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जानिए कैसे चलाया जाता है भारत में जजों के खिलाफ 'महाभियोग'

Wed, 28 Mar 2018 11:34 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 28 Mar 2018 11:34 AM IST
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what is impeachment against judges and how its executed in parliament of India
भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ संसद में महाभियोग चलाए जाने के प्रस्ताव की तैयारी पूरी कर ली गई है। सीजेआई पर सुप्रीम कोर्ट के ही चार वरिष्ठ जजों ने उनकी कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लगाए थे। जिसके बाद से ही कांग्रेस सहित कई राजनीतिक पार्टियां मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग चलाए जाने पर आम सहमति बना रही थीं। बता दें कि माकपा सहित कुछ क्षेत्रीय दलों द्वारा तैयार प्रस्ताव से संबंधित मसौदे पर कांग्रेस,वामपंथी पार्टियों, टीएमसी और एनसीपी के सांसदों ने हस्ताक्षर कर दिए हैं। अब सीजेआई के खिलाफ संसद में महाभियोग चलाया जाएगा। 
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अब यह जानना अहम हो जाता है कि महाभियोग होता क्या है? और यह कैसे पारित किया जाता है।

मुख्य न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के किसी भी जज को हटाने का अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति के पास होता है, जो संसद की अनुशंसा पर अपने अधिकारों का उपयोग करते हुए उन्हें पद से हटा सकते हैं।  
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भारतीय संविधान में न्यायधीशों पर महाभियोग का चलाए जाने की जानकारी अनुच्छेद 124(4) में मिलती है। इसके तहत सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के किसी न्यायाधीश पर साबित कदाचार या अक्षमता के लिए महाभियोग का प्रस्ताव लाया जा सकता है। 
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मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है। अभियोग प्रस्ताव लाने के लिए लोकसभा में 100 और राज्य सभा के 50 सांसदों की रजामंदी जरूरी होती है। और अगर सदन में राजनीतिक पार्टियों में अभियोग के लिए पर्याप्त समर्थन है तो लोकसभा में स्पीकर और राज्यसभा में उपराष्ट्रपति प्रस्ताव को स्वीकार कर सकते हैं।

कमिटी न्यायाधीश पर लगाए गए आरोपों की जांच करती है

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संसद भवन
अगर दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है तो आरोपों की जांच करने के लिए एक तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जाता है।  इस कमिटी में सुप्रीम कोर्ट का एक जज, हाई कोर्ट का एक न्यायाधीश और एक कोई भी न्यायाधिकारी वो जज भी हो सकता है, वकील भी या फिर स्कॉलर हो सकता है, जिन्हें स्पीकर या उपराष्ट्रपति नामित करते हैं। 

कमिटी न्यायाधीश पर लगाए गए आरोपों की जांच करती है और जांच के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार करती है। उस रिपोर्ट को स्पीकर और उपराष्ट्रपति के पास जमा कराया जाता है उसके बाद  सदन के सदस्यों के साथ उस पर विचार किया जाता है। 

जब यह प्रस्ताव एक सदन में पास हो जाता है उसके बाद इसे दूसरे सदन में पास कराया जाता है, फिर फाइल राष्ट्रपति के पास जाती है। इसमें सदन राष्ट्रपति से जज को हटाने की अनुशंसा करते हैं। इस सारी प्रक्रिया में सदन में  वोटिंग भी कराई जाती है। जैसा की पहले ही बताया गया है कि अभियोग चलाए जाने के लिए दोनों सदनों के सांसदों की एक संख्या नीयत होती है ठीक वैसे ही दोनों सदन के दो-तिहाई सांसदों द्वारा पास किया जाना जरूरी है और हर सदन में सांसदों की तादाद 50 प्रतिशत होनी चाहिए। 

अगर दोनों सदन में सांसद एकमत होने में  कामयाब हो जाते हैं तो राष्ट्रपति के आदेश से जज को हटाया जा सकता है। ऐसी ही महाभियोग की प्रक्रिया हाई कोर्ट के जजों के लिए भी अपनाई जाती है।

महाभियोग संवैधानिक प्रक्रिया की शुरुआत ब्रिटेन से हुई थी। वहां 14वीं सदी में महाभियोग का प्रावधान किया गया था। बाद में 1776 में वर्जीनिया और 1780 में मैसाचुसेट्स ने भी अपने संविधान में इसे जगह दी। ब्रिटेन में महाभियोग की प्रक्रिया भारत जैसी ही है।

वहां भी न्यायाधीशों पर महाभियोग का प्रस्ताव हाउस ऑफ कॉमन्स से शुरू होता है और इस बारे में फैसला, हाउस ऑफ लार्ड्स में लॉर्ड चांसलर की अध्यक्षता में किया जाता है। अमेरिका ही एकमात्र ऐसा देश है जहां हर स्तर के न्यायधीशों  को पदच्युत करने के लिए महाभियोग का सहारा लेना पड़ता है।
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