West Bengal: पूर्व ममता सरकार में नौकरियों के रेट, ग्रुप-सी जॉब 15 से 16 लाख में तो ग्रुप-D का पद ₹10-12 लाख
भले ही उम्मीदवार अयोग्य ही क्यों न हो, लेकिन उसने पैसा दिया है तो उसे सरकारी नौकरी अवश्य मिलेगी। ग्रुप-सी की नौकरी के लिए 15 से 16 लाख रुपये तो वहीं ग्रुप-डी का पद लेने वालों को 10-12 लाख रुपये देने पड़ते थे। प्रवर्तन निदेशालय ने एसएससी ग्रुप-सी और ग्रुप-डी स्टाफ भर्ती घोटाले के सिलसिले में आरोपी पार्थ चटर्जी, अर्पिता मुखर्जी, कुंतल घोष और अन्य के खिलाफ विशेष अदालत (पीएमएलए), कोलकाता में पहली सप्लीमेंट्री प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट (अभियोजन शिकायत) दायर की है।
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पश्चिम बंगाल की पूर्व ममता बनर्जी सरकार में अयोग्य उम्मीदवारों को जमकर नौकरियां दी गई। यहां तक कि सरकारी नौकरियों के रेट तय किए गए थे। भले ही उम्मीदवार अयोग्य ही क्यों न हो, लेकिन उसने पैसा दिया है तो उसे सरकारी नौकरी अवश्य मिलेगी। ग्रुप-सी की नौकरी के लिए 15 से 16 लाख रुपये तो वहीं ग्रुप-डी का पद लेने वालों को 10-12 लाख रुपये देने पड़ते थे। प्रवर्तन निदेशालय ने एसएससी ग्रुप-सी और ग्रुप-डी स्टाफ भर्ती घोटाले के सिलसिले में पूर्व मंत्री पार्थ चटर्जी, अर्पिता मुखर्जी, कुंतल घोष और अन्य के खिलाफ विशेष अदालत (पीएमएलए), कोलकाता में पहली सप्लीमेंट्री प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट (अभियोजन शिकायत) दायर की है।
समय-सीमा खत्म होने के बाद अवैध नियुक्तियां
ईडी ने पश्चिम बंगाल सेंट्रल स्कूल सर्विस कमीशन (डब्लूबीसीएसएससी) के जरिए ग्रुप-सी और ग्रुप-डी स्टाफ की भर्ती में बड़े पैमाने पर हुई अनियमितताओं से जुड़ी सीबीआई, एसीबी, कोलकाता द्वारा दर्ज एफआईआर के आधार पर इस मामले की जांच शुरू की थी। इसमें शामिल अपराध, भारतीय दंड संहिता और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के प्रावधानों के तहत आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार से संबंधित हैं। जांच से पता चला है कि भर्ती घोटाला ओएमआर स्कोर में हेरफेर, रैंक जंपिंग, जाली और पिछली तारीख के रिकमेंडेशन लेटर जारी करने, पैनल की समय-सीमा खत्म होने के बाद अवैध नियुक्तियां करने और तय भर्ती प्रक्रियाओं को दरकिनार करके अयोग्य उम्मीदवारों की नियुक्ति करने के जरिए किया गया था।
शिक्षा विभाग के मंत्री ने किया पद का गलत इस्तेमाल
जांच में यह भी पता चला है कि शिक्षा विभाग के तत्कालीन प्रभारी मंत्री पार्थ चटर्जी का डब्लूसीएसएससी और उससे जुड़ी संस्थाओं पर पूरा नियंत्रण था। उन्होंने गैर-कानूनी भर्तियों को बढ़ावा देने और उनमें मदद करने के लिए अपने पद का गलत इस्तेमाल किया। उनके निर्देशों पर अयोग्य उम्मीदवारों की लिस्ट तैयार की गई। सिफारिश व नियुक्ति पत्र जारी करने के लिए बिचौलियों (जिनमें प्रसन्न कुमार रॉय और उनके साथी शामिल थे) के जरिए प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। जांच में यह भी पता चला है कि गैर-कानूनी नियुक्तियों को आसान बनाने के लिए ओएमआर आधारित परीक्षा के नतीजों में हेरफेर की गई। इतना ही नहीं, रैंक जंपिंग (रैंक में हेरफेर) भी सामने आई।
