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'मोदी से क्या उम्मीद करें मुसलमान'
बीबीसी
Updated Mon, 06 Jun 2016 07:00 PM IST
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एहसान जाफरी परिवार संग
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साल 2002 के गुजरात दंगों में अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसाइटी में दंगाइयों के हाथों मारे गए पूर्व कांग्रेसी सांसद एहसान जाफरी की बेटी नसरीन जाफरी का कहना है कि भारत में अल्पसंख्यक बहुत मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब गुजरात जल रहा था तो नरेंद्र मोदी और उनके अफसर लोगों को सुरक्षा नहीं दे सके, तो अब उनसे क्या उम्मीद कर सकते हैं? पेश है इस बातचीत के अंश:
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हमारी बात सुनी गई। कुछ देर से ही सही, लेकिन हमें सुना गया। 14 साल लंबा इंतजार था, मेरी मां के लिए और हम सभी के लिए। हम आगे भी लड़ाई जारी रखेंगे। इस फैसले में छोटे-मोटे लोगों को जेल भेजा गया है, लेकिन जिन लोगों ने इस नरसंहार को अंजाम दिया वो अब भी बाहर हैं। बल्कि उनकी तरक्की हुई है और उन्हें बड़े ओहदों पर तैनात किया गया है। जिस समय घटना हुई मैं वहाँ नहीं थी, लेकिन मैं हालात से अच्छी तरह वाकिफ हूं। मेरे पिता शहर की जानी-मानी हस्ती थे।
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ये शहर उनके परिवार की तरह था और वह तब से वहाँ रह रहे थे, जब वो 18 साल के थे। घटना भी दिनदहाड़े हुई थी। भीड़ इकट्ठा हो रही थी, उन्होंने हर किसी को इसकी जानकारी दी। हर किसी को पता था कि वो पुलिस से लेकर केंद्र और राज्य सरकार तक से मदद की गुहार लगा रहे थे।
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मैं कह सकती हूँ कि जो भी उनके आस-पास थे, उन्होंने मेरे पिता से हर किसी को फोन करने को कहा, इसमें राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल थे। मेरा घर अहमदाबाद में ऐसी जगह है जो काफी सुरक्षित कहा जा सकता है। यहा से 2-3 किलोमीटर की दूरी पर सैन्य परिसर है और 2 मील दूर सिविल अस्पताल है। वो किसी गांव में नहीं रह रहे थे। सुबह के 10 बजे थे। भीड़ इकट्ठा हो रही थी, हर कोई हालात जानता था। भीड़ महिलाओं को खींच रही थी, महिलाओं का बलात्कार कर रहे थे, वो बच्चों को मार रहे थे, उन्हें जला रहे थे।
अदालत के फैसले से पूरा संतुष्ट तो नहीं हुआ जा सकता
गुजरात दंगे
हर कोई इस फैसले का इंतजार कर रहा था। विधवाओं की पूरी कॉलोनी, अनाथ बच्चे, वे लोग जिन्होंने दंगों में अपने भाइयों, बहनों को गंवाया था, उन सभी को इस फैसले का बेसब्री से इंतजार था।
अदालत के इस फैसले से पूरी संतुष्ट तो नहीं हुआ जा सकता, लेकिन ये कुछ संतोष देने वाला जरूर है। सबसे ज्यादा संतोष की बात ये है कि देश का एक हिस्सा हमारे साथ है। कई लोगों ने यहाँ तक पहुंचने के लिए बहुत मेहनत की है। चाहे वो गैर सरकारी संगठन हों, राजनीतिक पार्टियां हो या किसी हद तक न्यायपालिका भी। यहाँ तक पहुँचना कतई आसान नहीं था। ये मेरे भाई के लिए आसान नहीं था, जिन्होंने देश छोड़ने से इनकार कर दिया था।
