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PFI in India: दिल्ली से केरल तक जिस पीएफआई पर हत्या से हिंसा तक में शामिल होने का आरोप, जानें उसके बारे में सबकुछ

Fri, 27 May 2022 05:15 PM IST
जयदेव सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जयदेव सिंह Updated Fri, 27 May 2022 05:15 PM IST
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सार
23 और 24 मई को केरल के पुत्थनथानी में इस संगठन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी परिषद की बैठक हुई। इस बैठक में मुस्लिम मस्जिदों और पूजा स्थलों पर होने वाली कार्रवाइयों का विरोध करने का प्रस्ताव पास हुआ।
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What is PFI in India History of Popular Front of India News in Hindi
पीएफआई - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मंदिर-मस्जिद विवाद में अब पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) की एंट्री हो गई है। PFI ने एक खत जारी करके मुस्लिम पूजा स्थलों के खिलाफ होने वाली कार्रवाइयों विरोध करने को कहा है। ये संगठन अक्सर विवादों में रहता है। बीते दिनों करौली, खरगोन जैसे शहरों में हुए बवाल के दौरान भी इस संगठन का नाम सामने आया था। कर्नाटक के हिजाब विवाद से लेकर हलाल मीट विवाद तक ये संगठन सुर्खियों में रहा था। केरल में हो रही राजनीतिक हत्याओं में भी इस संगठन का नाम आता रहा है।

अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर ये पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया क्या है? अपनी अपील में इसने क्या-क्या कहा है? क्या इसका चुनावी राजनीति से भी कोई रिश्ता है? इस संगठन का अस्तिव देश में कितना है? क्या इसका प्रतिबंधित संगठन सिमी से भी कोई कनेक्शन है? आइये जानते हैं…

पहले जानिए, अपनी अपील में पीएफआई ने क्या कहा?
23 और 24 मई को केरल के पुत्थनथानी में इस संगठन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी परिषद की बैठक हुई। इस बैठक में मुस्लिम मस्जिदों और पूजा स्थलों पर होने वाली कार्रवाइयों का विरोध करने का प्रस्ताव पास हुआ। बैठक में कहा गया कि ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा की शाही ईदगाह मस्जिद को लेकर लगाई गई याचिकाएं 1991 के पूजा स्थल कानून के खिलाफ हैं। बैठक में आरोप लगाया गया कि ये याचिकाएं संघ परिवार के संगठनों ने बद इरादे से लगाई हैं। यहां तक की सर्वोच्च न्यायालय के वजूखाने के इस्तेमाल पर रोक लगने के आदेश पर भी बैठक में सवाल उठाए गए। पीएफआई की ओर से जारी प्रेस नोट में कहा गया है कि ये सब कभी न खत्म होने वाली सांप्रदायिक दुश्मनी और अविश्वास का कारण बनेगा। 

पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया क्या है?
पॉपुलर फ्रट ऑफ इंडिया यानी पीएफआई का गठन 17 फरवरी 2007 को हुआ था। ये संगठन दक्षिण भारत ने तीन मुस्लिम संगठनों का विलय करके बना था। इनमें केरल का नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट, कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी और तमिलनाडु का मनिथा नीति पसराई शामिल थे। पीएफआई का दावा है कि इस वक्त देश के 23 राज्यों यह संगठन सक्रिय है। देश में स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट यानी सिमी पर बैन लगने के बाद पीएफआई का विस्तार तेजी से हुआ है। कर्नाटक, केरल जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों में इस संगठन की काफी पकड़ बताई जाती है। इसकी कई शाखाएं भी हैं। इसमें महिलाओं के लिए- नेशनल वीमेंस फ्रंट और विद्यार्थियों के लिए कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया जैसे संगठन शामिल हैं।  यहां तक कि राजनीतिक पार्टियां चुनाव के वक्त एक दूसरे पर मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन पाने के लिए पीएफआई की मदद लेने का भी आरोप लगाती हैं। गठन के बाद से ही पीएफआई पर समाज विरोधी और देश विरोधी गतिविधियां करने के आरोप लगते रहते हैं।  
PFI को फंड कैसे मिलता है?
पिछले साल फरवरी में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने PFI और इसकी स्टूडेंट विंग कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (CFI) के पांच सदस्यों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में चार्जशीट दायर की थी। ED की जांच में पता चला था कि PFI के राष्ट्रीय महासचिव  के ए रऊफ गल्फ देशों में बिजनेस डील की आड़ में पीएफआई के लिए फंड इकट्ठा करता था। ये पैसे अलग-अलग जरिए से पीएफआई और CFI से जुड़े लोगों तक पहुंचाए गए।  

जांच एजेंसी के मुताबिक लगभग 1.36 करोड़ रुपये की आपराधिक तरीकों से प्राप्त की गई। इसका एक हिस्सा भारत में पीएफआई और सीएफआई की अवैध गतिविधियों के संचालन में खर्च किया गया। सीएए के खिलाफ होने प्रदर्शन, दिल्ली में 2020 में हुए दंगों में भी इस पैसे के इस्तेमाल की बात सामने आई थी।  पीएफआई द्वारा 2013 के बाद पैसे ट्रांसफर और कैश डिपॉजिट करने की गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। जांच एजेंसी का कहना है कि भारत में पीएफआई तक हवाला के जरिए पैसा आता है।   

