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न्यायपालिका, विधायिका एक दूसरे के अधिकारों पर कर रहे अतिक्रमण: नायडू

Thu, 26 Nov 2020 03:15 AM IST
देव कश्यप अमर उजाला ब्यूरो, केवड़िया
अमर उजाला ब्यूरो, केवड़िया Published by: देव कश्यप Updated Thu, 26 Nov 2020 03:15 AM IST
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Vice President of India M Venkaiah Naidu says Judiciary and legislature encroaching each other rights
वेंकैया नायडू (फाइल फोटो) - फोटो : Facebook

उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने बुधवार को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच कम होते सामंजस्य पर चिंता जताते हुए सांविधानिक संस्थाओं को सीमा नहीं लांघने की नसीहत दी। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका और विधायिका एक दूसरे के अधिकारों पर अतिक्रमण कर रहे हैं। दिवाली में पटाखों पर अदालती आदेश और जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका को भूमिका देने से इनकार करने जैसे फैसलों से साफ है कि न्यायपालिका का हस्तक्षेप बढ़ा है।

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उपराष्ट्रपति अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के 80वें सम्मेलन में ‘विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच सौहार्दपूर्ण समन्वय-जीवंत लोकतंत्र की कुंजी’ विषय पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा, ‘विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका संविधान के तहत परिभाषित अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत काम करने के लिए बाध्य हैं। तीनों अंगों के एक दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप किए बगैर काम करते रहने से सौहार्द बना रहता है। इसमें आपसी सम्मान, जवाबदेही और धैर्य की जरूरत होती है। लेकिन दुर्भाग्य से ऐसे कई उदाहरण हैं जब सीमाएं लांघी गईं। ऐसे कई फैसले सुनाए गए जिसमें हस्तक्षेप साफ दिखाई दिया।
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उपराष्ट्रपति ने कहा, ‘स्वतंत्रता के बाद से सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने ऐसे कई फैसले दिए जिनका सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों पर दूरगामी असर हुआ। इसके अलावा कई बार हस्तक्षेप कर चीजें ठीक भी कीं। लेकिन यदा-कदा चिंताएं भी जताई गईं कि क्या न्यायपालिका कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण कर रही है।
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नायडू ने उदाहरण देते हुए कहा, जैसे दिवाली पर पटाखों को लेकर फैसला देने वाली न्यायपालिका कॉलेजियम के माध्यम से जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका को भूमिका देने से इनकार कर देती है। नायडू ने कहा, कुछ न्यायिक फैसलों से प्रतीत होता है कि संविधान की कुछ तय सीमाओं का उल्लंघन हुआ जिससे बचा जा सकता था। कई बार विधायिका ने भी सीमा रेखा लांघी है। इसे लेकर उन्होंने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के चुनाव को लेकर 1975 में किए गए 39वें सविधान संशोधन का जिक्र  किया।

लोकतंत्र के मंदिर की गरिमा के लिए तीन ‘डी’ जरूरी
विधायिका के कार्यों में आ रही बाधाओं पर चिंता जताते हुए नायडू ने कहा, लोकतंत्र के मंदिर की ‘शालीनता, गरिमा और शिष्टाचार’ को बरकरार रखने के लिए तीन ‘डी’ जरूरी हैं। ये तीन डी हैं- बहस (डिबेट), चर्चा (डिसकस) और फैसला करना (डिसाइड), इनका पालन किया जाना चाहिए।


जनप्रतिनिधियाें की गलती देती है दखल का मौका
नायडू ने हस्तक्षेप के लिए राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण और सदनों में लगातार बढ़ते हंगामों का हवाला दिया। उन्होंने आगाह किया कि जनप्रतिनिधियों की गलतियों से उनके अधिकारों में दखल का मौका मिलता है। वर्तमान समय में जनता को ऐसे जनप्रतिनिधियों की जरूरत है जोकि जनता के प्रति जवाबदेह हैं, और जिनकी छवि भी साफ सुथरी है, क्योंकि जनता जनप्रतिनिधियों से संवेदनशीलता की उम्मीद करती है। इसके लिए उन्होंने वेदों का संदर्भ लेते हुए साफ-सुथरी राजनीति को अंगीकार करने का आह्वान किया।

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