{"_id":"6acf32bdfc25eff7ab02c5e8","slug":"what-is-peace-bond-and-why-cjp-leaders-were-sent-to-jail-after-jantar-mantar-protest-2026-10-14","type":"story","status":"publish","title_hn":"50 हजार का मुचलका, फिर भी न्यायिक हिरासत: क्या है पीस बॉन्ड, जिसके उल्लंघन में फंसे सीजेपी के नेता?","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
50 हजार का मुचलका, फिर भी न्यायिक हिरासत: क्या है पीस बॉन्ड, जिसके उल्लंघन में फंसे सीजेपी के नेता?
Wed, 14 Oct 2026 01:14 PM IST
राकेश कुमार
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Wed, 14 Oct 2026 01:14 PM IST
सार
पीस बॉन्ड क्या होता है और इसे भरने की जरूरत क्यों पड़ती है? क्या पीस बॉन्ड भरने के बाद विरोध-प्रदर्शन करने पर रोक लग जाती है? जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान ऐसा क्या हुआ कि सीजेपी के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका पर बॉन्ड की शर्तें तोड़ने का आरोप लगा? आखिर पीस बॉन्ड का उल्लंघन करने पर कानून क्या कहता है और दोनों नेताओं को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में क्यों भेजा गया? जानिए शांति बनाए रखने के लिए भरे जाने वाले मुचलके से जुड़े कानून के बारे में...
विज्ञापन
सीजेपी नेताओं को जेल
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका की मुश्किलें बढ़ गई हैं। 13 अक्तूबर को प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने दोनों को हिरासत में लिया था। इसके बाद स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की अदालत ने उन्हें पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। पुलिस की कार्रवाई के पीछे पहले भरे गए पीस बॉन्ड की शर्तों के उल्लंघन का आरोप भी है। ऐसे में सवाल है कि आखिर यह पीस बॉन्ड यानी शांति बनाए रखने का मुचलका क्या है और इसके मामले में कानून क्या कहता है?
पहले जानिए, सीजेपी नेताओं के मामले में क्या हुआ
इस मामले की शुरुआत 10 अक्तूबर को हुए विरोध-प्रदर्शन से हुई। इस दौरान सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को हिरासत में लिया गया था। अगले दिन तीनों को रिहा कर दिया गया। खबर के मुताबिक, रिहाई के समय उनसे 50 हजार रुपये का बॉन्ड भरवाया गया था। इसकी शर्तों में एक साल तक शांति भंग करने वाली गतिविधियों से दूर रहने की बात शामिल थी।
विज्ञापन
इसके बाद 12 अक्तूबर को जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के निर्धारित स्थलों की सूची से हटा दिया गया। अगले दिन सौरव दास, आशुतोष रांका और सीजेपी के कार्यकर्ता अजिंक्य शिंदे बैरिकेड पार करके जंतर-मंतर के प्रतिबंधित क्षेत्र में पहुंच गए। वहां उन्होंने तिरंगा लहराया। पुलिस ने तीनों को हिरासत में ले लिया। सौरव दास और आशुतोष रांका पर पहले भरे गए बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करने का भी आरोप लगा। इसके बाद दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
कानून में कहां से आया पीस बॉन्ड का प्रावधान?
पीस बॉन्ड (शांति बनाए रखने का मुचलका) से जुड़ा प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 126 में दिया गया है। इस धारा के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति से शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने को कह सकता है, जिससे सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका हो। इसके लिए मजिस्ट्रेट के पास कार्रवाई करने का पर्याप्त आधार होना जरूरी है।
ऐसी स्थिति में संबंधित व्यक्ति को नोटिस दिया जाता है। उससे पूछा जाता है कि उसे एक निश्चित अवधि तक शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने का आदेश क्यों न दिया जाए। इस बॉन्ड की अवधि अधिकतम एक साल हो सकती है।
बॉन्ड भरने का मतलब क्या?
पीस बॉन्ड भरने का मतलब यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति अपने सभी अधिकार खो देता है या उसे हर तरह के विरोध-प्रदर्शन से रोक दिया जाता है। इसमें लागू होने वाली शर्तों को देखना जरूरी है। किसी प्रदर्शन पर रोक है या नहीं, यह उस जगह से जुड़े आदेशों और लागू कानून पर भी निर्भर करता है। इसी तरह, बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन हुआ या नहीं, यह उसके वास्तविक दस्तावेज और संबंधित परिस्थितियों के आधार पर तय किया जाना चाहिए।
शर्तों का उल्लंघन होने पर क्या कार्रवाई होती है?
अगर किसी व्यक्ति पर बॉन्ड की शर्तें तोड़ने का आरोप लगता है, तो संबंधित अधिकारी कानून के मुताबिक कार्रवाई कर सकते हैं। लेकिन केवल आरोप लगने से जेल जाना अपने आप तय नहीं हो जाता। हिरासत या न्यायिक हिरासत के लिए कानूनी आधार और निर्धारित प्रक्रिया का पालन जरूरी है। इसके अलावा, अगर किसी व्यक्ति पर बिना अनुमति प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करने जैसे किसी अलग उल्लंघन का आरोप है, तो उस पहलू पर भी अलग से कार्रवाई हो सकती है।
सीजेपी ने बॉन्ड को लेकर क्या दावा किया था?
