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क्या है डब्ल्यूएचओ का काम, अमेरिका के फंडिंग रोकने पर क्या पड़ेगा असर?
Sat, 18 Apr 2020 01:09 PM IST
Tanuja Yadav
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Tanuja Yadav
Updated Sat, 18 Apr 2020 01:09 PM IST
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विश्व स्वास्थ्य संगठन
- फोटो : social media
कोरोना के कहर के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डब्ल्यूएचओ को देने वाली फंडिंग पर रोक लगाने का एलान किया है। अमेरिका ने दो से तीन महीने के लिए फंडिंग देने पर रोक लगा दी है। अमेरिका ने 2019 में विश्व स्वास्थ्य संगठन में 400 मिलियन डॉलर की फंडिंग की थी जो कि पूरे बजट का 15 फीसद है लेकिन अमेरिका ने फंडिंग क्यों रोकी और ये फैसला लेने के बाद दुनिया के दूसरे देशों पर क्या असर पड़ेगा, आइए समझते हैं...
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डब्ल्यूएचओ का गठन क्यों हुआ?
1948 में डब्ल्यूएचओ का गठन संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक स्वास्थ्य संगठन के तौर पर हुआ था। डब्ल्यूएचओ के गठन का मुख्य लक्ष्य वैश्विक स्वास्थ्य को बढ़ावा देना था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद डब्ल्यूएचओ जैसे संगठन बनाने पर जोर दिया गया था। अतिसंवेदनशील या कमजोर देशों को संक्रमित बीमारियों के फैलने से बचाना डब्ल्यूएचओ क काम है। हैजा, पीला बुखार और प्लेग जैसी बीमारियों के खिलाफ लड़ने के लिए डब्ल्यूएचओ ने अहम भूमिका निभाई है।
डब्ल्यूएचओ मौजूदा समय में एक कार्यक्रम चला रहा है जिसके तहत दुनियाभर के अरबों लोगों को अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं देना है और स्वास्थ्य इमरजेंसी के लिए लोगों की उचित मदद करनी है।
ट्रंप के बयान के बाद डब्ल्यूएचओ पर असर?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने डब्ल्यूएचओ को योगदान राशि ना देने का एलान किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने आरोप लगाया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोरोना वायरस को महामारी घोषित करने में देरी की और चीन को केंद्र में रखा।
अमेरिका डब्ल्यूएचओ में कुल बजट का 10-15 फीसद योगदान करता है। डब्लूएचओ ने कोरोना वायरस से लड़ने के लिए अमेरिका से एक बिलियन डॉलर की अतिरिक्त सहायता की अपील की थी। राष्ट्रपति ट्रंप और उनके समर्थकों ने संगठन पर आरोप लगाया कि इंसान से इंसान में संक्रमण पर डब्ल्यूएचओ ने बहुत देर में प्रतिक्रिया दी थी और चीन की पारदर्शिता पर भी सवाल नहीं खड़े किए थे।
जनवरी की शुरुआत में डब्ल्यूएचओ ने व्यक्तिगत संक्रमण के फैलने की बात कही। जब ट्रंप ने चीन से आने वाली उड़ानों पर आंशिक रोक लगाने का एलान किया उससे ठीक एक दिन पहले डब्ल्युएचओ ने दुनिया के लिए कोरोना वायरस को इमरजेंसी घोषित किया।
2014-15 में इबोला और कोरोना पर काबू पाने में डब्ल्युएचओ के प्रदर्शन की तुलना?
2014-15 में जब इबोला ने दुनिया में अपना कहर बरपाना शुरू किया था, उस समय डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक मार्गरेट चान थे। इबोला के समय चान को दुनिया में हर तरफ से आलोचना का शिकार होना पड़ा था। चान ने इबोला के फैलने पर देर से प्रतिक्रिय दी थी। इबोला गिनी के एक छोटे से जंगल से शुरू हुआ था जहां सिएरा लियोन और लाइबेरिया की सीमा लगती है लेकिन छह महीने में ही इबोला देखते ही देखते घने शहरों में फैल गया।
डब्ल्यूएचओ की देर से दी गई प्रतिक्रिया की दुनिया में काफी आलोचना हुई। अमेरिका के कुछ एक्सपर्ट ने डब्ल्यूएचओ को भंग कर नया संगठन बनाने को कहा लेकिन तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने इसका समर्थन नहीं किया।
बाद में चान ने जानकारी दी कि डब्ल्यूएचओ को मिलने वाली फंडिंग पर्याप्त नहीं थी और सरकारों ने अपने योगदान में कोई बढ़ोतरी नहीं की थी। हालांकि कई स्वास्थ्य जानकार मानते हैं कि डॉ टेड्रोस के नेतृत्व में डब्ल्यूएचओ ने कोरोना वायरस से लड़ने के लिए बेहतर काम किया है।
अमेरिका के एलान के बाद क्या असर पड़ेगा?
अमेरिका का 60-90 दिनों के लिए फंडिंग रोक देने का फैसला छोटा भले ही है लेकिन कम नहीं है। ट्रंप के एलान से पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन कम फंड वाले कार्यक्रमों में संभावित राशि निकालने पर विचार कर रहा था। इससे कोरोना वायरस से संबंधित चल रहे प्रयासों पर प्रभाव पड़ सकता है जैसे कि कोरोना के लिए वैक्सीन बनाना।
एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर देवी श्रीधर ने ट्रंप के फैसले को परेशानी का सबब बताया है। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में डब्ल्यूएचओ को ज्यादा से ज्यादा फंडिंग देने की जरूरत है। डब्ल्यूएचओ इस फंडिंग से ही जरूरतमंद देशों को कोरोना से लड़ने के लिए जरूरी सामान मुहैया कराएगा।
ट्रंप की तरफ से डब्ल्यूएचओ पर लगाए गए आरोपों को चीन के प्रति अमेरिका के एजेंडे के तौर पर भी देखा जा रहा है। चीन जैसे देश जहां बोलने की आजादी, पारदर्शिता, मानवाधिकार की कमी है, डब्ल्यूएचओ संतुलन बैठाने का काम कर रहा है। डब्ल्यूएचओ की ओर से दिए गए आंकड़ों से कोरोना के संक्रमण को रोकने में काफी मदद मिली है।