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.. जब कविता पढ़ रहे अटल बिहारी वाजपेयी को लड़कियों ने किया हूट
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sun, 25 Dec 2016 03:33 PM IST
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फाइलः पूर्व PM अटल बिहारी वाजपेयी
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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन पर कुछ रोचक मगर कम चर्चित किस्से पढ़िए।
1. 1953 की बात है। मुंबई सेंट्रल स्टेशन पर जैसे ही देहरादून एक्सप्रेस से युवा अटल उतरे, एक गोरे चिट्ठे आदमी ने पंजाबी लहजे में पूछा, 'त्वाडा नाम अटल बिहारी है?' अटल ने हाथ जोड़कर कहा, 'जी! दिल्ली से मुझे जनसंघ के अध्यक्ष दीनदयाल जी ने भेजा है।' शाम को विले पार्ले में भाषण था और मुंबई में जनसंघ के सर्वेसर्वा पंजाब के बख्शी जी थोड़ा परेशान थे कि ये लड़का आखिर क्या बोल पाएगा। उन्होंने अटल बिहारी को तैयार होने के लिए कहा।
अटलजी ने देखते ही देखते अपने झोले से एक धोती कुर्ता निकाल लिया। वो कुर्ता आस्तीन के पास फटा हुआ था। बख्शी बोले, 'जनसंघ के मंच पर फटे कुर्ते से भाषण दोगे?' तब अटल ने दूसरा कुर्ता निकाला जो गले के पास से फटा था और कहा, 'मैं इस पर जैकेट पहन लूंगा!'
2. देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी वाजपेयी की हिंदी से प्रभावित थे। वह उनके सवालों का जवाब संसद में हिंदी में ही देते थे। विदेश नीति हमेशा उनका प्रिय विषय रहा। एक बार नेहरू ने जनसंघ की आलोचना की तो अटल ने कहा, 'मैं जानता हूं पंडित जी रोजाना शीर्षासन करते हैं। वह शीर्षासन करें, मुझे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन मेरी पार्टी की तस्वीर उलटी ना देखें।' इतना सुनना था कि नेहरू जी भी ठहाका मारकर हंस पड़े।
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1. 1953 की बात है। मुंबई सेंट्रल स्टेशन पर जैसे ही देहरादून एक्सप्रेस से युवा अटल उतरे, एक गोरे चिट्ठे आदमी ने पंजाबी लहजे में पूछा, 'त्वाडा नाम अटल बिहारी है?' अटल ने हाथ जोड़कर कहा, 'जी! दिल्ली से मुझे जनसंघ के अध्यक्ष दीनदयाल जी ने भेजा है।' शाम को विले पार्ले में भाषण था और मुंबई में जनसंघ के सर्वेसर्वा पंजाब के बख्शी जी थोड़ा परेशान थे कि ये लड़का आखिर क्या बोल पाएगा। उन्होंने अटल बिहारी को तैयार होने के लिए कहा।
अटलजी ने देखते ही देखते अपने झोले से एक धोती कुर्ता निकाल लिया। वो कुर्ता आस्तीन के पास फटा हुआ था। बख्शी बोले, 'जनसंघ के मंच पर फटे कुर्ते से भाषण दोगे?' तब अटल ने दूसरा कुर्ता निकाला जो गले के पास से फटा था और कहा, 'मैं इस पर जैकेट पहन लूंगा!'
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2. देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी वाजपेयी की हिंदी से प्रभावित थे। वह उनके सवालों का जवाब संसद में हिंदी में ही देते थे। विदेश नीति हमेशा उनका प्रिय विषय रहा। एक बार नेहरू ने जनसंघ की आलोचना की तो अटल ने कहा, 'मैं जानता हूं पंडित जी रोजाना शीर्षासन करते हैं। वह शीर्षासन करें, मुझे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन मेरी पार्टी की तस्वीर उलटी ना देखें।' इतना सुनना था कि नेहरू जी भी ठहाका मारकर हंस पड़े।
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'इंदिरा जी हमारी तरफ प्यार से देखती हैं'
फाइलः पूर्व PM अटल बिहारी वाजपेयी
3. बात उन दिनों की है जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं और वाई. बी. चव्हाण गृहमंत्री। इंदिरा गांधी उन्हें गृहमंत्री के पद से हटाना चाहती थीं। चव्हाण को वित्तमंत्री बना दिया गया। उस वक्त हालात बहुत खराब थे और महंगाई सर चढ़कर बोल रही थी।
संसद में महंगाई पर वित्तमंत्री के तौर पर चव्हाण जवाब दे रहे थे, लेकिन वह बार बार कह रहे थे, 'वी विल अरेस्ट द प्राइसेज।' चव्हाण ने जब तीन चार बार यही बात दुहराई तो वाजपेयी खड़े हुए और कहा, 'महाराज! अरेस्ट तो आप गृहमंत्री के तौर पर करते थे, अब तो आप महंगाई को रोकने का इंतजाम कीजिए!'
