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UP Politics: सपा का ब्राह्मण कार्ड, सत्ता का वनवास खत्म करने को बेहद सधी चाल चल रहे अखिलेश

Sun, 28 Jul 2024 08:23 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Sun, 28 Jul 2024 08:23 PM IST
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सार
दरअसल, 2012 के यूपी विधानसभा चुनावों में जब समाजवादी पार्टी ने अकेले दम पर 224 सीटें जीतने का कारनामा किया था, तब यह उसके सोशल इंजीनियरिंग का ही करिश्मा माना गया था।
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UP Politics: SP Brahmin card Akhilesh Yadav is making very careful moves to end his exile from power
SP - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) कार्ड खेलकर समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव ने लोकसभा चुनावों में भाजपा को करारी शिकस्त दी थी। इसीलिए जब उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष चुनने की बात आई, तो यही कहा जा रहा था कि किसी दलित या पिछड़े को यह महत्त्वपूर्ण पद देकर अखिलेश यादव अपने इस जनाधार को और ज्यादा मजबूत करने की कोशिश कर सकते हैं। शिवपाल यादव और इंद्रजीत सरोज को इस पद के लिए सबसे तगड़ा दावेदार भी माना जा रहा था। 



लेकिन अखिलेश यादव ने नेता प्रतिपक्ष पद के लिए ब्राह्मण नेता माता प्रसाद पांडेय का नाम आगे कर लोगों को चौंका दिया है। यानी पीडीए के बाद अब अखिलेश यादव की नजर ब्राह्मण वोट बैंक पर है। तो क्या यह ब्राह्मण कार्ड 2027 के विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर खेला गया है? इशारे तो इसी ओर हैं। 


पुराना अनुभव दोहराने की कोशिश
दरअसल, 2012 के यूपी विधानसभा चुनावों में जब समाजवादी पार्टी ने अकेले दम पर 224 सीटें जीतने का कारनामा किया था, तब यह उसके सोशल इंजीनियरिंग का ही करिश्मा माना गया था। उस समय समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में अखिलेश यादव ने ब्राह्मणों को लुभाने का काम शुरू किया। ब्राह्मण मतदाता इसके पहले 20007 में बहुजन समाज पार्टी के साथ जाकर मायावती को पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में पहुंचा चुके थे, लेकिन कथित तौर पर मायावती के शासनकाल में भी ब्राह्मणों की जमकर उपेक्षा हुई, जिससे नाराज ब्राह्मण किसी दूसरे ठिकाने की तलाश कर रहे थे। 

इसी बीच राजनीति की नई पौध बनकर उभर रहे अखिलेश यादव ने मजबूती से ब्राह्मणों को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश की। उस समय उनकी साफ स्वच्छ विकासवादी छवि ने इसमें मदद की और उन्हें इसमें सफलता भी मिली। ब्राह्मणों ने सपा का जमकर साथ दिया। इसका परिणाम हुआ कि 2012 में सपा अकेले दम पर सत्ता में पहुंचने में सफल हो गई। अखिलेश अब अपना वही पुराना फॉर्मूला 2027 के चुनावों में भी आजमाना चाहते हैं। 

भाजपा में अंतर्कलह
ध्यान देने की बात है कि अखिलेश यादव यह चाल ऐसे समय में चल रहे हैं जब भाजपा अपनी अंतर्कलह से जूझने में व्यस्त है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्रियों के बीच कथित टकराव के बीच भाजपा संकट में दिखाई दे रही है। उसका जातीय गणित और हिंदुत्व का कार्ड भी गड़बड़ाया हुआ है। माना जा रहा है कि यदि उसने समय रहते इन संकटों से मुक्ति नहीं पाई, तो उसे विधानसभा चुनावों में संकट का सामना करना पड़ सकता है। 

लोकसभा चुनावों में राजपूत मतदाताओं के बीच भाजपा को लेकर असमंजस देखी गई थी। भाजपा को इसका नुकसान भी हुआ था। लेकिन इसी के साथ यह भी कहा जाता रहा है कि यूपी भाजपा के कुछ ताकतवर नेता ब्राह्मणों के खिलाफ रहे हैं। लोकसभा चुनावों में विकल्प की कमी के कारण ब्राह्मण भाजपा के साथ ही बने रहे थे, लेकिन यदि समाजवादी पार्टी विधानसभा चुनावों में उन्हें साधने में सफल रही, तो भाजपा के इस किले में भी सेंध लग सकती है। माता प्रसाद पांडेय को नेता प्रतिपक्ष बनाकर अखिलेश यादव ने यही संकेत देने की कोशिश किया है। यदि सपा का यह कार्ड काम किया तो 2027 में विधानसभा की लड़ाई रोचक हो सकती है।

सबको साथ लेकर चलना हमारा काम: सपा
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मोहम्मद आजम ने अमर उजाला से कहा कि अखिलेश यादव हर जाति, हर वर्ग को साथ लेकर चलने की कोशिश करते रहे हैं। आज भी नेता प्रतिपक्ष के लिए पूरी पार्टी ने उन्हें अधिकृत कर दिया था। उन्होंने एक ब्राह्मण नेता चुनकर यही संदेश दिया है कि समाजवादी पार्टी ब्राह्मणों का सम्मान करती है।

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