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फैसला: कोविड-19 से मौत की आशंका अग्रिम जमानत का आधार नहीं, हाईकोर्ट के आदेश को नजीर मानने पर रोक

Tue, 25 May 2021 07:55 PM IST
सुरेंद्र जोशी राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली
राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Tue, 25 May 2021 07:55 PM IST
सार

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक दूरगामी असर वाले आदेश को नजीर नहीं मानने का आदेश दिया है। इस केस में कोविड-19 से मौत की आशंका के आधार पर अग्रिम जमानत दी गई है। 
 

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Verdict: The possibility of death from Covid-19 is not the basis of anticipatory bail, Allahabad High Court order not binding on lower courts
Supreme Court - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले पर रोक लगा दी, जिसमें कोविड-19 से मौत की आशंका को अग्रिम जमानत का वैध आधार बताया गया था। उप्र सरकार की याचिका पर शीर्ष कोर्ट ने इसे अन्य अदालतों के लिए नजीर मानने पर रोक लगा दी। हालांकि इस आधार पर दी गई अग्रिम जमानत पर रोक नहीं लगाई है। 

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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विनीत शरण और जस्टिस बीआर गवई की अवकाशकालीन पीठ ने कहा है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले को अग्रिम जमानत देने में मामलों में नजीर के तौर पर नहीं देखा जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के सभी अदालतों से कहा है कि अग्रिम जमानत की याचिका पर विचार करते वक्त इलाहाबाद हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को नजरअंदाज किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अग्रिम जमानत की याचिकाओं को उसकी मेरिट के आधार पर विचार किया जाना चाहिए।
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जमानत का आधार मानने का होगा परीक्षण
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट की इस पीठ ने इस बात के परीक्षण का निर्णय लिया है कि क्या कोविड-19,अग्रिम जमानत का आधार हो सकता है? पीठ ने इस मामले में वरिष्ठ वकील वी गिरी को न्याय मित्र नियुक्त किया है। दरअसल, उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कोविड-19 के संक्रमण होने की आशंका के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा ठगी के एक आरोपी को अग्रिम जमानत देने के फैसले को चुनौती दी गई थी।
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उप्र सरकार ने कहा-आरोपी का बायोडाटा देखें
मंगलवार को सुनवाई के दौरान यूपी सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से कहा कि आरोपी का 'बायोडाटा' देखा जाना चाहिए। उस पर 130 से भी अधिक आपराधिक मुकदमे हैं। मेहता ने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को अग्रिम जमानत की दूसरी याचिकाओं में भी आधार बनाया जा रहा है। 

हाईकोर्ट की टिप्पणी पर रोक का आग्रह
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि अगर आरोपी अग्रिम जमानत की मांग कर रहा था इसका मतलब है कि उसे 130 मामलों में जमानत मिली हुई है। पीठ ने कहा कि जब 130 मामलों में जमानत मिल चुकी है तो इस मामले में उसे जमानत क्यों नहीं मिलनी चाहिए? इस पर सॉलिसिटर जनरल पीठ से हाईकोर्ट की उस टिप्पणी पर रोक लगाने का आग्रह किया।

अग्रिम जमान पर रोक से इनकार
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को मिली अग्रिम जमानत के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, लेकिन यूपी सरकार की याचिका पर आरोपी को नोटिस जारी करते हुए अगली तारीख (जुलाई) पर पेश होने के लिए कहा है। पीठ ने कहा है कि अगली तारीख पर उपस्थित न होने पर हम अग्रिम जमानत को रद्द करने पर विचार कर सकते हैं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कोविड से मौत की आशंका को अग्रिम जमानत का वैध आधार बताने वाली टिप्पणी पर रोक लगा दी है।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह कहा था
सनद रहे कि गत 10 मई को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट द्वारा कोविड-19 के मद्देनजर जेल में कैदियों की भीड़ को कम करने को लेकर दिए गए निर्देशों का हवाला दिया था। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था 'एक ओर जहां सुप्रीम कोर्ट जेल में भीड़ को कम करना चाहता है ऐसे में अगर हम जेल में भीड़ बढाएंगे तो यह उचित नहीं होगा।'


हाईकोर्ट ने कहा था कि 'असाधारण समय में असाधारण उपाय की आवश्यकता होती है और हताश समय में उपचारात्मक उपाय की आवश्यकता होती है। इसलिए गिरफ्तारी से पहले और बाद में आरोपी का कोरोना से संक्रमित होने की आशंका और उसके द्वारा इस संक्रमण को पुलिस, अदालत और जेल कर्मियों में फैलाने के अंदेशे या कर्मियों के द्वारा आरोपी में संक्रमण होने की आशंका को अग्रिम जमानत देने का वैध आधार माना जा सकता है।'

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