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, अभिजीत दिपके ने 11 अक्तूबर को रिहा होने के बाद कहा था कि उन्होंने ऐसा कोई बॉन्ड नहीं भरा, जिसमें दोबारा प्रदर्शन नहीं करने की शर्त शामिल हो। इस दावे और प्रशासन की कार्रवाई के बीच वास्तविक स्थिति समझने के लिए बॉन्ड की लिखित शर्तें और मजिस्ट्रेट का आदेश महत्वपूर्ण हैं। इनके बिना यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि किस शर्त का उल्लंघन हुआ और इसी आधार पर हिरासत का आदेश दिया गया।
विज्ञापन
पहले जानिए, सीजेपी नेताओं के मामले में क्या हुआ
इस मामले की शुरुआत 10 अक्तूबर को हुए विरोध-प्रदर्शन से हुई। इस दौरान सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को हिरासत में लिया गया था। अगले दिन तीनों को रिहा कर दिया गया। खबर के मुताबिक, रिहाई के समय उनसे 50 हजार रुपये का बॉन्ड भरवाया गया था। इसकी शर्तों में एक साल तक शांति भंग करने वाली गतिविधियों से दूर रहने की बात शामिल थी।
विज्ञापन
विज्ञापन
इसके बाद 12 अक्तूबर को जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के निर्धारित स्थलों की सूची से हटा दिया गया। अगले दिन सौरव दास, आशुतोष रांका और सीजेपी के कार्यकर्ता अजिंक्य शिंदे बैरिकेड पार करके जंतर-मंतर के प्रतिबंधित क्षेत्र में पहुंच गए। वहां उन्होंने तिरंगा लहराया। पुलिस ने तीनों को हिरासत में ले लिया। सौरव दास और आशुतोष रांका पर पहले भरे गए बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन करने का भी आरोप लगा। इसके बाद दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
कानून में कहां से आया पीस बॉन्ड का प्रावधान?
पीस बॉन्ड (शांति बनाए रखने का मुचलका) से जुड़ा प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 126 में दिया गया है। इस धारा के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति से शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने को कह सकता है, जिससे सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका हो। इसके लिए मजिस्ट्रेट के पास कार्रवाई करने का पर्याप्त आधार होना जरूरी है।
ऐसी स्थिति में संबंधित व्यक्ति को नोटिस दिया जाता है। उससे पूछा जाता है कि उसे एक निश्चित अवधि तक शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने का आदेश क्यों न दिया जाए। इस बॉन्ड की अवधि अधिकतम एक साल हो सकती है।
बॉन्ड भरने का मतलब क्या?
पीस बॉन्ड भरने का मतलब यह नहीं है कि संबंधित व्यक्ति अपने सभी अधिकार खो देता है या उसे हर तरह के विरोध-प्रदर्शन से रोक दिया जाता है। इसमें लागू होने वाली शर्तों को देखना जरूरी है। किसी प्रदर्शन पर रोक है या नहीं, यह उस जगह से जुड़े आदेशों और लागू कानून पर भी निर्भर करता है। इसी तरह, बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन हुआ या नहीं, यह उसके वास्तविक दस्तावेज और संबंधित परिस्थितियों के आधार पर तय किया जाना चाहिए।
शर्तों का उल्लंघन होने पर क्या कार्रवाई होती है?
अगर किसी व्यक्ति पर बॉन्ड की शर्तें तोड़ने का आरोप लगता है, तो संबंधित अधिकारी कानून के मुताबिक कार्रवाई कर सकते हैं। लेकिन केवल आरोप लगने से जेल जाना अपने आप तय नहीं हो जाता। हिरासत या न्यायिक हिरासत के लिए कानूनी आधार और निर्धारित प्रक्रिया का पालन जरूरी है। इसके अलावा, अगर किसी व्यक्ति पर बिना अनुमति प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करने जैसे किसी अलग उल्लंघन का आरोप है, तो उस पहलू पर भी अलग से कार्रवाई हो सकती है।
सीजेपी ने बॉन्ड को लेकर क्या दावा किया था?
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, अभिजीत दिपके ने 11 अक्तूबर को रिहा होने के बाद कहा था कि उन्होंने ऐसा कोई बॉन्ड नहीं भरा, जिसमें दोबारा प्रदर्शन नहीं करने की शर्त शामिल हो। इस दावे और प्रशासन की कार्रवाई के बीच वास्तविक स्थिति समझने के लिए बॉन्ड की लिखित शर्तें और मजिस्ट्रेट का आदेश महत्वपूर्ण हैं। इनके बिना यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि किस शर्त का उल्लंघन हुआ और इसी आधार पर हिरासत का आदेश दिया गया।