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वीर चक्र से सम्मानित की विधवा को 46 साल बाद मिला इंसाफ

Sat, 09 Sep 2017 07:51 AM IST
एजेंसी/ नई दिल्ली
एजेंसी/ नई दिल्ली Updated Sat, 09 Sep 2017 07:51 AM IST
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Vir Chakra martyred husband widow wife got justice after 46 years

वीर चक्र से सम्मानित शहीद की विधवा को 46 साल के बाद न्याय मिला है। आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल (एएफटी) ने उसे वीर चक्र से सम्मानित की विधवा को मिलने वाली सभी वित्तीय सुविधाएं बहाल करने और बकाए का भुगतान करने का आदेश दिया है। 

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रक्षा मंत्रालय की खिंचाई करते हुए उस नीति को भी खारिज कर दिया है जिसके अनुसार शहीद की विधवा अगर उसके भाई के साथ शादी नहीं करती है तो उसकी सारी सुविधाएं रोक दी जाएंगी। ट्रिब्यूनल ने कहा है कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।
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जस्टिस वीके शाली और लेफ्टिनेंट जनरल एसके सिंह की पीठ ने कहा कि एक तरफ तो राष्ट्रपति शहीद की विधवा को उसकी पति की वीरता के लिए उसे पुरस्कार देते हैं और दूसरी तरफ उसको मिलने वाली वित्तीय सुविधाएं रोककर उसका अपमान किया जाता है। 
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यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है जिसके तहत हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी दी गई है। इसके मद्देनजर सरकार की वह नीति खारिज की जाती है जिसमें वीरता पुरस्कार विजेता की विधवा को शादी की वजह से वित्तीय सुविधाओं को महरूम कर दिया जाता है।

एएफटी के आदेश के बाद जनक जैसी अन्य महिलाओं को भी राहत मिलेगी

Vir Chakra martyred husband widow wife got justice after 46 years
जनक आनंद का केस लड़ने वाले वकील मेजर एसएस पांडे ने कहा कि इस मामले में सेना का नियम विचित्र है। शहीद की विधवा की शादी की सूरत में उसे फैमिली पेंशन तो मिलती रहती है लेकिन वीरता पुरस्कार से जुड़ी वित्तीय सुविधाएं बंद कर दी जाती हैं, लेकिन अब एएफटी के आदेश के बाद जनक जैसी अन्य महिलाओं को भी राहत मिलेगी।

दस फीसदी ब्याज के साथ मिलेगा बकाया
ट्रिब्यूनल ने आदेश दिया है कि शहीद की विधवा को वीर चक्र विजेता को मिलने वाली सभी वित्तीय बकाया 10 फीसदी ब्याज के साथ वापस लौटाया जाए। बकाए का हिसाब उस दिन से लगाया जाएगा जिस दिन से वह इन सुविधाओं की हकदार थी।

क्या है मामला

कैप्टन एसके सहगल पाकिस्तान के खिलाफ 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में शहीद हो गए थे। अदम्य साहस और सर्वोच्च बलिदान का प्रदर्शन करने के लिए 1972 में उन्हें मरणोपरांत वीर चक्र से नवाजा गया। 

दो साल बाद उनकी विधवा जनक ने मेजर दीपक आनंद से विवाह कर लिया। इसके बाद सरकार ने वीरता पुरस्कार से जुड़ी उनकी वित्तीय सुविधाएं रोक दीं। इसके खिलाफ उन्होंने याचिका दायर की थी, जिसमें कहा गया था कि बार-बार शिकायत करने के बावजूद सैन्य अधिकारियों के कान पर जूं नहीं रेंगी तो उन्होंने ट्र्ब्यिूनल का दरवाजा खटखटाया।
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