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Hindi News ›   India News ›   Water Crisis: Know from the water-man Rajendra Singh, what is wrong

हर घर में नल तो ठीक, मगर नल में जल भी हो: जल-पुरुष से जानिये, क्या सही क्या गलत

Sat, 06 Jul 2019 04:37 PM IST
गौरव द्विवेदी जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: गौरव द्विवेदी Updated Sat, 06 Jul 2019 04:37 PM IST
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Water Crisis: Know from the water-man Rajendra Singh, what is wrong
जल संकट (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : सोशल मीडिया

मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुके जल-पुरुष राजेंद्र सिंह का मानना है कि मोदी सरकार ने 2024 तक हर घर में जल पहुंचाने की जो योजना बनाई है, वह ठीक है, मगर इससे जल संरक्षण नहीं होगा। मौजूदा परिस्थितियों में सबसे ज्यादा जरूरी है 'जल सुरक्षा कानून' बनाना। इसके बिना जल संरक्षण संभव नहीं है। यह कानून लागू होने के बाद सरकार 'जल' को 'जन' से जोड़ने के लिए आंदोलन शुरू करे। विकास की भेंट चढ़ चुके जलस्रोतों को दोबारा से जीवित करना होगा। सरकार यह सब कर सकती है तो ही हर घर में नल और नल में जल, योजना संभव होगी। अन्यथा हर घर में नल तो होगा, मगर उसमें जल नहीं होगा।

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शनिवार को अमर उजाला डॉट कॉम के साथ एक विशेष बातचीत में जल-पुरुष ने कहा, हम मोदी सरकार की जल योजनाओं पर कोई सवाल नहीं उठा रहे हैं। सरकार पानी बचाने की राह पर आगे बढ़ रही है, अच्छी बात है। बता दें कि वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट में साल 2024 तक हर घर जल योजना को लागू करने की घोषणा की है। इसे ध्यान में रखते हुए जलशक्ति मंत्रालय का गठन किया गया है। साल 2024 तक 256 जिलों में जल प्रबंधन में सुधार करने की बात भी कही गई है। इस योजना के तहत फिलहाल 1500 ऐसे ब्लॉक की पहचान की गई है, जहां इस्तेमाल किए जा चुके पानी को खेतों में सिंचाई के लिए पहुंचाया जाएगा।
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जल-पुरुष का कहना है, सरकार हर घर में नल लगाने के लिए जितनी आतुर दिखाई दे रही है, अगर उसी इच्छाशक्ति से जल संरक्षण के लिए भी कुछ करे तो बात समझ आती है। गंगा की सफाई या जल शक्ति अभियान जागरुकता के लिए ठीक हो सकते हैं, लेकिन इनसे जल संरक्षण की कोई बात होगी, ऐसा मुझे नहीं लगता। हम भू-जल के दोहन की सारी सीमाएं लांघ चुके हैं। अब तो पानी इतनी तेजी से नीचे जा रहा है कि सरकार और जनता आज भी संभलने का प्रयास करे तो कुछ अच्छे परिणाम आने में कई दशक लग जाएंगे।
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जल-पुरुष की सलाह: जल सुरक्षा कानून है वक्त की मांग...

राजेंद्र सिंह कहते हैं, पहले लोगों की पानी संबंधी जरूरतें नदियों व तालाबों से पूरी हो जाती थी। अब ये स्त्रोत प्रदूषित हो गए हैं या खत्म हो चुके हैं। ऐसे में भू-जल पर निर्भरता लोगों की पहली जरूरत बन गई है। सरकार को जल संरक्षण के लिए कानून बनाकर उसे लागू करना होगा। तभी लोगों में यह संदेश जाएगा कि वाकई सरकार जल संरक्षण पर कुछ करना चाहती है। अगर यह होगा तो फिर मान कर चलें कि हर घर में नल योजना मात्र नल कंपनियों को फायदा पहुंचाने की ही एक योजना कही जाएगी। सरकार के पास समय और संसाधन दोनों हैं, ऐसे में कानून बनाना कोई मुश्किल काम नहीं है। देश में जितनी भी वाटर बॉडी यानी पानी के स्त्रोत हैं, उन्हें चिन्हित कर दोबारा से जीवित करना होगा। नए मैप बनाए जाएं, तालाब या नदियां जो कब्जों का शिकार हो गई हैं, उन्हें मुक्त कराकर पहले जैसे प्राकृतिक रुप में लाना होगा। जब तक कानून नहीं बनेगा, तब तक जल से जन भी नहीं जुड़ेगा। सरकार को जल्द से जल्द एक कानून बनाकर लोगों को यह विश्वास दिलाना चाहिए कि वह दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ जल संरक्ष्ण की राह पर आगे बढ़ना चाह रही है।

डे-जीरो के कगार पर पहुंच चुके हैं ये शहर... 

डे-जीरो यानी भू-जल खत्म होने की स्थिति वाले शहरों में दिल्ली, फरीदाबाद, गुरुग्राम, कानपुर, जयपुर, हैदराबाद, अमरावती, धनबाद, जमशेदपुर, मेरठ, आसनसोल, विशाखापत्तनम, चेन्नई, मदुरै, कोच्चि, बंगलुरु, कोयंबटूर, शिमला, सोलापुर, मुंबई और विजयवाड़ा शामिल हैं।

देश में भू-जल की स्थिति, एक रिपोर्ट...

-1951 में 14180 लीटर प्रतिदिन, प्रतिव्यक्ति भू-जल की उपलब्धता थी
-1991 में 6030 लीटर  
-2001 में 5120 लीटर
-2020 में 3670 लीटर
-2050 में 3120 लीटर रह जाएगी

इंडियन इन्स्टिट्यूट ऑफ ह्यूमन सेटलमेंट के मुताबिक, देश में औसतन 135 लीटर पानी प्रतिदिन प्रति व्यक्ति देने की बात कही जाती है, लेकिन यह औसत 69 लीटर पर ही अटक जाती है। भारत में करीब 54 फीसदी हिस्सा ऐसा है, जहां भू-जल तेजी से नीचे जा रहा है।

-वर्ल्ड रीसॉर्स इन्स्टिट्यूट की रिपोर्ट बताती है कि 2030 में पानी की मांग 1.5 ट्रिल्यन क्यूबिक मीटर होगी, जबकि मौजूदा सप्लाई 740 ट्रिल्यन क्यूबिक मीटर है।
-2030 तक 40 प्रतिशत लोगों को पीने का पानी नहीं मिलेगा
-2050 तक यही स्थिति रही जीडीपी का छह फीसदी केवल पानी पर खर्च होगा 

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