United Progressive Alliance: ‘यूपीए क्या है? यह अब नहीं है, ममता बनर्जी का यह बयान कितना सच है?
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विस्तार
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी ने बुधवार को एनसीपी नेता शरद पवार से मिलने के बाद कहा कांग्रेस नेतृत्व वाला यूपीए (यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस) गठबंधन अब कहां है। यह खत्म हो चुका है। उससे पहले ममता बनर्जी ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी का नाम लिए बिना उन पर तंज कसते हुए कहा ‘कुछ ऐसी पार्टियां और लोग हैं जो कुछ नहीं करते हैं। आधा समय तो वो विदेश में गुजारते हैं’। हालांकि कांग्रेस उनके इस बयान पर हमलावर हो गई है और कहा है कि कांग्रेस के बिना भाजपा का मुकाबला नहीं किया जा सकता। अधीर रंजन चौधरी से लेकर दिग्विजय सिंह तक तमाम नेताओं ने ममता बनर्जी पर निशाना साधा।
यूपीए को लेकर दिया ममता बनर्जी का यह बयान इसलिए अहम है क्योंकि ममता बनर्जी खुद को विपक्ष के नेता के तौर पेश कर रही हैं और दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों को इसके लिए लामबंद कर रही हैं। ममता की मुंबई यात्रा और शिवसेना और एनसीपी नेताओं से उनकी मुलाकात इसी रणनीति का एक हिस्सा है। राजनीति के जानकार यह कहते हैं कि ममता अपनी सियासी पटकथा इस तरह लिख रही हैं कि वे कांग्रेस को पूरी तरह किनारा करके कांग्रेस का विकल्प बनना चाहती हैं। वे बार-बार इस बात पर जोर दे रही हैं कि कांग्रेस भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में नहीं है इसलिए क्षेत्रीय ताकतों के लिए वे ही एक विकल्प हैं।
यूपीए कांग्रेस के नेतृत्व में कई क्षेत्रीय पार्टियों का एक गठबंधन है, जो 2004 के लोकसभा चुनावों में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए की हार के बाद अस्तित्व में आया। इस चुनाव में कांग्रेस 145 सीटों के साथ भाजपा से केवल सात सीटों पर आगे थी। भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए धर्मनिरपेक्ष पार्टियां एक हुईं और स्वाभाविक रूप से सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण कांग्रेस इसका नेतृत्व करने लगी।
कम्युनिस्ट नेता हरकिशन सिंह सुरजीत, जो सीपीएम के तत्कालीन महासचिव थे उन्होंने यूपीए के गठन में प्रमुख भूमिका निभाई। इस गठबंधन में करीब 14 पार्टियां चुनाव बाद के गठबंधन में शामिल हुईं जिसमें राजद, डीएमके, एनसीपी, पीएमके, टीआरएस, झामुमो, लोजपा, एमडीएमके, एआईएमआईएम, पीडीपी और आईयूएमएल रहीं। दूसरी तरफ सीपीएम, सीपीआई, आरएसपी और फॉरवर्ड ब्लॉक ने एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम (सीएमपी) के तहत बाहर से इस गठबंधन को समर्थन दिया। सुरजीत इस गठबंधन का हिस्सा बनाने केलिए अजीत सिंह और अमर सिंह दोनों को अपने साथ ले आए। सोनिया गांधी आधिकारिक तौर पर यूपीए अध्यक्ष बनीं।
22 मई 2004 को मनमोहन सिंह ने यूपीए सरकार के प्रधान मंत्री के रूप में शपथ ली। वहीं एनसीपी प्रमुख पवार, राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद, लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान, झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन, टीआरएस प्रमुख के चंद्रशेखर राव, द्रमुक के टीआर बालू, दयानिधि मारन और ए राजा और पीएमके के अंबुमणि रामदास भी मनमोहन सिंह के मंत्रिमंडल में शामिल हुए।
लेकिन गठबंधन के दो साल चलने वाले के ही यूपीए को पहला झटका लगा। तत्कालीन श्रम मंत्री के सी आर और उनकी पार्टी के सहयोगी ए नरेंद्र ने तेलंगाना राज्य की मांग पर सरकार छोड़ दी। गठबंधन को सबसे बड़ा झटका 2008 में लगा, जब भारत-अमेरिका परमाणु समझौते पर आगे बढ़ने की सरकार के रुख के कारण वाम दलों ने सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। इससे सरकार अल्पमत में आ गई, लेकिन अविश्वास प्रस्ताव के दौरान मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी ने अपना समर्थन देकर मनमोहन सिंह को इस्तीफा देने से बचा लिया।
यूपीए का दूसरा दौर
2009 में यूपीए सत्ता में लौटी और कांग्रेस को आश्चर्यजनक रूप से 206 सीटें मिलीं। हालांकि पार्टी पांच साल पहले की तुलना में अभी अधिक आरामदायक स्थिति में थी लेकिन सरकार चलाने के लिए कांग्रेस को अभी भी सहयोगियों की जरूरत थी। कांग्रेस का साथ देने आई टीएमसी, एनसीपी, नेशनल कांफ्रेंस, डीएमके, और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग। यूपीए-1 की तुलना में सहयोगी दलों की संख्या कम हो गई थी। केवल पांच दलों ने कांग्रेस के साथ शपथ ली। मई में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी औपचारिक रूप से यूपीए अध्यक्ष चुनी गईं। डीएमके प्रमुख एम. करुणानिधि ने सोनिया गांधी के नाम का प्रस्ताव रखा और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने इसका समर्थन किया।