क्या पीएफआई ने कभी चुनावी राजनीति में हिस्सा लिया है?
पीएफआई खुद को सामाजिक संगठन कहता है। इस संगठन ने कभी चुनाव नहीं लड़ा है। यहां तक कि इस संगठन के सदस्यों का रिकॉर्ड भी नहीं रखा जाता है। इस वजह से किसी अपराध में इस संगठन का नाम आता है, तो भी कानूनी एजेंसियों के लिए इस संगठन पर नकेल कसना मुश्किल होता है। 21 जून 2009 को सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के नाम से एक राजनीतिक संगठन बना। इस संगठन को पीएफआई से जुड़ा बताया गया है। कहा गया कि एसडीपीआई के लिए जमीन पर जो कार्यकर्ताओं काम करते थे वो पीएफआई से जुड़े लोग ही थे। 13 अप्रैल 2010 को चुनाव आयोग ने इसे रजिस्टर्ड पार्टी का दर्जा दिया। 

राजनीति में कितनी सफल रही एसडीपीआई?
कर्नाटक के मुस्लिम बहुल इलाकों में ये एसडीपीआई सक्रिय रही। खास तौर पर दक्षिण तटीय कन्नड़ और उडुपी में इस पार्टी का प्रभाव देखा गया। इन इलाकों में इस संगठन ने स्थानीय निकाय चुनावों में सफलता भी हासिल की ।  2013 तक एसडीपीआई ने कर्नाटक में कुछ स्थानीय निकाय के चुनाव लड़े। इनमें उसे करीब 21 सीटों पर जीत मिली। 2018 में उसे 121 स्थानीय निकाय की सीटों पर जीत मिली। 2021 में उसने उडुपी जिले के तीन स्थानीय निकायों पर कब्जा जमाया। 

क्या एसडीपीआई केवल स्थानीय निकाय चुनाव ही लड़ती है?
नहीं, ऐसा नहीं है। 2013 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में पहली बार इस पार्टी ने अपने उम्मीदवार उतारे। कुल 23 सीटों पर पार्टी ने अपने उम्मीदवार उतारे। नरसिंहराज विधानसभा सीट पर एसडीपीआई उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहा था। बाकी सभी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। 2018 के विधानसभा चुनाव में एडीपीआई ने केवल तीन सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। इस बार भी नरसिंहराज सीट को छोड़कर बाकी दोनों उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। 

लोकसभा चुनावों की बात करें तो 2014 के लोकसभा चुनाव में एसडीपीआई ने कर्नाटक, केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश की कुल 28 लोकसभा सीटों अपने उम्मीदवार उतारे। सबसे ज्यादा केरल की सभी 20 सीटों पर पीएफआई उम्मीदवार उतरे। वहीं, पश्चिम बंगाल की चार, तमिलनाडु की दो, कर्नाटक की दक्षिण कन्नड़ और मध्य प्रदेश की भोपाल सीट पर भी इस पार्टी ने चुनाव लड़ा। सभी सीटों पर इसके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में एसडीपीआई ने 14 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। इनमें केरल की दस और एक-एक सीट तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक की थी। सभी सीटों पर उसके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। 

क्या पीएफआई और सिमी में कोई संबंध है?
अक्सर पीएफआई को सिमी का ही बदला हुआ रूप कहा जाता है। दरअसल 1977 से देश में सक्रिय सिमी पर 2006 में प्रतिबंध लगा गया था। सिमी पर प्रतिबंध लगने के चंद महीनों बाद ही पीएफआई अस्तित्व में आया। कहा जाता है कि इस संगठन की कार्यप्रणाली भी सिमी जैसी ही है। 2012 से ही अलग-अलग मौकों पर इस संगठन पर कई तरह के आरोप लगते रहे हैं। कई बार इसे बैन करने की भी मांग हो चुकी है।    

कांग्रेस पर क्यों लगता है पीएफआई का समर्थन करने का आरोप?
2013 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस सत्ता में आई। सत्ता में आने के बाद मुख्यमंत्री सिद्धारमैया सरकार ने एसडीपीआई और पीएफआई सदस्यों पर चल रहे केस वापस ले लिए थे। इन लोगों पर भाजपा सरकार के दौरान सांप्रदायिक उन्माद फैलाने के मामले दर्ज हुए थे। कांग्रेस सरकार ने करीब 1600 पीएफआई सदस्यों पर चले 176 मामले वापस लिए थे।   

2007 में इस संगठन के गठन के बाद से अब तक इसके कार्यकर्ताओं पर 300 से ज्यादा मामले अकेले कर्नाटक में दर्ज हो चुके हैं। कर्नाटक में भाजपा अक्सर अपने कार्यकर्ताओं पर होने वाले हमलों में इस संगठन का हाथ होने का दावा करती है। वहीं, केरल में भी आरएसएस और पीएफआई कार्यकर्ताओं के बीच जानलेवा संघर्ष देखा जाता है।  पडक्कल जिले में पिछले हफ्ते ही पीएफआई के कार्यकर्ता की हत्या हुई। 24 घंटे के अंदर ही एक संघ कार्यकर्ता को मार दिया गया। दोनों हत्याओं को एक दूसरे से जोड़कर देखा जा रहा है।

कर्नाटक कांग्रेस के नेता रहे रोशन बेग भाजपा के समर्थन में आने के बाद कांग्रेस पर पीएफआई की मदद लेने का आरोप लगा चुके हैं। हालांकि, रोशन बेग जब कांग्रेस में थे तब भाजपा के नेता उन पर पीएफआई से संबंध रखने का आरोप लगाते थे।

 

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