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यूरेनियम: पहले इनकार, फिर 2014 के समझौते ने खोली राह; भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच किस मुद्दे पर बनी सहमति?
Fri, 10 Jul 2026 08:17 AM IST
Pavan
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Pavan
Updated Fri, 10 Jul 2026 08:17 AM IST
सार
भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच यूरेनियम आपूर्ति समझौता दोनों देशों के रणनीतिक संबंधों में बड़ा बदलाव माना जा रहा है। 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद ऑस्ट्रेलिया ने भारत को यूरेनियम देने से इनकार कर दिया था, लेकिन 2014 के नागरिक परमाणु सहयोग समझौते के बाद रास्ता खुला। ऑस्ट्रेलिया के पास दुनिया का करीब एक-तिहाई यूरेनियम भंडार है।
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : Freepik
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विस्तार
भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच यूरेनियम आपूर्ति समझौता दोनों देशों के रिश्ते रणनीतिक रूप से नई ऊंचाइयों पर पहुंचने का संकेत है। हालांकि, इनके रिश्ते हमेशा इतने मजबूत नहीं रहे। 2010-2011 में एक समय ऐसा था जब भारत के एटमी कार्यक्रम के कारण ऑस्ट्रेलिया ने भारत को यूरेनियम की आपूर्ति से साफ तौर पर इनकार कर दिया था। दरअसल, वह इस बात पर अड़ा था कि भारत को परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर करने चाहिए। लेकिन 2014 में हुए समझौते ने यूरेनियम आपूर्ति की राह खोली।
ऑस्ट्रेलिया के भारत को यूरेनियम आपूर्ति से परहेज करने का सबसे बड़ा कारण भारत में 1974 व 1998 में किए परमाणु परीक्षण थे। साल 1974 में जब भारत ने पोकरण-1 के जरिए दुनिया को अपनी परमाणु क्षमता दिखाई तो ऑस्ट्रेलिया समेत कई पश्चिमी देश भड़क गए थे। 1978 में ऑस्ट्रेलिया ने सख्त नीति अपनाई कि वह दुनिया के उन्हीं देशों को यूरेनियम बेचेगा जिन्होंने एनपीटी पर हस्ताक्षर किए हैं। चूंकि, भारत एनपीटी को भेदभावपूर्ण मानता था, इसलिए उसने हस्ताक्षर नहीं किए थे। नतीजतन, दुनिया में यूरेनियम का सबसे बड़ा भंडार रखने वाले ऑस्ट्रेलिया ने भारत के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए।
जॉन हावर्ड का रुख नरम, पर सत्ता के साथ फैसला बदला
इस मामले में सबसे अहम पड़ाव 2007 में आया जब भारत के साथ अच्छे संबंधों के पक्षधर ऑस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री जॉन हावर्ड ने भारत को यूरेनियम बेचने की मंजूरी दे दी थी। लेकिन उसी साल के आखिर में ऑस्ट्रेलिया में सत्ता बदल गई। केविन रड के नेतृत्व वाली लेबर पार्टी सरकार ने भारत को यूरेनियम देने से मना करा दिया और कहा कि एनपीटी पर दस्तखत किए बिना यूरेनियम नहीं मिलेगा।
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आखिर आपूर्ति पर बनी सहमति
अन्य देशों की तरह ऑस्ट्रेलिया को भी डर था कि भारत इस यूरेनियम का इस्तेमाल बिजली बनाने के बजाय परमाणु बम बनाने में कर सकता है। हालांकि, 2008 में हुए भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु करार के बाद ऑस्ट्रेलिया में भी बदलाव आया। भारत के पहले परमाणु हमला न करने के ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए 2011 में ऑस्ट्रेलिया ने नीति बदली। वर्ष 2014 में जब ऑस्ट्रेलियाई पीएम टोनी एबॉट भारत आए, तब ऐतिहासिक नागरिक परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर हुए। सुरक्षा गारंटी, परमाणु दायित्व कानून के विवादों को सुलझाने जैसी तमाम तकनीकी बारीकियों और कागजी कार्रवाइयों को पूरा होने के बाद इस समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं।