ममता बनर्जी ने रेलवे विभाग संभाला। यूपीए को इस बार वाम दलों का समर्थन नहीं मिला। दूसरी तरफ इस गठबंधन से पासवान और लालू भी अलग रहे। दरअसल बिहार में चुनाव के लिए गठबंधन करते समय दोनों नेताओं ने कांग्रेस को नजरअंदाज कर दिया था इसलिए कांग्रेस ने राजद को सरकार का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित नहीं किया था। हालांकि, राजद ने सरकार को समर्थन दिया, और ऐसा ही सपा और बसपा ने भी किया। लेकिन 2010 में राज्य सभा में महिला आरक्षण विधेयक पेश होने के विरोध में लालू ने समर्थन वापस ले लिया।
यूपीए के दूसरे सबसे बड़े घटक डीएमके ने मार्च 2012 में तमिलों के कथित मानवाधिकारों के उल्लंघन पर श्रीलंका के खिलाफ प्रस्तावित संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव में अपनी चिंताओं को शामिल नहीं किए जाने पर अपने पांच मंत्रियों को बाहर कर दिया। इसी तरह सितंबर में, तृणमूल कांग्रेस ने मल्टी-ब्रांड रिटेल में एफडीआई के सरकार के फैसले के विरोध में अपने छह मंत्रियो के इस्तीफे करवा दिए।
2014 के चुनाव में कांग्रेस 44 पर सिमटी
पीएम नरेंद्र मोदी के चुनावी लहर के कारण 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस सबसे कम 44 सीटों पर सिमट गई। हालांकि इस समूह को अभी भी यूपीए के रूप में ही जाना जाता है और सोनिया गांधी विपक्ष के नेता के रूप में। लेकिन 2014 के बाद से यह गठबंधन बिखर गया। इसलिए तकनीकी रूप से, 2014 के बाद कोई यूपीए नहीं है। इसलिए बनर्जी का यह कहना सही है कि यूपीए नहीं है।
राजद के एक नेता का कहना है कि यूपीए का गठन तो सत्ता में भागीदारी के लिए अलग-अलग पार्टियों के समझौते के तहत हुआ था। जब कांग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में ही नहीं है तो इस गठबंधन का मतलब ही कहां रह जाता है। 2024 में यदि नई स्थितियां बनती हैं तो हो सकता है यह गठबंधन फिर से जीवित हो उठे और इसका नेतृत्व कोई भी कर सकता है। लेकिन अभी तो ममता बनर्जी की बात सही लगती है कि यूपीए खत्म हो गया है, क्योंकि लंबे समय से यूपीए में शामिल पार्टियों की कोई बैठक नहीं हुई है। डीएमके, एनसीपी और झामुमो को छोड़कर, उनमें से अधिकांश के साथ कांग्रेस के संबंध अब तनावपूर्ण हैं। उसके बाद से कांग्रेस को लगातार असफलताओं का सामना करना पड़ रहा है और खुद ही नेतृत्व के सवाल से जूझ रही है तो यूपीए का नेतृत्व कैसा?
यूपीए की प्रासंगिकता कैसी
वहीं टीआरएस की एक नेता ने कहा ‘अभी यूपीए की प्रासंगिकता कहां है, हां 2024 से पहले यदि क्षेत्रीय पार्टियां एकजुट हो जाएं तो इसमें फिर जान आ सकती है। यूपीए का नेतृत्व अभी सोनिया गांधी कर रही हैं, इस पर कोई प्रश्न नहीं है।’
एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना है 2014 के बाद से मोदी लहर के कारण भारतीय राजनीति में कांग्रेस किनारे लगा दी गई। हालांकि 2018 में तीन राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में उसकी सरकार बनी, पंजाब में भी कांग्रेस की सरकार चल रही है लेकिन 2019 के चुनाव में पार्टी को महज 52 सीटों पर संतोष करना पड़ा। पिछले सात सालों में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी छोड़ दी है। राज्यों में हार का सामना करना पड़ रहा है। राष्ट्रीय और राज्य दोनों स्तरों पर आंतरिक असंतोष और नेतृत्व के सवाल का समाधान पार्टी अभी नहीं निकाल पाई है। विपक्ष में कई लोगों का मानना है कि कांग्रेस, विपक्ष की सही भूमिका नहीं निभा पा रही है, इसलिए ममता बनर्जी आगे बढ़कर यह जिम्मेदारी लेना चाहती हैं। कहा यह भी जाने लगा कि कांग्रेस के बहुत कमजोर स्थिति में होने के कारण, यूपीए अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी की शक्ति अब कम हो गई है।
हालांकि कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अगस्त में 19 विपक्षी दलों के साथ वर्चुअली बैठक की और कहा कि विपक्षी दलों को व्यक्तिगत मजबूरियों से ऊपर उठना चाहिए और 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को हराने के उद्देश्य से मिलकर काम करना चाहिए। हालांकि सियासी हलकों में यह भी चर्चा होती रही कि स्वास्थ्य कारणों से सोनिया गांधी यूपीए अध्यक्ष का पद छोड़ देंगी और शरद पवार यूपीए के अगले अध्यक्ष हो सकते हैं। कहा गया कि पवार इस पद के लिए संभावित सबसे योग्य व्यक्ति हैं क्योंकि सोनिया गांधी की जगह कोई ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो अनुभवी हो अन्य पार्टियों के साथ तालमेल बिठा सकें।
इसके पीछ तर्क यह दिया गया कि ममता बनर्जी की टीएमसी और एमके स्टालिन की डीएमके जैसे शक्तिशाली क्षेत्रीय पार्टियां राहुल गांधी जैसे युवा कांग्रेस नेताओं के साथ बातचीत के लिए सहमत नहीं होगी। लेकिन राजनीति के जानकार कहते हैं कि कहीं न कहीं भाजपा की वजह से विपक्ष में एक खालीपन आया है ममता बनर्जी उसे भरने की कोशिश कर रही हैं।