{"_id":"5ab5f77d4f1c1bbe758b7339","slug":"vasundhara-raje-is-not-ready-to-loose-anything","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"राजस्थान सरकार पर पकड़ ढीली करने के लिए तैयार नहीं सीएम वसुंधरा राजे","category":{"title":"India News","title_hn":"भारत","slug":"india-news"}}
राजस्थान सरकार पर पकड़ ढीली करने के लिए तैयार नहीं सीएम वसुंधरा राजे
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
Updated Sat, 24 Mar 2018 12:46 PM IST
विज्ञापन
वसुंधरा राजे
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भाजपा में अंदरूनी राजनीति चाहे जितना गुल खिलाए, लेकिन राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे उड़ती चिडिया के पर गिनकर बैठी हैं। वह राजस्थान में पार्टी और सरकार पर जरा भी अपनी पकड़ ढीली करने के लिए तैयार नहीं हैं। खासकर राज्य के भाजपा अध्यक्ष और मंत्रिमंडल में फेरबदल को लेकर भी वह बेहद सावधान हैं। सूत्र बताते हैं कि वसुंधरा राजस्थान के आज के नहीं बल्कि आने वाले कल के राजनीतिक परिदृश्य को देखकर चल रही हैं। इसलिए वह एक सीमा तक ही केंद्रीय नेतृत्व के दबाव को जगह दे रही हैं।
तय था फेरबदल
राजस्थान मंत्रिमंडल में फेरबदल तय था। उपचुनाव में मिली हार के लिए जिम्मेदार नेताओं को इसकी सजा भी मिलनी थी। कुछ मंत्रियों के विभाग बदले जाने थे, लेकिन ऐन वक्त पर सब कुछ खटाई में पड़ गया। सूत्र बताते हैं कि कर्नाटक के विधानसभा चुनाव तक राजस्थान सरकार में मंत्रिमंडल फेरबदल की संभावना कम है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी को हटाए जाने की संभावना भी क्षीण हो गई है।
राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अशोक परनामी के हाथ पार्टी की कमान खींचे जाने के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन केंद्रीय दबाव के आगे एक हद तक झुकते हुए उन्होंने इसके फार्मूले पर अपनी सहमति दे दी थी। बताते हैं ऐन वक्त फिर मामला नहीं बना। राजस्थान के संघ के प्रचारक और संगठन मंत्री भी और वसुंधरा राजे के बीच बनी सहमति में नए पेंच आ गए। इसके बाद वसुंधरा राजे ने भी अपना स्टैंड कड़ा कर लिया।
विज्ञापन
विज्ञापन
तय था फेरबदल
राजस्थान मंत्रिमंडल में फेरबदल तय था। उपचुनाव में मिली हार के लिए जिम्मेदार नेताओं को इसकी सजा भी मिलनी थी। कुछ मंत्रियों के विभाग बदले जाने थे, लेकिन ऐन वक्त पर सब कुछ खटाई में पड़ गया। सूत्र बताते हैं कि कर्नाटक के विधानसभा चुनाव तक राजस्थान सरकार में मंत्रिमंडल फेरबदल की संभावना कम है। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष अशोक परनामी को हटाए जाने की संभावना भी क्षीण हो गई है।
विज्ञापन
राज्य की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अशोक परनामी के हाथ पार्टी की कमान खींचे जाने के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन केंद्रीय दबाव के आगे एक हद तक झुकते हुए उन्होंने इसके फार्मूले पर अपनी सहमति दे दी थी। बताते हैं ऐन वक्त फिर मामला नहीं बना। राजस्थान के संघ के प्रचारक और संगठन मंत्री भी और वसुंधरा राजे के बीच बनी सहमति में नए पेंच आ गए। इसके बाद वसुंधरा राजे ने भी अपना स्टैंड कड़ा कर लिया।
