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West Election Elections: तृणमूल के सामने गढ़ बचाने की चुनौती, सत्ता के करीब पहुंचने के लिए जोर लगा रही भाजपा

Sat, 28 Mar 2026 08:21 AM IST
N Arjun एन अर्जुन
Updated Sat, 28 Mar 2026 08:21 AM IST
सार

पश्चिम बंगाल में चुनाव का पूरा नैरेटिव अब रक्षा बनाम विस्तार की सीधी जंग में बदल चुका है।राजनीतिक विशेषज्ञ भी मानते हैं कि 2026 का चुनाव बंगाल की राजनीति के लिए निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। एक तरफ तृणमूल अपना मजबूत जनादेश बचाने की कोशिश में है, तो दूसरी ओर भाजपा सत्ता में आने के प्रयास में जुटी है।

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West Bengal Elections: TMC faces challenge of defending its stronghold, BJP is making efforts to get power
शुभेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी - फोटो : ANI

विस्तार

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मुकाबला स्पष्ट रूप से दो ध्रुवों में सिमटता दिख रहा है। तृणमूल कांग्रेस इस बार गढ़ बचाने की चुनौती से जूझ रही है, जबकि मुख्य विपक्ष भाजपा सत्ता के करीब पहुंचने की रणनीति पर जुटी है। चुनाव का पूरा नैरेटिव अब रक्षा बनाम विस्तार की सीधी जंग में बदल चुका है। यह सीधी जंग ही बंगाल के चुनाव को हाल के वर्षों का सबसे अहम और संभावित रूप से ऐतिहासिक बना रहा है। वर्ष 2021 के चुनाव में मुकाबला द्विध्रुवीय नहीं दिख रहा था, लेकिन नतीजों ने साफ कर दिया था कि मुकाबला इन्हीं दो दलों के बीच था।
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कांग्रेस और वामदल कहीं टिक नहीं सके थे। राजनीतिक विशेषज्ञ भी मानते हैं कि 2026 का चुनाव बंगाल की राजनीति के लिए निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। एक तरफ तृणमूल अपना मजबूत जनादेश बचाने की कोशिश में है, तो दूसरी ओर भाजपा और बेहतर प्रदर्शन कर ममता का तिलिस्म तोड़कर सत्ता के करीब पहुंचने की सबसे बड़ी कोशिश कर रही है। चुनाव तय करेगा कि बंगाल क्षेत्रीय प्रभुत्व के मॉडल को बरकरार रखता है या राष्ट्रीय विस्तार की राजनीति को स्वीकार करता है। यह चुनाव सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि राजनीतिक संतुलन बदलने की संभावनाओं का चुनाव बन गया है।
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वोट स्विंग से बदल सकता है चुनाव
पिछले चुनाव में तृणमूल को 48 और भाजपा को 38% वोट मिले थे। 2016 और 2021 में 40 से ज्यादा सीटों पर जीत का अंतर 5 हजार वोट से कम रहा। 2 से 5% वोट स्विंग भी कई सीटों पर नतीजे पलट सकता है।

क्यों अलग है 2026 का मुकाबला?
बंगाल की राजनीति में लंबे समय तक बहुकोणीय मुकाबले की परंपरा रही। पहले वाम दलों का वर्चस्व, फिर तृणमूल का उभार, लेकिन 2026 में पहली बार तस्वीर स्पष्ट रूप से द्विध्रुवीय दिख रही है।
  • 2011 के बाद पहली बार सत्ताधारी दल को इतने मजबूत प्रतिद्वंद्वी का सामना करना पड़ रहा है।
  • 2021 में भाजपा का वोट शेयर करीब 38% तक पहुंचा, जो उसे वास्तविक चुनौतीकर्ता बनाता है।
  • सत्ता परिवर्तन की चर्चा अब सिर्फ संभावना नहीं, बल्कि चुनावी विमर्श का हिस्सा बन चुकी है।

तृणमूल: पिछले चुनाव से कहीं बड़ी चुनौती
  • तृणमूल ने 2021 में 213 सीटों के साथ भारी बहुमत हासिल किया था, लेकिन 2026 में चुनौती कहीं ज्यादा जटिल है।
  • सत्ता-विरोधी लहर: 15 साल के शासन के बाद स्थानीय असंतोष
  • भ्रष्टाचार के आरोप: शिक्षक भर्ती, नगर निकाय जैसे मुद्दों ने छवि पर असर डाला। इसके चलते तृणमूल ने 74 विधायकों का टिकट भी काटा।
  • ताकत: महिला और अल्पसंख्यक वोट पर पकड़, बूथ स्तर तक संगठित कैडर।
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भाजपा: मजबूत मौजूदगी से सत्ता की ओर बढ़ते कदम
भाजपा के लिए यह चुनाव विस्तार का निर्णायक मौका है। 2021 में 77 सीटों और लगभग 38% वोट शेयर के साथ पार्टी ने बंगाल में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई थी।
रणनीतिक ताकत:  राष्ट्रीय मुद्दों के साथ लोकल असंतोष को जोड़ना, केंद्रीय नेतृत्व की आक्रामक चुनावी मौजूदगी, संगठन का बूथ स्तर तक विस्तार, भ्रष्टाचार बनाम विकास का नैरेटिव और तेज हो सकता है।

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