4. अप्पा घटाटे वाजपेयी के करीबियों में से रहे हैं। वो एक किस्सा सुनाते हैं। अस्सी के दशक में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं, अटल बिहारी उत्तर प्रदेश में हरिजनों पर अत्याचार की घटना को लेकर पदयात्रा कर रहे थे।
अप्पा ने वाजपेयी से पूछा, 'वाजपेयी ये पदयात्रा कब तक चलेगी?' जवाब मिला, 'जब तक पद नहीं मिलता, यात्रा चलती रहेगी!' 1971 के लोकसभा चुनावों में जनसंघ के सांसदों की तादाद 35 से घटकर 22 रह गई। अप्पा घटाटे ने पूछा, 'इंदिरा जी की क्या प्रतिक्रिया है?' वाजपेयी हंसकर बोले, 'अभी तो हमारी तरफ बहुत प्यार से देखती हैं!'
संसद में महंगाई पर वित्तमंत्री के तौर पर चव्हाण जवाब दे रहे थे, लेकिन वह बार बार कह रहे थे, 'वी विल अरेस्ट द प्राइसेज।' चव्हाण ने जब तीन चार बार यही बात दुहराई तो वाजपेयी खड़े हुए और कहा, 'महाराज! अरेस्ट तो आप गृहमंत्री के तौर पर करते थे, अब तो आप महंगाई को रोकने का इंतजाम कीजिए!'
4. अप्पा घटाटे वाजपेयी के करीबियों में से रहे हैं। वो एक किस्सा सुनाते हैं। अस्सी के दशक में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं, अटल बिहारी उत्तर प्रदेश में हरिजनों पर अत्याचार की घटना को लेकर पदयात्रा कर रहे थे।
अप्पा ने वाजपेयी से पूछा, 'वाजपेयी ये पदयात्रा कब तक चलेगी?' जवाब मिला, 'जब तक पद नहीं मिलता, यात्रा चलती रहेगी!' 1971 के लोकसभा चुनावों में जनसंघ के सांसदों की तादाद 35 से घटकर 22 रह गई। अप्पा घटाटे ने पूछा, 'इंदिरा जी की क्या प्रतिक्रिया है?' वाजपेयी हंसकर बोले, 'अभी तो हमारी तरफ बहुत प्यार से देखती हैं!'
जब वाजपेयी ने कहा, 'हिंदू राष्ट्र तो सो रहा है'
फाइलः पूर्व PM अटल बिहारी वाजपेयी
5. 1991 में लखनऊ में चुनाव प्रचार चल रहा था। कलराज मिश्र बीजेपी यूपी के अध्यक्ष थे, वह वाजपेयी से मिलने आए लेकिन वाजपेयी प्रचार पर गए हुए थे। जब लौटे तो देखा कि कलराज मिश्र सोफे पर एसी में सो रहे हैं। वाजपेयी ने अपने खास लहजे में कहा, 'लो, हिंदू राष्ट्र तो सो रहा है। कैसे काम चलेगा।'
6. एक बार आगरा कॉलेज में प्रतियोगिता थी। वाजपेयी तब वहां बी. ए. की पढ़ाई कर रहे थे। कॉलेज में लड़कियों का एक हॉस्टल था, डेविस हॉस्टल। इन लड़कियों ने तय कर रखा था कि ग्वालियर के कवियों को हूट करना है। प्रतियोगिता शुरू होने से पहले ही वे आगे आकर बैठ गयीं। कवि वीरेंद्र मिश्र के गीत को जब पहले हूट किया गया तो उनके साथी कवि तो समारोह स्थल से ही गायब हो गए। जब वाजपेयी ने अपनी वीर रस की कविता सुनाईः
नौ अगस्त सन् बयालिस का स्वर्णिम रक्त प्रभात
जली आंसुओं की कारा में काली काली रात
जब ये कविता उन्होंने सुनानी शुरू की तो लड़कियों ने 'प्रभात, प्रभात' कह कर उनकी हूटिंग शुरू कर दी। वाजपेयी आधे उखड़े, आधे जमे हुए से बने रहे। और फिर ऐसे जमे कि कवि सम्मेलन का माहौल ही बदल गया।
6. एक बार आगरा कॉलेज में प्रतियोगिता थी। वाजपेयी तब वहां बी. ए. की पढ़ाई कर रहे थे। कॉलेज में लड़कियों का एक हॉस्टल था, डेविस हॉस्टल। इन लड़कियों ने तय कर रखा था कि ग्वालियर के कवियों को हूट करना है। प्रतियोगिता शुरू होने से पहले ही वे आगे आकर बैठ गयीं। कवि वीरेंद्र मिश्र के गीत को जब पहले हूट किया गया तो उनके साथी कवि तो समारोह स्थल से ही गायब हो गए। जब वाजपेयी ने अपनी वीर रस की कविता सुनाईः
नौ अगस्त सन् बयालिस का स्वर्णिम रक्त प्रभात
जली आंसुओं की कारा में काली काली रात
जब ये कविता उन्होंने सुनानी शुरू की तो लड़कियों ने 'प्रभात, प्रभात' कह कर उनकी हूटिंग शुरू कर दी। वाजपेयी आधे उखड़े, आधे जमे हुए से बने रहे। और फिर ऐसे जमे कि कवि सम्मेलन का माहौल ही बदल गया।
जब वाजपेयी ने कार्यकर्ता के मुंह पर हाथ रख किया मना
फाइलः पूर्व PM अटल बिहारी वाजपेयी
7. 1971 की जंग के बाद वाजपेयी ने सेना पर एक बेहद खूबसूरत निबंध लिखा। वाजपेयी ने लिखा, 'एक रात पश्चिमी मोर्चे पर तैनात एक जवान विमान चालक का फोन मेरे पास आया, कि आप हमारी कुछ मदद करिए। मैंने पूछा, 'भाई क्या परेशानी है, क्या घर की याद आ रही है या दुश्मन का दबाव बढ़ रहा है?'
