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Hindi News ›   India News ›   US-Austria's 2500 dollar carbine causing havoc in Jammu, firing 970 bullets in 60 seconds

Doda: जम्मू में तबाही मचा रही अमेरिका-ऑस्ट्रिया की 2500 डॉलर वाली कार्बाइन, 60 सेकेंड में निकल रही 970 बुलेट

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Wed, 14 Aug 2024 05:47 PM IST
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सार

ये कार्बाइन एक मिनट में 900 से अधिक स्टील बुलेट फायर कर सकती हैं। अगर इनकी मारक रेंज यानी दूरी की बात करें तो वह करीब 600 मीटर है।

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US-Austria's 2500 dollar carbine causing havoc in Jammu, firing 970 bullets in 60 seconds
जम्मू कश्मीर में आतंकियों के हाथ आया घातक हथियार - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

जम्मू-कश्मीर के विभिन्न हिस्सों में हो रही मुठभेड़ के दौरान आतंकियों द्वारा अमेरिकन और ऑस्ट्रिया में निर्मित कार्बाइन इस्तेमाल की जा रही हैं। 15 सौ डॉलर से लेकर 25 सौ डॉलर तक के रेट वाली इन घातक काबाईन के जरिए पाकिस्तानी दहशतगर्द, भारतीय सुरक्षा बलों के समक्ष एक नई चुनौती पेश कर रहे हैं। ये कार्बाइन एक मिनट में 900 से अधिक स्टील बुलेट फायर कर सकती हैं। अगर इनकी मारक रेंज यानी दूरी की बात करें तो वह करीब 600 मीटर है। दोनों ही कार्बाइन पर हाई रेंज टेलीस्कॉप लगा रहता है। इसकी मदद से आतंकी, पहाड़ी जंगल में आसानी से सटीक निशाना लगा सकते हैं। जम्मू कश्मीर पुलिस की इंटेल इकाई से जुड़े एक अधिकारी का कहना है, अभी तक जो सूचना है, उसके मुताबिक, ये घातक हथियार केवल पाकिस्तानी दहशतगर्द यानी वहां की स्पेशल फोर्स के कमांडो, जो किसी तरह से सीमा आ चुके हैं, के हाथों में हैं। हालांकि ऐसे हथियार, अभी गिनती के ही हैं। भारतीय सेना ने बुधवार को डोडा में एक सर्च आपरेशन के दौरान अमेरिकन एम4 कार्बाइन बरामद की है। गत माह आतंकियों के कब्जे से ऑस्ट्रिया की एयूजी असॉल्ट राइफल बरामद हुई थी। 



अधिकारी के मुताबिक, जम्मू कश्मीर में मौजूद आतंकी, अमेरिका निर्मित कार्बाइन एम4 का इस्तेमाल कर रहे हैं, यह बात पहली बार 2017 में पता चली थी। उसके अगले वर्ष ही एक दूसरी कार्बाइन एम4 बरामद हुई। इस कार्बाइन के जरिए स्टील की बुलेट दागी जा सकती हैं। इस साल डोडा, कठुआ, पुंछ व रेयासी के आतंकी हमले में स्टील बुलेट का इस्तेमाल किया गया है। पाकिस्तान में स्पेशल फोर्स को ऐसी घातक कार्बाइन मुहैया कराई गई हैं। एम4 और स्टेयर एयूजी असॉल्ट, ये दोनों हथियार लाइट वेट हैं और गैस आपरेटिड हैं। इन्हें साथ ले जाना और चलाना, दोनों आसान हैं। इनके जरिए 700 से 970 फायर/प्रति मिनट किए जा सकते हैं। पिछले माह उत्तरी कश्मीर में सीमांत कुपवाड़ा जिले के केरन सेक्टर में मारे गए आतंकवादियों के कब्जे से ऑस्ट्रिया निर्मित बुलपप असॉल्ट राइफल स्टेयर एयूजी, बरामद हुई थी। खास बात है कि अस्सी के दशक में यह राइफल, एम4 कार्बाइन को टक्कर दे रही थी। खुद अमेरिका ने अपनी सेनाओं के लिए इस हथियार का आयात किया था। इस हथियार की सबसे बड़ी खूबी है कि यह एक गैस-पिस्टन-संचालित असॉल्ट राइफल है। ये मॉड्यूलर हथियार तकनीक पर काम करता है। इसे असॉल्ट राइफल, कार्बाइन, सबमशीन गन और ओपन-बोल्ट लाइट मशीन गन के तौर पर भी इस्तेमाल कर सकते हैं। 


