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Book: राष्ट्रपति चुनाव के ऑब्जर्वर के तौर पर पहली बार अमेरिका गए थे वाजपेयी, नेहरू ने भी निभाई थी ये भूमिका
Tue, 09 May 2023 08:43 PM IST
कुमार विवेक
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: कुमार विवेक
Updated Tue, 09 May 2023 08:43 PM IST
सार
Book: जॉन एफ कैनेडी और रिचर्ड निक्सन के बीच राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान पर्यवेक्षक बनने के लिए वाजपेयी अमेरिकी सरकार के निमंत्रण पर अमेरिका गए थे। वे संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की ओर से चुने गए प्रतिनिधिमंडल का भी हिस्सा थे।
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अटल बिहारी वाजपेयी
- फोटो : PTI
विस्तार
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जीवन पर आधारित एक पुस्तक में दावा किया गया है कि 1960 में अमेरिका की अपनी पहली यात्रा के दौरान उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी मिशन में तैनात एक युवा आईएफएस अधिकारी से दोस्ती की थी। उनके साथ ही वाजपेयी ने न्यूयॉर्क की यात्रा की और संग्रहालयों, कला दीर्घाओं और यहां तक कि नाइटक्लबों का भी दौरा किया। वाजपेयी अमेरिकी सरकार के निमंत्रण पर जॉन एफ कैनेडी और रिचर्ड निक्सन के बीच राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान पर्यवेक्षक बनने के लिए अमेरिका गए थे। वे संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की ओर से चुने गए प्रतिनिधिमंडल का भी हिस्सा थे।
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जॉन एफ कैनेडी और रिचर्ड निक्सन के बीच राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान पर्यवेक्षक बनने के लिए वाजपेयी अमेरिकी सरकार के निमंत्रण पर अमेरिका गए थे। वे संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की ओर से चुने गए प्रतिनिधिमंडल का भी हिस्सा थे। अभिषेक चौधरी ने अपने दो खंडों के संस्मरण 'वाजपेयी : द एसेंट ऑफ द हिंदू राइट' में लिखा है कि 25 सितंबर, 1960 की सुबह वाजपेयी अपनी पहली विदेश यात्रा पर वाशिंगटन डीसी के लिए विमान में सवार हुए थे।
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संस्मरण के अनुसार, 'अमेरिकी सरकार की ओर से उन्हें राष्ट्रपति चुनाव के लिए चल रहे प्रचार अभियान के दौरान पर्यवेक्षक के रूप में उपस्थित रहने का निमंत्रण मिला था। वहीं, ऑर्गेनाइजर' में बताया गया था कि उन्हें 'रेलवे श्रमिकों के कल्याण में उनकी विशेष रुचि' के लिए भी आमंत्रित किया गया था। मुखपत्र में वाजपेयी की यात्रा के लिए एक और, शायद अधिक महत्वपूर्ण कारण का उल्लेख नहीं किया गया था। वह कारण था कि नेहरू ने उन्हें संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के लिए भेजे जाने वाले प्रतिनिधियों की सूची में शामिल किया था। लेखक के अनुसार, न्यूयॉर्क में अपने अधिकांश प्रवास के दौरान वाजपेयी आईएफएस अधिकारी महाराजाकृष्ण रसगोत्रा के साथ थे।
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उपनिवेशवाद को खत्म करने के विशेषज्ञ रसगोत्रा ने संयुक्त राष्ट्र के बारे में वाजपेयी की समझ को गहरा किया था। इसके बदले में सांसद ने अपने संसदीय जीवन की छोटी-छोटी बातें साझा की थी। "वे दोनों अपने उम्र के तीसरे दशक के शुरुआती दौर में थे और योग्य कुंवारे थे। उनके बीच कुछ हल्की दोस्ती भी थी। इस यात्रा के दौरान रसगोत्रा वाजपेयी को संग्रहालयों और कला दीर्घाओं में ले गए। हालांकि एक युवा जनसंघी के तौर पर वाजपेयी को इन चीजों में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। कई बार रसगोत्रा उन्हें नाइट क्लबों में भी ले गए। वाजपेयी को उस दौरान यह स्पष्ट नहीं था कि नाइट क्लब वास्तव में क्या हैं।
रसगोत्रा ने उन्हें आश्वस्त किया था कि ये स्ट्रिप क्लब नहीं हैं, यहां 'नग्न नृत्य नहीं होता है। यहां आपको यह देखने को मिलेगा कि आधुनिक संगीत क्या आकार ले रहा है। वहां जैज़, वाद्य और स्थानीय संगीत होता है।" इससे वाजपेयी उत्साहित हो गए और कहा "चलिये, ये भी एक नई दुनिया है।" लेखक का कहना है कि राजनीतिक परिदृश्य पर बड़े पैमाने पर उभरने के बावजूद, वाजपेयी हाल के दिनों के सबसे गूढ़ भारतीय राजनेता बने हुए हैं। लेखक के अनुसार "मेरे शोध की शुरुआत में, मुझे उनकी पहेली की कुंजी मिली। हम उनके छह दशक लंबे करियर के पहले हिस्से के बारे में बहुत कम जानते हैं। दो खंडों में उपलब्ध यह संस्मरण उस शून्य को भरने का प्रयास करता है।