विज्ञापन
आ सकती है भाजपा सरकार
वसुंधरा राजे
वसुंधरा राजे के समर्थकों का कहना है कि राजस्थान स्विंग स्टेट है। पिछले तीस साल से एक बार भाजपा तो एक बार कांग्रेस का शासन यहां रहा है। लेकिन इसके बाद भी वसुंधरा राजे की राज्य में लोकप्रियता बनी है। चुनाव का महीना नजदीक आने तक सब कुछ ठीक हो जाएगा। मुख्यमंत्री के काफी करीबी समझे जाने वाले सरकार के मंत्री का कहना है कि राज्य में भाजपा में फिलहाल वसुंधरा राजे का विकल्प नहीं है। कांग्रेस की एक प्रवक्ता का भी कहना है कि राज्य में वसुंधरा राजे अपनी एक पहचान, अलग तरह की राजनीतिक छवि रखती हैं।
भाजपा में भले ही बदलाव की बार-बार चर्चा की जा रही हो लेकिन वसुंधरा का विकल्प खोजना सत्ताधारी दल के लिए आसान काम नहीं होगा। करणी सेना के लोकेन्द्र सिंह कालवी समेत अन्य का कहना है कि राज्य सरकार के खिलाफ जन आक्रोश लगातार बढ़ रहा है, लेकिन वह भी नहीं चाहते कि भाजपा चेहरे को प्रस्तावित आगामी चुनाव में मुख्यमंत्री के रूप में पेश करके आगे बढ़े। ऐसा हुआ तो पार्टी को नुकसान होगा और उन्होंने इससे भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को अवगत करा दिया है।
समीकरण तो देखिए
वसुंधरा के समर्थकों का मानना है कि राज्य में दिलचस्प समीकरण बन रहे हैं। कांग्रेस पार्टी भले ही प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट को भावी सीएम करके न चल रही हो लेकिन राजस्थान के लोगों को पता है कि यदि कांग्रेस चुनाव में बहुमत पाती है तो सचिन पायलट को राज्य की कमान मिलेगी। भाजपा के रणनीतिकारों के अनुसार इसके चलते मीणा समाज कांग्रेस के पाले में जाने से चिटकेगा। वैसे भी वसुंधरा ने मीणा समाज के दिग्गज नेता किरोड़ी लाल मीणा को पार्टी में शामिल करके संदेश दे दिया है।
इसका भी भाजपा को लाभ मिलेगा। इसी तरह से राजस्थान में अन्य पिछड़ा वर्ग का रुझान भी इस बार के चुनाव में बहुत मायने रखेगा। हालांकि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों में कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के मुख्य भूमिका में आने के बाद चुनौती काफी कड़ी हो जाएगी। वहीं, अशोक गहलोत अभी राजस्थान में आंतरिक राजनीति की पिच पर बहुत संभलकर खेल रहे हैं।
भाजपा में भले ही बदलाव की बार-बार चर्चा की जा रही हो लेकिन वसुंधरा का विकल्प खोजना सत्ताधारी दल के लिए आसान काम नहीं होगा। करणी सेना के लोकेन्द्र सिंह कालवी समेत अन्य का कहना है कि राज्य सरकार के खिलाफ जन आक्रोश लगातार बढ़ रहा है, लेकिन वह भी नहीं चाहते कि भाजपा चेहरे को प्रस्तावित आगामी चुनाव में मुख्यमंत्री के रूप में पेश करके आगे बढ़े। ऐसा हुआ तो पार्टी को नुकसान होगा और उन्होंने इससे भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को अवगत करा दिया है।
समीकरण तो देखिए
