जानिए क्या है पेरिस समझौता, क्यों बदनाम हुए भारत और चीन?
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पिछले कुछ दिनों से कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए हुए पेरिस समझौते से अमेरिका के हाथ पीछे खींचने की खबर लगातार सुर्खियां बनी हुई हैं। हालांकि इस बात की आशंका पहले से ही जताई जा रही थी कि अपने अजीबोगरीब रुख के लिए चर्चित अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कुछ इसी तरह का निर्णय भी ले सकते हैं।
अमेरिका का पेरिस समझौते से हटना बड़ी घटना माना जा रहा है, उसकी प्रमुख वजह ये भी है कि अमेरिका खुद काफी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन करने वालादेश है और दूसरे, उसे समझौते के तहत अन्य देशों की वित्तीय मदद करनी थी। ऐसे में अब ट्रंप ने खुद को समझौते से अलग कर दोनों ही चीजों से पीछा छुड़ा लिया।
खास बात ये है कि ट्रंप ने अपनी इस हरकत का सारा दोष भारत और चीन जैसे देशों पर मढ़ दिया। ट्रंप के अनुसार कार्बन उत्सर्जन करने वाले भारत और चीन जैसे बड़े देशों की गलती का खामियाजा अमेरिका क्यों भुगते? बहरहाल, आपको बताते हैं कि क्या है पेरिस समझौता और भारत और चीन क्यों हुए बदनाम?
क्या है पेरिस समझौता
असल में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर साल 2015 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में एक क्लाइमेट समझौता हुआ था। जिसकी मंशा थी कि दुनिया में बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग पर काबू पाने के लिए एकसाथ आगे बढ़ा जाए। समझौते के शुरूआती चरण में ही 70 से ज्यादा देशों ने इस पर हस्ताक्षर कर दिए थे। इसके बाद बीते साल दिसंबर में पेरिस में जुटे 195 देशों ने सदी के अंत तक वैश्विक तापमान को दो डिग्री सेल्सियस कम रखने का लक्ष्य तय करते हुए समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।
जिसमें ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करने वाले बड़े देशों को इसमें कमी करने और छोटे देशों की आर्थिक मदद करने का प्रस्ताव तैयार हुआ था। उस समय अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, इटली और भारत-चीन समेत तमाम बड़े देशों ने इस पर सहमति जताते हुए संधि पर हस्ताक्षर किए थे। समझौते के तहत 2020 तक सभी सदस्य देश एक बार फिर इस मुद्दे पर अपनी बात रखेंगे और बताएंगे कि अपने अपने देशों में उन्होंने कार्बन उत्सर्जन में कितनी कमी की है।
समझौते में बताई खामियां
हालांकि इस समझौते को बहुत देरी से उठाया गया सीमित कदम बताया जा रहा है। उसकी बड़ी वजह ये है कि सदी के अंत तक मात्र दो डिग्री सेल्सियस तापमान कम रखने के लक्ष्य से जलवायु परिवर्तन पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। जानकारी के अनुसार इस साल सितम्बर तक ही कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर पूर्व औद्योगिक स्तर की तुलना में 30 प्रतिशत तक बढ़ चुका है। दूसरा इस समझौते में एक बड़ी कमी ये है कि किसी भी देश ने अभी तक न उन उपायों के बारे में बताया है जिससे वह कार्बन उत्सर्जन को कम करेगा और न ही कार्बन उत्सर्जन कम करने की असली लक्ष्य के बारे में जानकारी दी गई है।
क्या थी अमेरिका की भूमिका
दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और विकसित राष्ट्र होने के नाते पेरिस समझौते में अमेरिका की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण थी। अमेरिका पे जहां खुद भी 26 फीसदी तक कार्बन उत्सर्जन स्वेच्छा से कम करने की हामी भरी थी वहीं राष्ट्रपति बराक ओबामा के नेतृत्व में अमेरिका ने समझौते में शामिल गरीब देशों को 3 बिलियन डॉलर मदद करने का आश्वासन दिया था।
अमेरिका को दुनिया में सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाला देश माना जाता है ऐसे में ट्रंप के हाथ पीछे खींचने के बाद इस समझौते को झटका लगना तय है। हालांकि अमेरिका के समझौता तोड़ने के बाद भारत और चीन ने इस पर अमल का आश्वासन दिया है। वहीं फ्रांस, जर्मनी और इटली ने संयुक्त बयान जारी करते हुए कहा है कि वह पेरिस समझौते की अपनी प्रतिबद्धता पर कायम रहेंगे और खुद के साथ ही पूरी दुनिया के देशों को कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए प्रेरित करते रहेंगे।
भारत-चीन क्यों हुए बदनाम
भारत और चीन दोनों दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हैं। दोनों ही देशों में औद्योगिक उत्पादन पिछले कुछ समय में काफी तेजी से बढ़ा है। जिसकी वजह से माना जा रहा है कि दोनों देशों में कार्बन उत्सर्जन की मात्रा में भी काफी तेजी आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसी मुद्दे पर भारत और चीन पर निशाना साध रहे हैं।
ट्रंप का आरोप है कि सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन भारत और चीन करते हैं तो फिर इसके लिए अमेरिका बड़ी कीमत क्यों चुकाए? हालांकि ट्रंप के दावे से इतर एक हकीकत ये भी है कि भारत और चीन दोनों ही देशों ने पूरी प्रतिबद्धता के साथ 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में 30-35 फीसदी तक कमी लाने का लक्ष्य रखा है। भारत के साथ चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी इस समझौते के प्रति प्रतिबद्धतता जताते हुए कहा था कि चीन दुनिया के साथ मिलकर कार्बन उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य पर आगे बढ़ेगा। चीन के अनुसार जलवायु परिवर्तन से बचाव वैश्विक जिम्मेदारी है और चीन इसे पूरी ईमानदारी के साथ निभाएगा।