जवान ने जवाब दिया, 'नहीं! ऐसी बात नहीं है। मेरी परेशानी ये है कि मेरे कमांडर पाकिस्तान पर बमबारी करने के लिए मुझे उतनी बार नहीं जाने देते जितनी बार मैं जाना चाहता हूं। वे कहते हैं कि इंतजार करो औरों का नंबर है। मैं इंतजार नहीं करना चाहता, फिर जाना चाहता हूं।' मैं सोचने लगा कि ये जवान किस मिट्टी का बना है। पाकिस्तान में बमवर्षा के लिए जाना मौत को निमंत्रण देना था, सर पर कफन बांधकर कूदना था, लेकिन शिकायत कर रहा है। ऐसे जवान जिस देश में हैं, उसे कौन परास्त कर सकता है!'
8. 1990 में अयोध्या आंदोलन चरम पर था। ग्वालियर से कारसेवकों का जत्था झांसी के लिए रवाना हो रहा था। उसी वक्त सूचना मिली कि वाजपेयी रेल से ग्वालियर से होकर भोपाल जाने वाले हैं। शताब्दी एक्सप्रेस ग्वालियर स्टेशन पर रुकी। वाजपेयी ट्रेन से बाहर आए तो नारे लगने लगे, 'अटल बिहारी जिंदाबाद'। फिर 'रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे। खून की होली खेलेंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे' के नारे लगने लगे।
ऐसे नारे सुनते ही वाजपेयी भीड़ को चीरते हुए नारा लगाने वाले कार्यकर्ता के पास आए और उसके मुंह पर हाथ रखकर उसे चुप करा दिया। बाद में वाजपेयी ने कहा कि वे राष्ट्रीय आंदोलन को कट्टरता के उन्माद से कलंकित होते नहीं देखना चाहते थे।
जवान ने जवाब दिया, 'नहीं! ऐसी बात नहीं है। मेरी परेशानी ये है कि मेरे कमांडर पाकिस्तान पर बमबारी करने के लिए मुझे उतनी बार नहीं जाने देते जितनी बार मैं जाना चाहता हूं। वे कहते हैं कि इंतजार करो औरों का नंबर है। मैं इंतजार नहीं करना चाहता, फिर जाना चाहता हूं।' मैं सोचने लगा कि ये जवान किस मिट्टी का बना है। पाकिस्तान में बमवर्षा के लिए जाना मौत को निमंत्रण देना था, सर पर कफन बांधकर कूदना था, लेकिन शिकायत कर रहा है। ऐसे जवान जिस देश में हैं, उसे कौन परास्त कर सकता है!'