वसुंधरा के समर्थकों का मानना है कि राज्य में दिलचस्प समीकरण बन रहे हैं। कांग्रेस पार्टी भले ही प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट को भावी सीएम करके न चल रही हो लेकिन राजस्थान के लोगों को पता है कि यदि कांग्रेस चुनाव में बहुमत पाती है तो सचिन पायलट को राज्य की कमान मिलेगी। भाजपा के रणनीतिकारों के अनुसार इसके चलते मीणा समाज कांग्रेस के पाले में जाने से चिटकेगा। वैसे भी वसुंधरा ने मीणा समाज के दिग्गज नेता किरोड़ी लाल मीणा को पार्टी में शामिल करके संदेश दे दिया है।
इसका भी भाजपा को लाभ मिलेगा। इसी तरह से राजस्थान में अन्य पिछड़ा वर्ग का रुझान भी इस बार के चुनाव में बहुत मायने रखेगा। हालांकि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों में कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के मुख्य भूमिका में आने के बाद चुनौती काफी कड़ी हो जाएगी। वहीं, अशोक गहलोत अभी राजस्थान में आंतरिक राजनीति की पिच पर बहुत संभलकर खेल रहे हैं।
Vasundhara Raje
वसुंधरा तेरी खैर नहीं, मोदी तुझसे बैर नहीं
राजस्थान भाजपा में अंदरूनी कलह विरोधी दल कांग्रेस के लिए किसी मायने में कम नहीं है। सूत्र बताते हैं कि केंद्र से तीन-चार भाजपा नेता की निगाह भी लगातार राजस्थान पर टिकी हुई है। अर्जुनराम मेघवाल काफी संभल कर चल रहे हैं। सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ की निगाह चुपचाप अपने लक्ष्य पर है। ओम माथुर, भूपेन्द्र यादव की हर हलचल को लेकर राज्य की मुख्यमंत्री का राजनीतिक खेमा सतर्क रहता है। वहीं वसुंधरा राजे पार्टी के भीतर और बाहर विरोधियों को बहुत संभलने का अवसर नहीं दे रही हैं।
विरोधी भी मुख्यमंत्री का स्वभाव जानते हैं। उनकी राजनीतिक पकड़, पहुंच, संघ मुख्यालय नागपुर से संपर्क आदि को करीब-करीब महसूस करते हैं। उन्हें पता है वसुंधरा राजे को झुकना कम पसंद है। इन सभी गतिविधयों के बाद भी झुंझुनू में हाल में प्रधानमंत्री की रैली में राजनीति को नया मोड़ देने वाला नारा लगा। वसुंधरा के विरोधी गुट ने नारा लगाया कि वसुंधरा तेरी खैर नहीं, मोदी तुझसे बैर नहीं।
राजस्थान भाजपा में अंदरूनी कलह विरोधी दल कांग्रेस के लिए किसी मायने में कम नहीं है। सूत्र बताते हैं कि केंद्र से तीन-चार भाजपा नेता की निगाह भी लगातार राजस्थान पर टिकी हुई है। अर्जुनराम मेघवाल काफी संभल कर चल रहे हैं। सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ की निगाह चुपचाप अपने लक्ष्य पर है। ओम माथुर, भूपेन्द्र यादव की हर हलचल को लेकर राज्य की मुख्यमंत्री का राजनीतिक खेमा सतर्क रहता है। वहीं वसुंधरा राजे पार्टी के भीतर और बाहर विरोधियों को बहुत संभलने का अवसर नहीं दे रही हैं।
विरोधी भी मुख्यमंत्री का स्वभाव जानते हैं। उनकी राजनीतिक पकड़, पहुंच, संघ मुख्यालय नागपुर से संपर्क आदि को करीब-करीब महसूस करते हैं। उन्हें पता है वसुंधरा राजे को झुकना कम पसंद है। इन सभी गतिविधयों के बाद भी झुंझुनू में हाल में प्रधानमंत्री की रैली में राजनीति को नया मोड़ देने वाला नारा लगा। वसुंधरा के विरोधी गुट ने नारा लगाया कि वसुंधरा तेरी खैर नहीं, मोदी तुझसे बैर नहीं।
