‘राजनाथ ने इतना भी हौसला नहीं दिखाया कि...’
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भारतीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के इस्लामाबाद दौरे में दिखी तल्खी पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में हर तरफ छाई हुई है। ‘जंग’ लिखता है कि इस्लामाबाद में सार्क देशों के गृह मंत्रियों की बैठक दहशतगर्दी, समुद्री अपराध, साइबर क्राइम, अवैध ड्रग कारोबार और महिला और बच्चों की तस्करी जैसे अहम मुद्दों पर बुलाई गई थी। अखबार के मुताबिक एजेंडे से उलट भारतीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और उनके इशारे पर अफगानिस्तान और बांग्लादेश के प्रतिनिधियों ने कॉन्फ्रेंस को पाकिस्तान पर इल्जाम लगाने के मौके में तब्दील कर दिया।
अखबार लिखता है कि पाकिस्तानी गृह मंत्री निसार अली खान ने सब आरोपों का ऐसे जवाब दिया कि बोलती बंद कर दी और कश्मीरी जनता के अपने भविष्य के बारे में खुद फैसला करने के अधिकार का मजबूती से बचाव किया। ‘औसाफ’ लिखता है कि हकीकत तो ये है कि राजनाथ सिंह से चौधरी निसार अली खान का सच बर्दाश्त नहीं हुआ और सार्क कॉन्फ्रेंस का आखिरी सेशन और लंच छोड कर चले गए। अखबार के मुताबिक भारतीय गृह मंत्री तो एयरपोर्ट पर पाकिस्तानी मीडिया से बात करने का हौसला भी नहीं दिखा पाए।
एक्सप्रेस’ ने संपादकीय लिखा है- भारतीय गृह मंत्री की अशोभनीय हरकत
अखबार कहता है कि पाकिस्तानी गृह मंत्री ने जिस तरह भारतीय गृह मंत्री को जबाव दिया, वो पूरे देश की आवाज है और उन्होंने कश्मीरियों और पाकिस्तानियों का दिल जीत लिया। राजनाथ सिंह के सार्क गृह मंत्रियों की बैठक को बीच में ही छोड चले आने पर रोजनामा ‘एक्सप्रेस’ ने संपादकीय लिखा है- भारतीय गृह मंत्री की अशोभनीय हरकत। अखबार की राय है कि ये सब सोची समझी रणनीति का हिस्सा था और इसका मकसद कश्मीर के हालात से सबका ध्यान हटाना था।
अखबार कहता है कि कयास तो ये भी हैं कि राजनाथ सिंह को ऐसा करने के लिए पहले से हिदायत मिल चुकी थी, इसलिए तो उन्होंने साफ कर दिया था कि किसी पाकिस्तानी नेता से मिलने और अलग से बात करने का उनका कोई इरादा नहीं है। ‘दुनिया’ लिखता है कि ये कैसे मुमकिन है कि भारतीय सेना पैलेट गनों से निहत्थे कश्मीरियों पर हमला करती रहे, उन्हें मारती रहे, घायल करती रहे और उनकी आंखों की रोशनी छीनती रहे और इसका विरोध भी न हो।
अखबार की राय है कि ये सब सोची समझी रणनीति का हिस्सा था
अखबार कहता है कि पाकिस्तानी गृह मंत्री ने जिस तरह भारतीय गृह मंत्री को जबाव दिया, वो पूरे देश की आवाज है और उन्होंने कश्मीरियों और पाकिस्तानियों का दिल जीत लिया। राजनाथ सिंह के सार्क गृह मंत्रियों की बैठक को बीच में ही छोड चले आने पर रोजनामा ‘एक्सप्रेस’ ने संपादकीय लिखा है- भारतीय गृह मंत्री की अशोभनीय हरकत। अखबार की राय है कि ये सब सोची समझी रणनीति का हिस्सा था और इसका मकसद कश्मीर के हालात से सबका ध्यान हटाना था।
अखबार कहता है कि कयास तो ये भी हैं कि राजनाथ सिंह को ऐसा करने के लिए पहले से हिदायत मिल चुकी थी, इसलिए तो उन्होंने साफ कर दिया था कि किसी पाकिस्तानी नेता से मिलने और अलग से बात करने का उनका कोई इरादा नहीं है। ‘दुनिया’ लिखता है कि ये कैसे मुमकिन है कि भारतीय सेना पैलेट गनों से निहत्थे कश्मीरियों पर हमला करती रहे, उन्हें मारती रहे, घायल करती रहे और उनकी आंखों की रोशनी छीनती रहे और इसका विरोध भी न हो।
कश्मीर का मुद्दा उछालकर ही लोगों का ध्यान भटकाना चाहते हैं
रोजनामा 'खबरें' लिखता है कि अमरीकी मदद रुकने से दहशतगर्दी के खिलाफ ऑपरेशन प्रभावित होने का अंदेशा है। अखबार लिखता है कि रक्षा विश्लेषक अमरीका के इस फैसले को पाकिस्तानी सेना के लिए झटका मान रहे हैं लेकिन पाकिस्तान अमरीका से डरने और उसके दबाव में आने के बजाय अपने हितों को आगे रखे, यही वक्त की पुकार है। रुख भारत का करें तो यहां भी राजनाथ सिंह का पाक दौरा चर्चा में है, लेकिन यहां पाकिस्तान की नीयत पर सवाल उठाए गए हैं।
'सियासी तकदीर' कहता है कि राजनाथ सिंह के पाकिस्तान पहुंचते ही विरोध प्रदर्शनों के नाम पर उनके जरिए जिस तरह बदतमीजी की गई, उसकी जितनी निंदा की जाए, उतना कम है। अखबार ने भारत प्रशासित कश्मीर में ताजा अशांति को आजादी का संघर्ष बताने के लिए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की आलोचना की है। अखबार लिखता है कि पनामा लीक्स में नवाज शरीफ के परिवार का नाम आने पर विपक्ष ने उनके खिलाफ मुहिम शुरू की है, उसे देखते हुए वो सिर्फ कश्मीर का मुद्दा उछालकर ही लोगों का ध्यान भटकाना चाहते हैं।
पाकिस्तान कश्मीरियों को हिंदुस्तान से अलग करने की कोशिश कर रहा है
'राष्ट्रीय सहारा' ने ‘नवाज का फिर कश्मीर राग’ शीर्षक से लिखा है कि उन्होंने कई देशों में पाकिस्तानी राजनयिकों से कहा है कि वो दुनिया को ये संदेश दें कि कश्मीर मसला भारत का अंदरूनी मामला नहीं है। अखबार लिखता है कि पाकिस्तान कश्मीरियों को हिंदुस्तान से अलग करने की कोशिश कर रहा है लेकिन कश्मीरी जनता इस बात से अच्छी तरह वाकिफ है कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में लोग कितने बदहाल हैं। अखबार कहता है कि भारत को भी अपनी कश्मीर नीति पर फिर से विचार करने की जरूरत है ताकि भोले भाले कश्मीरियों को कोई ताकत बरगला न सके।