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खतना के खिलाफ मुखर हुई खिलाफत, भारत में क्यों नहीं रुकी यह परंपरा?

Mon, 30 Jul 2018 08:53 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 30 Jul 2018 08:53 PM IST
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voices raising against khatna all over the world

तमाम तरह के विरोध के बावजूद भारत समेत दुनिया के कई देशों में खतना प्रथा आज भी जारी है। हालांकि भारत सरकार और देश की सर्वोच्च अदालत इस प्रथा के खिलाफ है लेकिन फिर भी मुसलिम समाज में व्याप्त कुरीतियों और मान्यताओं के चलते इस पर रोक लगा पाना संभव नहीं हो पाया है।

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इसका सबसे बड़ा कारण मुसलिम समाज में व्याप्त कुरीतियां हैं। लेकिन अब इसी समाज से इस प्रथा की खिलाफत होने लगी है। वैसे खतना की खिलाफत भारत ही नहीं दुनिया के दूसरे देशों में भी तेजी से मुखर हो रही है।
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भारत में मुसलमानों के एक छोटे से समुदाय बोहरा में महिलाओं का खतना यानी उनके जननांग के बाहरी हिस्से क्लिटोरिस को रेज़र ब्लेड से काट देने का चलन मौजूद है। महिलाओं या बच्चियों का खतना धार्मिक कारणों से होता है और वो भी सुन्न किए बिना।
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वैसे मुसलिम समाज में इस प्रथा को बच्चियों के स्वास्थ्य से जोड़कर भी देखा और बताया जाता है लेकिन यह बात पूरी तरह से अतार्किक है। अंग्रेजी में इसे एफ़जीएम यानी फीमेल जेनाइटल म्यूटिलेशन कहते हैं। इस क्रूर परंपरा पर दुनिया के बहुत से देशों में प्रतिबंध है और भारत समेत कई देशों में खतना पर पाबंदी की मांग और बहस चल रही है। 

शुरुआत और हालात

लड़कियों का खतना करने की अमानवीय और बेहद तकलीफदेह प्रक्रिया की शुरुआत एक परंपरा के रूप में अफ्रीका से हुई और अब इसके निशान ब्रिटेन और फ्रांस जैसे यूरोपीय देशों में भी दिखाई देने लगे हैं।

खतना का एकमात्र उद्देश्य महिला की यौन इच्छा को ख़त्म करना है जबकि स्वच्छंद विचारों और निजता के अधिकारों के पैरोकारों का मानना है कि यह इसलिए भी किया जाता है ताकि महिलाओं के लिए सेक्स को कम आनंददायक बनाया जा सके।

वैसे खतना के बारे में भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका के अन्य मुसलिम समुदायों में कम ही सुनने को मिलता है। यहां सिर्फ़ दाऊदी बोहरा समुदाय में ये परंपरा पाई जाती है।

यमन के शिया मुसलमानों का एक हिस्सा रहे बोहरा 16वीं सदी में भारत आए थे। आज ये मुख्यतः गुजरात और महाराष्ट्र में रहते हैं। दस लाख से अधिक आबादी वाला यह समुदाय खासा समृद्ध है और दाऊदी बोहरा देश में सबसे पढ़े-लिखे समुदायों में से हैं।

छिपा कर रखा जाता है सब कुछ 

खतना बेहद ढंके-छिपे तौर पर होता है। इसे पूरी तरह से दुनिया से दूर रखा जाता है। इसके बारे में कोई बात-कोई बहस नहीं होती। इस प्रक्रिया को देखना भी वर्जित है।

इसके बारे में बस वो ही जानता है जो इस प्रक्रिया को करता है या फिर वो लड़की जो इस प्रक्रिया की पूरी यातना से गुजरती है। इसकी जानकारी केवल लड़की की मां और उस व्यक्ति को होती है, जो उस लड़की से शादी करता है।

आम तौर पर लड़की की मां ही उसे खतना कराने के लिए लेकर जाती है। लड़की का खतना कराया भी उस उम्र में जाता है जब वह अबोध होती है। यानी सेक्स इत्यादि के बारे में नहीं जानती।  

भारत में क्यों नहीं रुकी यह परंपरा?

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर से खतना पर सवाल उठाए हैं लेकिन पिछले दिनों शिखर अदालत ने एफजीएम पर रोक लगाने की मांग करने वाली एक याचिका पर संज्ञान लेते हुए महिला और बाल कल्याण मंत्रालय से जवाब मांगा था।

मंत्रालय ने अपने जवाब कहा था कि भारत में एनसीआआरबी (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) में एफ़जीएम से सम्बन्धित कोई आधिकारिक आंकड़ा है ही नहीं। इसलिए सरकार इस बारे में कोई फ़ैसला नहीं ले सकती।

लेकिन इन दिनों खतना को लेकर एक और चलन देखने को मिल रहा है। पढ़े-लिखे और हाई-प्रोफ़ाइल बोहरा परिवार अपनी बच्चियों का खतना कराने के लिए डॉक्टरों के यहां ले जाते हैं।

