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यादों में नारायण : जब तिवारी जी ने पीठ थपथपा कर दी अध्ययन करने की सीख

Fri, 19 Oct 2018 04:03 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 19 Oct 2018 04:03 AM IST
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When ND Tiwari patted Hriday Narayan Dixit and askded him to continue study

मैं नवीं विधानसभा का पहली बार सदस्य बना। वर्ष 1985 की बात है। मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी जी केंद्र बुला लिए गए। यहां वीर बहादुर सिंह मुख्यमंत्री बने। तिवारी जी थोड़े समय बाद फिर लौटे और मुख्यमंत्री बना दिए गए। पर, वह विधान मंडल के किसी सदन के सदस्य नहीं थे। सदन शुरू हुआ। तिवारी जी सदन में आए। मैंने औचित्य का प्रश्न उठाया, ‘इस सदन में एक अजनबी भी बैठे हैं। उनकी स्थिति स्पष्ट की जाए, क्योंकि अजनबी सदन में नहीं बैठ सकता।

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तिवारी जी मुस्करा रहे थे। तत्कालीन संसदीय कार्यमंत्री डॉ. अम्मार रिजवी कुछ बोलने के लिए खड़े हुए। तिवारी जी ने उन्हें बैठने का इशारा किया। खुद खड़े हुए और बोले, ‘कोई व्यक्ति विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य न रहते हुए भी छह महीने तक मुख्यमंत्री अथवा मंत्री रह सकता है। ऐसा नहीं है कि यह बात हमारे नौजवान दीक्षित जी को पता नहीं है। दीक्षित जी को पता है कि जो वह कह रहे हैं उसका कोई सांविधानिक आधार नहीं है। पर, मुझे खुशी है कि जब मैं यहां से दिल्ली गया था, तब वह पैने हो रहे थे और अब जब मैं लौटकर आया हूं तो वह पैने हो चुके हैं। पैनेपन से सदन में अपनी बात रखना आ गया है।’ 
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मैं फिर खड़ा हुआ और अध्यक्ष को संबोधित करते हुए बोला, ‘औचित्य के प्रश्न के जरिये यह सवाल मैं पहली बार नहीं उठा रहा हूं। मैने विधायक बनने के बाद पुरानी कार्यवाहियां पढ़ी हैं। जिनमें यह उल्लेख मिलता है कि मुझसे पहले आदरणीय तिवारी जी ने भी एक बार तत्कालीन मुख्यमंत्री को लेकर औचित्य के जरिये ऐसा ही सवाल उठाया था। मैने उसी को आधार बनाकर यह बात कही है।’
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तिवारी जी मुस्कराए और खड़े होकर बोले, ‘दीक्षित जी! तब हम उधर की कुर्सी (विपक्ष) पर थे। भूमिका दूसरी थी। अब हम इधर की कुर्सी (सत्तापक्ष) पर हैं। अब भूमिका बदली हुई है। कुर्सियों और स्थान के साथ भूमिका ही नहीं बदलती सवाल और जवाब भी बदल जाते हैं। कभी न कभी आप भी इधर (सत्तापक्ष) में कुर्सी पर बैठोगे तो यही कहोगे। मुझे पता है कि बहुत पढ़ते हो। पर, हमेशा यह ध्यान रखना कि बदली भूमिका में वही शब्द बदलें, जिससे आपका आचरण न प्रभावित हो। किसी पर उसका असर न पड़ रहा हो। वह सदन से निकले तो मुझे बुलवाया और पीठ थपथपाई कि ऐसे ही खूब पढ़ते रहो।

मैने आलोचना की, उन्होंने सड़क बनवा दी...

तिवारी जी मुख्यमंत्री थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गंगा पर अभियान शुरू किया था। विधानसभा में मैं गंगा अभियान पर बोल रहा था। जाहिर है कि विपक्ष में होने के नाते मुझे सवाल उठाना ही था। तिवारी जी बैठे हुए बीच-बीच में नोट कर रहे थे। 

सदन उठा तो उन्होंने अपने सहायक से मुझे अपने कक्ष में बुलवाया। मैं गया और उनका चरणस्पर्श किया। मुझे लग रहा था कि वह नाराज होंगे। पर, उल्टा हुआ। उन्होंने मिठाई मंगवाई और खिलाई। स्नेहपूर्वक बैठाया। कहा कि तुम पढ़ते ही नहीं हो बल्कि ठीक से पढ़ते हो। बहुत अच्छे बिंदु उठाए। नए विधायक हो। ऐसे ही सीखते रहो। क्षेत्र में लोगों के काम कराओ। विकास कराओ। कभी कोई समस्या हो तो नि:संकोच हमारे पास आ जाना। 

फिर पूछा कि इस समय भी कोई काम हो तो बताओ। मुझे अपने जिले उन्नाव की वह सड़क याद आ गई जो मवई को जाती थी और उस पर चलना मुश्किल था। मैने तुरंत नाम बताया। तिवारी जी ने उन्नाव के तत्कालीन जिलाधिकारी को फोन किया और कहा, ‘आपके यहां के दीक्षित जी हैं तो नौजवान लेकिन काफी अध्ययनशील हैं। उत्साही और उदीयमान विधायक है। क्षेत्र में इस नौजवान का प्रभाव बढ़ना चाहिए। इस समय धन न मेरे पास है और न आपके पास होगा। पर, इनकी बताई हुई सड़क तुरंत बनना इसलिए जरूरी है क्योंकि लोगों को इस नौजवान विधायक पर भरोसा बढ़े। धाक जमे। इससे इनमें विकास का काम कराने का उत्साह पैदा होगा। सरकार की साख तो बनेगी ही बनेगी। धन की मैं बाद में व्यवस्था करा दूंगा।’ अगले दिन मैं जब अपने क्षेत्र में गया तो देखा कि मवई की सड़क निर्माण का काम शुरू हो चुका था।

- हृदय नारायण दीक्षित, (विधानसभा अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश

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