फर्क नहीं पड़ता
वसुंधरा राजे
अंदरखाने की राजनीति चाहे जितने पैंतरे बदल रही हो, वसुंधरा राजे राजनीति का हर मोहरा अपने हिसाब से चल रही हैं। यहां तक कि केन्द्रीय भाजपा मुख्यालय और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ तालमेल के मामले में भी वह अंदाज बनाए रखती हैं। इसका अंदाजा एक उदाहरण से लगाया जा सकता है। सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री एवं खेल और युवा मामलों के केन्द्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर की पहल पर जयपुर में युवा महोत्सव की योजना तैयार होनी शुरू हुई।
प्रधानमंत्री मोदी ने इसे 12 जनवरी को जयपुर में आयोजित करने तथा खुद के उपस्थित रहने की मंजूरी भी दे दी। लेकिन दिन में गर्म और रात में सर्द रहने वाला गुलाबी शहर जयपुर इसे नहीं मना सका। राजनीति का तापमान कुछ इस कदर चढ़ता, उतरता रहा कि इसका आयोजन नोएडा के स्टेडियम में हुआ। प्रधानमंत्री ने यही देश को अपना संदेश दिया।
टालमटोल का खेल
वसुंधरा का विरोधी खेमा राज्य में नेतृत्व और पार्टी में बदलाव चाहता है। सरकार के नेतृत्व में बदलाव की उसकी सारी कोशिश बेदम हो चुकी है। पार्टी के नेतृत्व में बदलाव के अभी भी कयास जारी हैं। विरोधी खेमे को उम्मीद है कि चुनाव से पहले ऐसा होने पर संतुलित टिकट बंटवारे की गुंजाइश बनेगी। सूत्र बताते हैं कि वसुंधरा का खेमा इसको लेकर बेहद सतर्क है। इस खेमे को उ.प्र. में लोकसभा सीटों के उपचुनाव के नतीजे ने काफी ऑक्सीजन दे दी है।
वसुंधरा खेमे की फिलहाल यही रणनीति दिखाई दे रही है कि राज्य सरकार के कामकाज के प्रचार प्रसार में तेजी लाते हुए इस तरह की सभी स्थितियों को जितना संभव हो सके टाला जाएगा। क्या पता शीर्ष स्तर को बाद में यह सब करने का अवसर ही न मिल पाए। क्योंकि मामला भविष्य में भी राजनीतिक दबदबे का है।
प्रधानमंत्री मोदी ने इसे 12 जनवरी को जयपुर में आयोजित करने तथा खुद के उपस्थित रहने की मंजूरी भी दे दी। लेकिन दिन में गर्म और रात में सर्द रहने वाला गुलाबी शहर जयपुर इसे नहीं मना सका। राजनीति का तापमान कुछ इस कदर चढ़ता, उतरता रहा कि इसका आयोजन नोएडा के स्टेडियम में हुआ। प्रधानमंत्री ने यही देश को अपना संदेश दिया।
टालमटोल का खेल
वसुंधरा का विरोधी खेमा राज्य में नेतृत्व और पार्टी में बदलाव चाहता है। सरकार के नेतृत्व में बदलाव की उसकी सारी कोशिश बेदम हो चुकी है। पार्टी के नेतृत्व में बदलाव के अभी भी कयास जारी हैं। विरोधी खेमे को उम्मीद है कि चुनाव से पहले ऐसा होने पर संतुलित टिकट बंटवारे की गुंजाइश बनेगी। सूत्र बताते हैं कि वसुंधरा का खेमा इसको लेकर बेहद सतर्क है। इस खेमे को उ.प्र. में लोकसभा सीटों के उपचुनाव के नतीजे ने काफी ऑक्सीजन दे दी है।
वसुंधरा खेमे की फिलहाल यही रणनीति दिखाई दे रही है कि राज्य सरकार के कामकाज के प्रचार प्रसार में तेजी लाते हुए इस तरह की सभी स्थितियों को जितना संभव हो सके टाला जाएगा। क्या पता शीर्ष स्तर को बाद में यह सब करने का अवसर ही न मिल पाए। क्योंकि मामला भविष्य में भी राजनीतिक दबदबे का है।