चूंकि खतना मेडिकल प्रैक्टिस है ही नहीं इसलिए डॉक्टरों को भी इस बारे में कुछ पता नहीं होता लेकिन फिर भी पैसों के लिए वो भी इसमें शामिल हो जाते हैं। ये सब बिल्कुल गुपचुप तरीके से होता है और कोई इस बारे में बात नहीं करता।  

दुनिया के हाल

अफ्रीकी महिलाओं में एक कहावत मशहूर है कि लड़की को जिंदगी में तीन मौकों पर भीषण तकलीफ से गुजरना पड़ता है। पहला, जब वो लड़की छोटी होती है और उसका खतना किया जाता है।

दूसरा, शादी के बाद सुहागरात और तीसरा मौका जब वो संतान को जन्म देती है। यहां ध्यान रखें कि हम उन महिलाओं की बात कर रहे हैं, खतना के बाद जिनकी योनि का प्रवेश द्वार सिलकर बंद कर दिया जाता है। बस एक छोटा सा रास्ता खुला रखा जाता है, जिससे मूत्रत्याग और मासिक धर्म का स्त्राव रिस कर बाहर आ सके।

जहां तक प्रतिरोध की बात है तो दुनिया के कई देशों के अलावा जर्मनी में मुस्लिम और ईसाई समुदाय इस फैसले का कड़ा विरोध कर रहे हैं और वे इस बारे में कानून के जानकारों से राय ले रहे हैं। दूसरी तरफ कई यूरोपीय मुस्लिम और यहूदी संगठनों ने साझा बयान जारी कर कहा है कि खतना उनकी धार्मिक श्रद्धाओं का आधार है और इसे कानूनी रूप से संरक्षण दिया जाना चाहिए।

इसराइल की संसद ने भी इस फैसले का विरोध किया है। उधर, विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि दुनिया भर में करीब 30 प्रतिशत पुरुषों का खतना हुआ है। कुछ समुदायों जैसे कि यहूदियों और मुसलमानों के लगभग सभी पुरुषों का खतना किया जाता है।

अमानवीय परंपरा और क्रूर मानसिकता

दरअसल, लड़कियों का खतना करने के पीछे एक संकीर्ण पुरुषवादी मानसिकता जिम्मेदार है। इस सोच वाला समाज मानता है कि लड़की युवा होने पर अपने प्रेमी के साथ यौन संबंध न बना सके। यही नहीं पहला बच्चा होने के बाद पति अपनी पत्नी को योनि फिर से सिलवाकर बंद करने के लिए बाध्य करता है ताकि उसकी पत्नी किसी अन्य पुरुष के साथ संसर्ग न कर सके।

अफ्रीका में तो लड़कियों की शादी तभी होती है, जब उसका बचपन में खतना हो चुका होता है। क्रूरता की हद यह है कि अफ्रीका में छोटी लड़कियों का खतना एक निजी नहीं, सार्वजनिक समारोह जैसा होता है, जिसमें दर्द से छटपटाती और चीखती लड़की को भीड़ चारों ओर से घेरे रहती है और खतना करने वाली महिला या मर्द किसी टूटे शीशे के टुकड़े, चाकू या फिर रेजर के इस्तेमाल हो चुके ब्लेड से लड़की के योनि द्वार को ढकने करने वाले अंग, क्लिटोरिस को काटकर अलग कर देता है और इसके बाद खून के रिसाव के बीच योनि द्वार के दोनों हिस्सों को आपस में सिल देता है।

मशहूर नॉवलिस्ट रुथ रैंडल ने डेली मेल में लिखा है कि ब्रिटेन में महिलाओं का खतना पहले नहीं होता था, लेकिन पवित्रता के नाम पर अब ये होने लगा है। बकौल रैंडल जब मैं एक प्रतिनिधि के रूप में संसद में आई तो मैंने 1985 में बनाए गए उस कानून के बारे में सुना जिसमें लड़कियों का खतना करना जुर्म करार दिया गया है।

हम इस कानून को और आगे ले गए। हमने एक नया कानून पास करवाया जिसमें ब्रिटेन से बाहर ले जाकर लड़कियों या महिलाओं का खतना करवाना भी जुर्म करार दिया गया है। 

एचआईवी बनाम खतना

जिम्बाब्वे में एचआईवी संक्रमण रोकने के लिए चलाए गए एक अभियान के तहत कई सांसद संसद के भीतर खतना करवा रहे हैं। इसके लिए संसद के भीतर एक अस्थायी चिकित्सा शिविर लगाया गया है।

अभियान की शुरुआत में बड़ी संख्या में सांसदों ने हिस्सा लेते हुए एचआईवी टेस्ट करवाते हुए इस खतरनाक बीमारी से बचने के लिए खतना करवाने का संकल्प लिया था। एचआईवी की रोकथाम के लिए अफ्रीका के कई देशों में पुरुषों में खतना करवाने को बढ़ावा दिया जा रहा है। 

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