इंटेल अधिकारी के मुताबिक, संभव है कि ऐसी कुछ कार्बाइन, पाकिस्तान से घुसपैठ करने वाले आतंकी अपने साथ लाए हों। वजह, पाकिस्तानी में स्पेशल फोर्स को एम4 कार्बाइन मुहैया कराई गई है। अमेरिकन एम4 और स्टेयर एयूजी का इस्तेमाल, अफगानिस्तान में नाटो सेनाओं द्वारा बड़े पैमाने पर किया गया था। ऑस्ट्रिया सशस्त्र बल (एएएफ) भी नाटो के नेतृत्व वाले अभियानों में शामिल रहा है। इस देश ने भी अपने सैनिकों को अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सहायता बल (आईएसएएफ) के सदस्य के तौर पर अफगानिस्तान में भेजा था। सामान्य स्टेयर एयूजी की कीमत लगभग डेढ़ लाख रुपये है, जबकि एम4 कार्बाइन की कीमत दो लाख रुपये तक पहुंचती है। हालांकि इसके कई वेरिएंट हैं। वे सवा लाख रुपये से शुरु हो जाते हैं।

जम्मू कश्मीर में आतंकी वारदात करने वाले पाकिस्तान के संगठन, जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा ने अफगानिस्तान से इन हथियारों का सौदा किया है। 2021 में जब अफगानिस्तान से अमेरिका के नेतृत्व वाले नाटो समूह की सेना, वापस गई तो वहां की सत्ता तालिबान के हाथों में आ गई थी। 'नाटो' की सेनाओं के ज्यादातर हथियार और गोला बारूद वहीं पर छूट गए। उसके बाद तालिबान के कब्जे में आए वे घातक हथियार, पाकिस्तान के रास्ते जम्मू-कश्मीर तक पहुंचने लगे हैं। 

आतंकियों द्वारा जब कभी सैन्य कैंप, वाहन या नाके पर हमला किया जाता है तो उसमें अमेरिकन/ऑस्ट्रियाई कारबाईन एवं स्टील की गोलियों का इस्तेमाल होता है। पिछले दो वर्षों के दौरान राजौरी और पुंछ के इलाकों में हुए आतंकी हमलों में तालिबान से मिले हथियार, प्रयोग में लाए गए हैं। आतंकियों ने स्टील बुलेट इस्तेमाल की हैं। ये बुलेट किसी भी बख्तरबंद गाड़ी को भेद सकती हैं। सामान्य बुलेटप्रूफ जैकेट और पटका, इससे बचाव नहीं कर पाते। तालिबान से घातक अमेरिकन राइफलें और स्टील की गोलियां, घाटी में पहुंच रही हैं, ये चिंता का विषय है।

देश में अभी तक सुरक्षा बलों के साजो सामान का जो पैटर्न है, वह 'लेवल 3' का है। मतलब, ज्यादातर बुलेटप्रूफ वाहन, मोर्चा, जैकेट और पटका 'लेवल 3' श्रेणी वाले होते हैं। स्टील की गोलियां, जिसे 'आर्मर पियर्सिंग इन्सेंडरी' (एपीआई) कहा जाता है, इन्हें भेद सकती हैं। देश में हर जगह पर 'लेवल-4' बुलेटप्रूफ कवच नहीं है। इस कवच को केवल चुनींदा ऑपरेशनों में ही इस्तेमाल किया जाता है। बाकी जगहों पर 'लेवल 3' का पैटर्न चलता है।

अफगानिस्तान से नाटो सैनिकों के वापस लौटने के बाद '85 बिलियन डॉलर' के एयरक्रॉफ्ट, बख्तरबंद गाड़ियां, रॉकेट डिफेंस सिस्टम, मशीन गन और असॉल्ट राइफल सहित भारी मात्रा में गोला बारूद पर तालिबान का कब्जा हो गया था। हालांकि अमेरिका ने दावा किया था कि उसने तालिबान के हाथ लगे अपने अत्याधुनिक एयरक्रॉफ्ट, बख्तरबंद गाड़ियां व रॉकेट डिफेंस सिस्टम को निष्क्रिय कर दिया है। अफगानिस्तान में '4 सीब-130 ट्रांसपोर्ट्स, 23 एम्ब्रेयर ईएमबी 314/ए29 सुपर सुकानो, 28 सेसेना 208, 10 सेसेना एसी-208 स्टाइक एयरक्रॉफ्ट' फिक्सड् विंग एयरक्रॉफ्ट बताए गए हैं। 

इनके अलावा 33 एमआई-17, 33 यूएच-60 ब्लैकहॉक व 43 एमडी 530 हेलीकॉप्टर भी हैं। अमेरिकी 22174-ह्मवे, 634 एमआई 117, 155 एमएक्सएक्स प्रो माइन प्रूफ व्हीकल, 169 एमआई 13 आर्म्ड पर्सनल केरियर, 42000 पिक अप ट्रक एंड एसयूवी, 64363 मशीन गन, 8000 ट्रक, 162043 रेडियो, 16035 नाइट गॉगल, 358530 असॉल्ट राइफल, 126295 पिस्टल और 176 आर्टलरी पीस भी तालिबान के कब्जे में बताए जाते हैं। अमेरिकन M16 राइफल व M4 कार्बाइन जैसे हथियार, जम्मू-कश्मीर में सक्रिय पाकिस्तानी आतंकी संगठन 'लश्कर- ए-तैयबा' और 'जैश-ए-मोहम्मद' के हाथ लगे हैं।

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