दुनिया का एक तिहाई भंडार
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ऑस्ट्रेलिया के भारत को यूरेनियम आपूर्ति से परहेज करने का सबसे बड़ा कारण भारत में 1974 व 1998 में किए परमाणु परीक्षण थे। साल 1974 में जब भारत ने पोकरण-1 के जरिए दुनिया को अपनी परमाणु क्षमता दिखाई तो ऑस्ट्रेलिया समेत कई पश्चिमी देश भड़क गए थे। 1978 में ऑस्ट्रेलिया ने सख्त नीति अपनाई कि वह दुनिया के उन्हीं देशों को यूरेनियम बेचेगा जिन्होंने एनपीटी पर हस्ताक्षर किए हैं। चूंकि, भारत एनपीटी को भेदभावपूर्ण मानता था, इसलिए उसने हस्ताक्षर नहीं किए थे। नतीजतन, दुनिया में यूरेनियम का सबसे बड़ा भंडार रखने वाले ऑस्ट्रेलिया ने भारत के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए।
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जॉन हावर्ड का रुख नरम, पर सत्ता के साथ फैसला बदला
इस मामले में सबसे अहम पड़ाव 2007 में आया जब भारत के साथ अच्छे संबंधों के पक्षधर ऑस्ट्रेलिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री जॉन हावर्ड ने भारत को यूरेनियम बेचने की मंजूरी दे दी थी। लेकिन उसी साल के आखिर में ऑस्ट्रेलिया में सत्ता बदल गई। केविन रड के नेतृत्व वाली लेबर पार्टी सरकार ने भारत को यूरेनियम देने से मना करा दिया और कहा कि एनपीटी पर दस्तखत किए बिना यूरेनियम नहीं मिलेगा।
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आखिर आपूर्ति पर बनी सहमति
अन्य देशों की तरह ऑस्ट्रेलिया को भी डर था कि भारत इस यूरेनियम का इस्तेमाल बिजली बनाने के बजाय परमाणु बम बनाने में कर सकता है। हालांकि, 2008 में हुए भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु करार के बाद ऑस्ट्रेलिया में भी बदलाव आया। भारत के पहले परमाणु हमला न करने के ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए 2011 में ऑस्ट्रेलिया ने नीति बदली। वर्ष 2014 में जब ऑस्ट्रेलियाई पीएम टोनी एबॉट भारत आए, तब ऐतिहासिक नागरिक परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर हुए। सुरक्षा गारंटी, परमाणु दायित्व कानून के विवादों को सुलझाने जैसी तमाम तकनीकी बारीकियों और कागजी कार्रवाइयों को पूरा होने के बाद इस समझौते पर हस्ताक्षर हुए हैं।
दुनिया का एक तिहाई भंडार
- ऑस्ट्रेलिया में लगभग 16.7 लाख टन यूरेनियम का भंडार है, जो दुनिया में मौजूद कुल यूरेनियम भंडार का लगभग एक-तिहाई है।
- भारत के परमाणु रिएक्टरों की मौजूदा कुल क्षमता करीब 8,000 मेगावाट है जिनके लिए हर साल करीब 2,000 टन यूरेनियम की जरूरत होती है।
- वर्ष 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को बढ़ाकर 100 गीगावाट करने का लक्ष्य है, और जब भारत 100 गीगावाट के लक्ष्य तक पहुंचेगा, तब सालाना जरूरत बढ़कर 23,000 टन तक पहुंच सकती है।
- झारखंड और आंध्र प्रदेश की खदानों से यूरेनियम निकालता है लेकिन घरेलू उत्पादन हर साल लगभग 400 से 500 टन ही है, जो देश की कुल जरूरत का महज 20% से 25% ही है।