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क्या 'दिल्ली' की अग्निपरीक्षा में पास हो सकेंगे अमित शाह? कभी पास तो कभी फेल का रहा है रिकॉर्ड

Fri, 13 Dec 2019 07:01 PM IST
Harendra Chaudhary अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 13 Dec 2019 07:01 PM IST
सार

  • 70 विधानसभा सीटों में से 42 सीटें मिलने का दावा 
  • हरियाणा और महाराष्ट्र मे जीत के बड़े दावे हो चुके फेल
  • कच्ची कालोनी और पानी का मुद्दा सबसे ऊपर

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upcoming delhi assembly election 2020 will biggest challenge of BJP president Amit shah
पार्

विस्तार

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अब तक अपने कई बड़े दावों पर सही साबित हुए हैं, लेकिन 'दिल्ली' की सत्ता हासिल करना अभी भी उनके लिए बाकी है। दिल्ली विधानसभा चुनावों की तमाम हलचलों के बीच पार्टी ने एक सर्वे किया है, जिसमें उसकी जीत के दावे किये गए हैं। अगर भाजपा के इस आंतरिक सर्वे को सच मानें, तो पार्टी इस बार दिल्ली में सरकार बना सकती है। सर्वे में उसे दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से 42 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है।

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इसी माह के पहले हफ्ते में एक दिसंबर से सात दिसंबर के बीच कराए गए इस सर्वे में इस बात के संकेत मिले हैं कि पार्टी का कच्ची कालोनियों पर लगाया गया दांव कारगर साबित हो सकता है। सर्वे में जनता इसी मुद्दे पर सबसे ज्यादा आकर्षित बताई गई है। नवंबर माह के प्रारंभ में भी इसी प्रकार के एक सर्वे में पार्टी को चालीस से अधिक सीटें मिलती हुई बताई गई थीं।  

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पार्टी सूत्रों के मुताबिक दिल्ली की जनता के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता लगातार बढ़ी है। हाल ही में पास हुए बडे़ कानूनों के बाद इसमें और इजाफा हुआ है। सर्वे में 86 फीसदी लोगों ने प्रधानमंत्री को अभी भी सबसे ज्यादा विश्वसनीय बताया है, जबकि दिल्ली के मुद्दे पर काम करने के दावों पर दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार की लोकप्रियता पांच से छह फीसदी के बीच पाई गई है।

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अगर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को जोड़ दें, तो यह आंकड़ा 90 फीसदी से ऊपर चला जाता है। पार्टी इसी दम पर दिल्ली में अपनी वापसी का दावा कर रही है।

कच्ची कालोनी और पानी का मुद्दा सबसे ऊपर

अगर मुद्दों की बात करें तो कच्ची कालोनी को पक्का करने के लिए बनाया गया कानून पार्टी के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है। लोकप्रियता के आंकड़े पर इसे सबसे ज्यादा लोगों ने महत्व दिया है। वहीं पानी और दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा इसके बाद सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दे हैं। प्रदूषण के खतरनाक आंकड़ों के बावजूद यह प्राथमिकता में इन मुद्दों से नीचे है।  

दावों पर कितनी रही पास

लोकसभा चुनाव 2014 में नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता अपने शिखर पर थी। पार्टी उस समय अकेले दम पर बहुमत पाने का दावा कर रही थी। ज्यादातर राजनीतिक विश्लेषक इसे एक चुनावी पैंतराभर मान रहे थे। लेकिन पार्टी ने 30 साल बाद देश में अकेले दम पर पूर्ण बहुमत (282 सीटें) पाने का कारनामा कर सबको हैरत में डाल दिया था। इसी प्रकार लोकसभा चुनाव 2019 में पार्टी ने अकेले दम पर 300 से अधिक सीटें जीतने का दावा किया।

तब भी भाजपा के इस दावे पर कोई यकीन नहीं कर रहा था, लेकिन पार्टी अकेले दम पर 303 सीटें जीतने में कामयाब रही। पार्टी के इस प्रदर्शन के बाद उसको अजेय जैसा समझा जाने लगा। पार्टी के दावे उत्तर प्रदेश और हरियाणा के पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान भी सही साबित हुए और पार्टी इन जगहों पर सरकार बनाने में कामयाब रही।

यहां दावे हुए धराशाई

हाल ही में महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनाव संपन्न हुए। भाजपा ने हरियाणा की 90 सीटों में से 70 से अधिक, तो महाराष्ट्र की 288 सीटों में से 200 से अधिक सीट के दावे किये थे। ये दावे पार्टी के शीर्ष नेताओं ने चुनावी रैलियों के दौरान किये थे। लेकिन चुनाव परिणाम बताते हैं कि पार्टी अपने इन दोनों ही दावों को हकीकत में बदलने में बुरी तरह असफल साबित हुई। हरियाणा में भाजपा को केवल 40 सीट से संतोष करना पड़ा।

सरकार बनाने के लिए भी उसे एक नवोदित पार्टी जजपा से समझौता करना पड़ा। इसी प्रकार महाराष्ट्र में भी पार्टी 105 की संख्या पर अटक गई। शिवसेना से उसकी बिगड़ी बात ने उसे सरकार से भी दूर कर दिया।


 
इसके पहले भी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के दावे संभवतः पहली बार छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान के संदर्भ में गलत साबित हुए हैं। पार्टी ने इन तीनों ही राज्यों में सत्ता में वापसी के दावे किये थे लेकिन वह इनमें से कहीं भी वापसी नहीं कर सकी। पार्टी के दावों और हकीकत में आ रहे परिणाम के बीच का अंतर दिल्ली के दावों के सामने खड़ा है। उसके इस दावे पर जनता किस प्रकार अपनी प्रतिक्रिया देगी, यह चुनावों के बाद ही पता चलेगा। 

 

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