प्रसन्न कुमार रॉय था मुख्य बिचौलिया
जांच में यह भी पता चला है कि बिचौलियों और एजेंटों के एक नेटवर्क ने पक्की नौकरी का वादा करके उम्मीदवारों से गैर-कानूनी तरीके से पैसे वसूले। अलग-अलग पदों के लिए उम्मीदवारों से लगभग 10 लाख रुपये से 20 लाख रुपये तक की मांग की गई। प्रसन्न कुमार रॉय मुख्य बिचौलिए के तौर पर काम करते थे। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर अपराध से हुई कमाई को इकट्ठा करने और उसे आगे भेजने का काम किया।
अपराध की आय 630.40 करोड़ रुपये
जांच में ग्रुप-सी और ग्रुप-डी भर्ती घोटाले में अपराध से हुई कमाई का आंकड़ा कम से कम 630.40 करोड़ रुपये बताया गया है। यह आंकड़ा गैर-कानूनी नियुक्तियों की संख्या और उम्मीदवारों से वसूले गए पैसों के आधार पर तय किया गया है। अपराध से हुई असल कमाई इससे ज़्यादा हो सकती है, क्योंकि इस घोटाले में गैर-कानूनी भर्ती के दूसरे तरीके भी शामिल थे। इनमें रैंक जंपिंग, पैनल से बाहर की नियुक्तियां, पैनल की समय-सीमा खत्म होने के बाद नियुक्तियां और आरटीआई/री-इवैल्यूएशन (पुनर्मूल्यांकन) सिस्टम के जरिए हेरफेर, आदि तरकीब शामिल हैं।
मुखौटा कंपनियों के जरिए छिपाई अपराध की आय
गैर-कानूनी भर्ती से हुई अवैध कमाई को सहयोगियों, प्रॉक्सी और शेल/डमी कंपनियों के नेटवर्क के जरिए छिपाया गया। आरोपियों ने अपराध की कमाई को साफ-सुथरी संपत्ति के तौर पर दिखाने का हर संभव प्रयास किया। प्राइमरी टीचर भर्ती घोटाले से जुड़े एक मामले में अर्पिता मुखर्जी के ठिकानों पर तलाशी के दौरान, लगभग 49.80 करोड़ रुपये नकद और लगभग 5.08 करोड़ रुपये कीमत का सोना और गहने जब्त किए गए। जांच से पता चला कि अर्पिता मुखर्जी अवैध फंड की कस्टोडियन (रखवाली करने वाली) के तौर पर काम करती थीं। उन्हें कई शेल और डमी कंपनियों में डायरेक्टर/शेयरहोल्डर बनाया गया था, जिनका इस्तेमाल अवैध कमाई को रखने और उसे इधर-उधर घुमाने (लेयरिंग) के लिए किया जाता था।
702 करोड़ रुपये से ज्यादा की संपत्ति अटैच
इसके अलावा, भर्ती घोटाले से मिले फंड का इस्तेमाल करके आरोपी व्यक्तियों और उनके सहयोगियों से जुड़ी कंपनियों के ज़रिए कई अचल संपत्तियां खरीदी गईं। ईडी ने अब तक एसएससी ग्रुप-सी और ग्रुप-डी भर्ती घोटाले में लगभग 247.35 करोड़ रुपये की संपत्ति अटैच की है।अब तक एसएससी और प्राइमरी टीचर से जुड़े भर्ती घोटाले के मामलों में 702 करोड़ रुपये से ज़्यादा की अवैध कमाई (प्रोसीड्स ऑफ क्राइम) अटैच की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने 03.04.2025 को दिए अपने फैसले में कहा कि पश्चिम बंगाल सेंट्रल स्कूल सर्विस कमीशन द्वारा की गई भर्ती प्रक्रिया धोखाधड़ी से दूषित थी। इसी आधार पर सर्वोच्च अदालत ने 25000 से ज़्यादा टीचरों और कर्मचारियों की नियुक्तियां रद्द कर दीं। फैसले में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का भी ज़िक्र किया गया, जिसमें ओएमआर स्कोर में हेरफेर, रैंक जंपिंग और गैर-कानूनी नियुक्तियां शामिल थीं।