8. 1990 में अयोध्या आंदोलन चरम पर था। ग्वालियर से कारसेवकों का जत्था झांसी के लिए रवाना हो रहा था। उसी वक्त सूचना मिली कि वाजपेयी रेल से ग्वालियर से होकर भोपाल जाने वाले हैं। शताब्दी एक्सप्रेस ग्वालियर स्टेशन पर रुकी। वाजपेयी ट्रेन से बाहर आए तो नारे लगने लगे, 'अटल बिहारी जिंदाबाद'। फिर 'रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे। खून की होली खेलेंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे' के नारे लगने लगे।
ऐसे नारे सुनते ही वाजपेयी भीड़ को चीरते हुए नारा लगाने वाले कार्यकर्ता के पास आए और उसके मुंह पर हाथ रखकर उसे चुप करा दिया। बाद में वाजपेयी ने कहा कि वे राष्ट्रीय आंदोलन को कट्टरता के उन्माद से कलंकित होते नहीं देखना चाहते थे।
कैसे शुरू हुई भारत-पाकिस्तान बस सेवा
फाइलः पूर्व PM अटल बिहारी वाजपेयी
9. बहुत कम लोग जानते होंगे कि लाहौर बस का सपना न्यूयॉर्क में पैदा हुआ था। 23 सितंबर 1998 को न्यूयॉर्क में यूएन जनरल असेंबली की साइडलाइंस पर मीटिंग हो रही थी। इस लंच मीटिंग में भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, पाकिस्तान के वजीरे आजम नवाज शरीफ, विदेश मंत्री जसवंत सिंह और विदेश सचिव के. रघुनाथ मौजूद थे। मीटिंग का माहौल थोड़ी देर में अनौपचारिक हो गया। नवाज शरीफ गुजरे दिनों को याद करने लगे। शरीफ ने 1982 में हुए एशियन खेलों का जिक्र करते हुए कहा कि तब वे अपनी कार से दिल्ली आए थे और फिर आगरा गए थे। उस वक्त वे पंजाब सरकार में मंत्री थे।
बातचीत के बाद विदेश मंत्रालय में अफसर विवेक काटजू ने जसवंत सिंह को आइडिया दिया कि लाहौर-दिल्ली बस सेवा शुरू की जानी चाहिए। जसवंत सिंह ने नवाज शरीफ से कहा, 'आप दिल्ली और लाहौर के बीच रोजाना बस सेवा क्यों नहीं शुरू करते?'
नवाज ने कहा, 'बहुत अच्छा आइडिया है।'
10. वाजपेयी सरकर की डूबती उतराती नैया में तीन देवियों की भूमिका बड़ी अहम रही। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि तमिलनााडु से एआईएडीएमके की नेता जयललिता की दोस्ती दरअसल बीजपी नेता लालकृष्ण आडवाणी से थी। वाजपेयी को जयललिता के धुर विरोधी डीएमके के नेता करुणानिधि का करीबी माना जाता रहा है। दोनों के बीच रिश्तों के कभी सहज न हो पाने की शायद यह एक बड़ी वजह रही हो।
1996 में जब 13 दिन की वाजपेयी सरकरा बनी थी, उस वक्त भी जयललिता को साथ लाने की कोशिशें की गई थीं, लेकिन जयललिता तब तैयार नहीं हुई। हालांकि उससे भी पहले 1994 में एक बड़ी तमिल पत्रिका 'आनंद वेंकटन' ने लिखा, 'बीजेपी मायने भारतीय जया पार्टी और एआईएडीएमके यानी आडवाणी इंडिया द्रमुक पार्टी।' इसकी एक बड़ी वजह ये मानी जाती रही कि आडवाणी और जयललिता हिंदुत्व के चेहरे थे।
सभी प्रसंग वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी की किताब 'हार नहीं मानूंगा' से साभार।
बातचीत के बाद विदेश मंत्रालय में अफसर विवेक काटजू ने जसवंत सिंह को आइडिया दिया कि लाहौर-दिल्ली बस सेवा शुरू की जानी चाहिए। जसवंत सिंह ने नवाज शरीफ से कहा, 'आप दिल्ली और लाहौर के बीच रोजाना बस सेवा क्यों नहीं शुरू करते?'
नवाज ने कहा, 'बहुत अच्छा आइडिया है।'
10. वाजपेयी सरकर की डूबती उतराती नैया में तीन देवियों की भूमिका बड़ी अहम रही। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि तमिलनााडु से एआईएडीएमके की नेता जयललिता की दोस्ती दरअसल बीजपी नेता लालकृष्ण आडवाणी से थी। वाजपेयी को जयललिता के धुर विरोधी डीएमके के नेता करुणानिधि का करीबी माना जाता रहा है। दोनों के बीच रिश्तों के कभी सहज न हो पाने की शायद यह एक बड़ी वजह रही हो।
1996 में जब 13 दिन की वाजपेयी सरकरा बनी थी, उस वक्त भी जयललिता को साथ लाने की कोशिशें की गई थीं, लेकिन जयललिता तब तैयार नहीं हुई। हालांकि उससे भी पहले 1994 में एक बड़ी तमिल पत्रिका 'आनंद वेंकटन' ने लिखा, 'बीजेपी मायने भारतीय जया पार्टी और एआईएडीएमके यानी आडवाणी इंडिया द्रमुक पार्टी।' इसकी एक बड़ी वजह ये मानी जाती रही कि आडवाणी और जयललिता हिंदुत्व के चेहरे थे।
सभी प्रसंग वरिष्ठ पत्रकार विजय त्रिवेदी की किताब 'हार नहीं मानूंगा' से साभार।