उत्तर प्रदेश में पहले चरण के मतदान से साफ होगी लोकसभा चुनाव 2019 की तस्वीर
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नोएडा, गाजियाबाद और बागपत में भाजपा का बड़ा चेहरा मैदान में है। तीनों जगह से केंद्रीय मंत्री डॉ. महेश शर्मा, पूर्व सेनाध्यक्ष और विदेश राज्यमंत्री जनरल वीके सिंह और मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री और पूर्व आईपीएस अफसर सत्यपाल सिंह मैदान में हैं। तीनों को कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। मुजफ्फरनगर से संजीव बालियान भी कड़ी मेहनत कर रहे हैं। वहीं सपा-बसपा गठबंधन और कांग्रेस की पूरी प्रतिष्ठा दांव पर लग गई है। सपा-बसपा जहां साझे के मजबूत वोट बैंक के भरोसे लड़ रहे हैं, वही कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने भी काफी समय दिया है। प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आठ सीटों पर फतह के लिए पूरी ताकत झोंक दी है।
सत्ता पक्ष के लिए लोहे के चने चबाने जैसा
2014 के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम की लहर चल रही थी। सभी सीटों पर भाजपा का कब्जा था। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के वोट का हर लोकसभा सीट पर ब्रैकेट करीब तीन लाख वोट का था। यही वजह थी कि जो भी भाजपा से खड़ा हुआ, चुनाव जीत गया। भाजपा की 71 और इसके सहयोगी दल अपना दल की दो सीटें आईं। कांग्रेस को अमेठी, रायबरेली पर और सपा को पांच सीटों पर सफलता मिली। वहीं बसपा का खाता ही नहीं खुला।
संघ के एक प्रचारक का मानना है कि इस बार यह ब्रैकेट घटा है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की टीम के एक सदस्य के मुताबिक सत्ता पक्ष के दुष्प्रचार से थोड़ी सी सत्ता विरोधी लहर पैदा हुई है। वहीं उत्तर प्रदेश के एक कैबिनेट मंत्री का कहना है कि नतीजा आने दीजिए। भाजपा का एक से डेढ़ प्रतिशत वोट बढ़ा है। उत्तर प्रदेश के नतीजे चौकाने वाले होंगे।
हालांकि सूत्र का कहना है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा का मुकाबला सपा-बसपा गठबंधन से है। कांग्रेस के पाले में कुछ नहीं है। भाजपा अमेठी की भी सीट जीत रही है। यह पूछने पर चुनाव में 2014 के मुकाबले क्या स्थिति है तो सूत्र का कहना है कि पिछले चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी के दम पर 73 सीटें जीते थे। इस बार का चुनाव प्रधानमंत्री, भाजपा अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और कार्यकर्ताओं की कड़ी मेहनत के बल पर जीतेंगे।
चुनाव का मैट्रिक्स क्यों बदला?
चुनाव विश्लेषण में लगे सूत्रों का मानना है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में चार दल (भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस) प्रमुखता से मैदान में थे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोकदल चुनाव मैदान में था। उत्तर प्रदेश में सपा की सरकार थी और मुजफ्फरनगर से शुरू हुए दो संप्रदायों के दंगे ने पूरा समीकरण बदल दिया था। इस बार के चुनाव में वह मैट्रिक्स नहीं दिखाई दे रहा है। जाट और गुर्जर अपनी खेती से जुड़ी अर्थव्यवस्था की तरफ लौट रहे हैं।
यही वजह है कि राष्ट्रीय लोक दल मुजफ्फरनगर और बागपत सीट में खुद को लड़ने की स्थिति में पा रहा है। चौधरी अजीत सिंह को जाट नेता का फिर से सम्मान मिलने की उम्मीद दिखाई दे रही है। सपा-बसपा-रालोद साथ हैं और कांग्रेस अलग चुनाव लड़ रही है। इससे चुनाव का सामाजिक समीकरण बदल रहा है।
कहां किसकी प्रतिष्ठा दांव पर
चौधरी अजीत सिंह के लिए जाटलैंड नाक का सवाल बन गया है। बागपत में बेटे जयंत और मुजफ्फरनगर में खुद अजीत के लिए भी। मेरठ से सांसद रहे राजेन्द्र अग्रवाल के लिए भी अहम है। काफी कड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं। यही स्थिति गाजियाबाद में जनरल वीके सिंह के लिए है। गठबंधन के सुरेश बंसल से कड़ी चुनौती मिल रही है। कांग्रेस की डॉली शर्मा भी उनकी राह में रोड़ा हैं। नोएडा में डॉ. महेश शर्मा के लिए भी नोएडा के ग्रामीण क्षेत्र में चुनौती खड़ी हो रही है।
सहारनपुर में कांग्रेस के इमरान मसूद पिछले चुनाव में बहुत कम वोट से हारे थे। इस बार गठबंधन ने वहां से फजलुर्रहमान बर्क को प्रत्याशी बनाया है। दो अल्पसंख्यक चेहरा होने के बाद भी भाजपा प्रत्याशी राघव लखनपाल को कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। यही स्थिति कैराना से है। उपचुनाव में हारी भाजपा फूंक-फूंककर कदम रख रही है।
मतदान का क्या होगा असर?
मतदान को लेकर जहां चुनाव आयोग ने कमर कस रखी है, वहीं भाजपा, सपा-बसपा-रालोद और कांग्रेस के रणनीतिकारों का जोर हर बूथ पर होने वाले मतदान से रुझान को भांपने पर टिका है। सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि वोटों का ध्रुवीकरण होगा या नहीं। भाजपा ने चुनाव को राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रवाद का रंग दिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अली,अली के जवाब में बजरंग बली का नारा दे डाला। प्रधानमंत्री मोदी भी सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा के बहाने चुनाव को नई वेवलेंथ दे रहे हैं।
वहीं कांग्रेस, सपा-बसपा-रालोद इसे भाजपा की बांटने की राजनीति करार दे रहे हैं। मोदी सरकार के कामकाज पर सवाल खड़ा करके बेरोजगारी, नोटबंदी, जीएसटी के गलत प्रावधान, किसानों की समस्या को मुद्दा बना रहे हैं। माना जा रहा है कि पश्चिम के मतदाताओं का रंग देखकर राजनीतिक पार्टियां अपनी आगे की रणनीति में बदलाव पर ध्यान दे सकती हैं।