ये मेरी मां और हमारे बच्चों के लिए आसान नहीं था। मैं यहाँ ये बात बताना चाहूँगी कि भीड़ में अधिकांश लोग बाहर से आए थे, वे ट्रकों में भरकर आए थे। उनके पास मोबाइल फोन, वोटर लिस्ट, हथियार थे। वे पूरी तैयारी से वहाँ आए थे। 14 साल में गुजरात में बहुत कुछ बदल गया है। अब हालात ऊपर से सामान्य लगते हैं, लेकिन दिल बंटे हुए हैं। लोगों के बीच फासला बढ़ गया है। रही बात प्रधानमंत्री मोदी की, तो मुसलमान भला उनसे क्या उम्मीद कर सकते हैं। जब गुजरात जल रहा था तो नरेंद्र मोदी ही राज्य के मुख्यमंत्री थे और उनके अफ़सर लोगों को सुरक्षा नहीं मुहैया करा सके।
अगर वो उस समय लोगों को सुरक्षा नहीं दे पाए तो अब मुसलमान उनसे भला क्या उम्मीद करें। भारत में अल्पसंख्यकों के लिए ये बहुत मुश्किल दौर है। पूरे अहमदाबाद में आपको हिंदू बहुसंख्यक इलाकों में एक भी मुसलमान परिवार नहीं मिलेगा। शहर पूरी तरह हिंदू-मुसलमान में बंट गया है और इस खाई को पाटने की कोई कोशिश नहीं हुई है। यहाँ तक कि मौजूदा सरकार के साथ काम कर रहे मुसलमान राजनेता भी मुस्लिम बहुल इलाकों में ही रहते हैं। उन्हें भी डर है। हालाँकि पहली बार नहीं हुआ था कि मेरे पिता का घर जलाया गया था। 1969 में भी हमारा घर जलाया गया था। इसी जगह से मेरे माँ-बाप अपना सारा सामना छोड़ कर भागे थे। हम शरणार्थी शिविरों में रहे थे। मैं चार साल की उम्र में शरणार्थी शिविर में रही। लेकिन मेरे पिता फिर लौटकर उसी जगह आए, क्योंकि उन्हें लोकतंत्र में यकीन था।
अदालत के इस फैसले से पूरी संतुष्ट तो नहीं हुआ जा सकता, लेकिन ये कुछ संतोष देने वाला जरूर है। सबसे ज्यादा संतोष की बात ये है कि देश का एक हिस्सा हमारे साथ है। कई लोगों ने यहाँ तक पहुंचने के लिए बहुत मेहनत की है। चाहे वो गैर सरकारी संगठन हों, राजनीतिक पार्टियां हो या किसी हद तक न्यायपालिका भी। यहाँ तक पहुँचना कतई आसान नहीं था। ये मेरे भाई के लिए आसान नहीं था, जिन्होंने देश छोड़ने से इनकार कर दिया था।
ये मेरी मां और हमारे बच्चों के लिए आसान नहीं था। मैं यहाँ ये बात बताना चाहूँगी कि भीड़ में अधिकांश लोग बाहर से आए थे, वे ट्रकों में भरकर आए थे। उनके पास मोबाइल फोन, वोटर लिस्ट, हथियार थे। वे पूरी तैयारी से वहाँ आए थे। 14 साल में गुजरात में बहुत कुछ बदल गया है। अब हालात ऊपर से सामान्य लगते हैं, लेकिन दिल बंटे हुए हैं। लोगों के बीच फासला बढ़ गया है। रही बात प्रधानमंत्री मोदी की, तो मुसलमान भला उनसे क्या उम्मीद कर सकते हैं। जब गुजरात जल रहा था तो नरेंद्र मोदी ही राज्य के मुख्यमंत्री थे और उनके अफ़सर लोगों को सुरक्षा नहीं मुहैया करा सके।
अगर वो उस समय लोगों को सुरक्षा नहीं दे पाए तो अब मुसलमान उनसे भला क्या उम्मीद करें। भारत में अल्पसंख्यकों के लिए ये बहुत मुश्किल दौर है। पूरे अहमदाबाद में आपको हिंदू बहुसंख्यक इलाकों में एक भी मुसलमान परिवार नहीं मिलेगा। शहर पूरी तरह हिंदू-मुसलमान में बंट गया है और इस खाई को पाटने की कोई कोशिश नहीं हुई है। यहाँ तक कि मौजूदा सरकार के साथ काम कर रहे मुसलमान राजनेता भी मुस्लिम बहुल इलाकों में ही रहते हैं। उन्हें भी डर है। हालाँकि पहली बार नहीं हुआ था कि मेरे पिता का घर जलाया गया था। 1969 में भी हमारा घर जलाया गया था। इसी जगह से मेरे माँ-बाप अपना सारा सामना छोड़ कर भागे थे। हम शरणार्थी शिविरों में रहे थे। मैं चार साल की उम्र में शरणार्थी शिविर में रही। लेकिन मेरे पिता फिर लौटकर उसी जगह आए, क्योंकि उन्हें लोकतंत्र में यकीन था।