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Where 2300 soldiers of Azad Hind Fauj were killed, there is no permission to offer flowers
Jute Reserch Centre Entrence - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

ये पढ़कर भले ही कुछ अजीब सा लगे, मगर यह सच है। भारत की जमीन पर अंग्रेजों ने 25 सितंबर, 1945 की रात को जलियांवाला बाग जैसी क्रूरता को अंजाम दिया था। पश्चिम बंगाल के नीलगंज इलाके में ब्रिटिश आर्मी ने आजाद हिंद फौज के करीब 2,300 सैनिकों पर मशीनगन चलाकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया। यह घटना इतिहास में उस तरह से जगह नहीं पा सकी, जैसे जलियांवाला बाग हत्याकांड ने लोगों को हिलाकर रख दिया था।
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श्रद्धांजलि देने से किया मना

आजादी के बाद यहां भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर जूट एंड एलायड रिसर्च खुल गया। बनारस की सुभाष संस्था के महासचिव तमल सान्याल ने इस इंस्टीट्यूट के भीतर जाकर आजाद हिंद फौज के शहीदों को श्रद्धांजलि देने और लोगों को इस घटना के बारे में बताने के लिए एक छोटा सा कार्यक्रम आयोजित करने की इजाजत मांगी थी, जिसके लिए इंस्टीट्यूट ने मना कर दिया है। इंस्टीट्यूट का कहना है कि इस बाबत केंद्रीय गृह मंत्रालय से बात करें।

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आजादी से पहले साहेब बागान था जगह का नाम

सुभाष संस्था के महासचिव तमल सान्याल और उत्तर 24 परगना स्थित नीलगंज (बैरकपुर) में नेताजी सुभाष चंद्र मिशन के सचिव सधन बोस के मुताबिक, आजादी से पहले यहां पर साहेब बागान था। इसके अलावा यहां पर आर्मी कैंप भी स्थापित किया गया। कैंप में ब्रिटिश आर्मी के अफसर रहते थे। सितंबर 1945 के दौरान इस बागान में युद्धबंदी लाए गए। ये युद्धबंदी कोई और नहीं, बल्कि आजाद हिंद फौज के सदस्य थे।

इन्हें दुनिया के विभिन्न हिस्सों से पकड़ कर लाया गया था। 25 सितंबर की रात ब्रिटिश आर्मी ने एक योजना के तहत नरसंहार की घटना को अंजाम दिया। आर्मी कैंप में चारों तरफ खून बिखरा पड़ा था। हैरानी की बात यह थी कि सैनिकों के खून से केवल बागान ही लथपथ नहीं था, बल्कि निकटवर्ती नौआई नदी की राह भी लाल हो चुकी थी। नरसंहार के बाद ब्रिटिश आर्मी ने सैनिकों के शवों को इसी नदी में फेंक दिया था।

 

 

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जांच रिपोर्ट में लिखा, घटना तो हुई, मगर शव कहां हैं?

जब यह मामला तूल पकड़ने लगा तो ब्रिटिश आर्मी की पूर्वी कमान के मेजर जनरल 6-ओएमडी को इस हत्याकांड की जांच सौंपी गई। उन्होंने जब घटनास्थल का मुआयना किया, तो सच सामने आ गया। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि यहां हत्याकांड को अंजाम दिया गया है, मगर इतनी जल्दी शव कहां चले गए। चूंकि अंग्रेजों ने सभी शवों को रातों-रात नदी में फेंक दिया था, इसलिए वहां कोई सबूत नहीं बचा था।

इंडियन नेशनल आर्मी के कर्नल जीएस ढिल्लन ने अपने एक पत्र में इस हत्याकांड का जिक्र करते हुए लिखा था, 25 सितंबर की उस रात 2,300 सैनिकों को मार डाला गया था। कोलकाता यूनिवर्सिटी से नेताजी सुभाष चंद्र बोस पर शोध कर चुके डॉ. जयंत चौधरी ने लिखा है, आजाद हिंद फौज के सैनिकों के शव ट्रकों में भरकर नदी पर लाए गए। बहुत से शव ऐसे भी रहे, जो आसपास के जंगलों में फेंक दिए गए। चूंकि यह एक नरसंहार था, इसलिए शवों की संख्या भी बहुत ज्यादा थी। ताड़ के पेड़ों पर सैनिकों के शव पड़े होने के सबूत मिले थे। 

 

 

लड़ाई तो जारी रहेगी...

तमल सान्याल का कहना है कि वे लंबे समय से यह लड़ाई लड़ रहे हैं। मुझे समझ नहीं आता कि इंस्टीट्यूट को आखिर क्या दिक्कत है। वह किसी दूसरे मुल्क का हिस्सा तो नहीं है न। भारत में है, वहां भारत का कानून लागू होता है। लोग उस नरसंहार के बारे में जानना चाहते हैं।

यदि हम वहां जाकर आजाद हिंद फौज के शहीदों को श्रद्धांजलि दें तो इसमें हर्ज क्या है। स्थानीय लोग जब अपने शहीदों को श्रद्धांजलि देने जाते हैं, तो उन्हें जूट संस्थान के मुख्य गेट पर ही रोक दिया जाता है। सुभाष संस्था ने सरकार से मांग की थी कि नीलगंज में श्रद्धांजलि समारोह आयोजित करने की इजाजत दी जाए। खैर, ये संघर्ष जारी रहेगा। इस बाबत जल्द ही केंद्रीय गृह मंत्रालय के साथ पत्राचार शुरू होगा।

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