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BNS की धारा 152 की वैधता: कोर्ट ने कहा- संसद को कानून बनाने का विशेषाधिकार, वह केंद्र के वादे से बंधी नहीं

Fri, 27 Feb 2026 11:25 PM IST
Pavan न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Pavan Updated Fri, 27 Feb 2026 11:25 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने बीएनएस की धारा 152 की वैधता पर सुनवाई के दौरान कहा कि संसद को कानून बनाने का विशेषाधिकार, वह केंद्र के वादे से बंधी नहीं है। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश एक वकील ने कहा कि धारा 152 पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए (राजद्रोह) को दोबारा लागू करती है।

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Validity of Section 152 of BNS: SC said Parliament has prerogative to legislate, isn't bound by Centre promise
सुप्रीम कोर्ट का बयान - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि संसद एक संप्रभु निकाय है और कानून बनाना उसका विशेषाधिकार है। वह केंद्र सरकार की ओर से न्यायालय के समक्ष दिए गए किसी भी वचन से बंधी नहीं है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने शुक्रवार को भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 152 की वैधता पर सवाल उठाने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। यह धारा भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों से संबंधित है। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश एक वकील ने कहा कि धारा 152 पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए (राजद्रोह) को दोबारा लागू करती है।
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सुप्रीम कोर्ट ने मई 2022 में राजद्रोह से जुडे़ कानून पर लगाई थी रोक
मई 2022 में सर्वोच्च न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने राजद्रोह से संबंधित औपनिवेशिक काल के दंड कानून पर रोक लगा दी थी, ताकि सरकार इसकी दोबारा समीक्षा कर सके। साथ ही, केंद्र और राज्यों को निर्देश दिया था कि वे राजद्रोह से संबंधित कोई भी नई एफआईआर दर्ज न करें। शुक्रवार को वकील ने कहा कि 2022 में केंद्र ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष राजद्रोह कानून की समीक्षा करने का आश्वासन दिया था। अदालत के समक्ष वचन देने के बाद सरकार बीएनएस में उस प्रावधान को दोबारा लागू नहीं कर सकती। इस पर शीर्ष अदालत ने कहा, भारत सरकार ने भले ही अदालत के समक्ष वचन दिया हो, लेकिन संसद उससे बाध्य नहीं है। संसद को कानून बनाने का पूर्ण अधिकार है।
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बीएनएस की धारा 173 का वकील ने दिया हवाला
वकील ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 173 का हवाला देते हुए कहा कि यह सर्वोच्च न्यायालय के ललिता कुमारी फैसले का उल्लंघन करती है, जिसमें संज्ञेय अपराध के होने की सूचना मिलने पर एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। वहीं, धारा 173 में यह प्रावधान है कि किसी अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस पहले यह पता लगाएगी कि इसमें प्रथम दृष्टया कोई मामला बनता है या नहीं। इस पर पीठ ने कहा, ललिता कुमारी मामले के फैसले में यह भी कहा गया है कि संज्ञेय अपराध का खुलासा हुआ है या नहीं, यह पता लगाने के लिए प्रारंभिक जांच की जा सकती है। इसके साथ ही पीठ ने मामले की सुनवाई होली की छुट्टियों के बाद के लिए स्थगित कर दी।

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